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पाकिस्तानी सेना को इमरान की चुनौती

इमरान खान में हमेशा से जोखिम उठाने की प्रवृत्ति रही है। पाकिस्तान में सेना को चुनौती देने का काम �
शेखर गुप्ता /  11 06, 2022

पाकिस्तान में षडयंत्र सिद्धांतों पर बात करना वैसा ही राष्ट्रीय शगल है जैसे क्रिकेट का ज्ञानी बनना। बीते गुरुवार को इमरान खान की जान लेने की नाकाम कोशिश राजनीतिक षडयंत्र सिद्धांतकारों से लेकर क्रिकेट के जानकारों तक सभी को गलत साबित करने वाली है।

आप पूछ सकते हैं कि राजनीतिक षडयंत्र की बात तो ठीक है लेकिन क्रिकेट को इसमें क्यों घसीटना। हम इस बात को आगे स्पष्ट करेंगे। पहले ताजा घटनाक्रम की पांच ऐसी बातें जो सामान्य सैन्य-राजनीतिक षडयंत्र से अलग हैं। आपने भी ध्यान दिया होगा कि पाकिस्तान में हमेशा सेना को राजनीति पर तरजीह दी जाती है। बहरहाल बात करते हैं उन पांच मसलों की:

n पाकिस्तान में राजनीतिक हत्याएं आम हैं और सेना उनमें सीधे ( जुल्फिकार अली भुट्टो) या छद्म (उनकी बेटी बेनजीर) रूप से शामिल रहती है। परंतु किसी को मारने की नाकाम कोशिश आम नहीं है। पहले एक अपवाद हो चुका है लेकिन ऐसा अक्सर नहीं होता। तो फिर इस बार नाकामी क्यों हाथ लगी?

n हत्या के हर प्रयास के बाद निशाना बनाया जाने वाला व्यक्ति या तो जमीन के नीचे दफन हो जाता है या बच जाने के बाद वह एक ‘सभ्य आचरण’ करने वाले भले व्यक्ति में तब्दील हो जाता है। सेना पर अंगुली उठाने की हिम्मत कोई नहीं करता।

n किसी भी अन्य जगह की तुलना में पाकस्तानी भीड़ कहीं अधिक बड़ी, गुस्सैल और हिंसक होती है। वह सबसे सुरक्षित प्रतिष्ठानों को भी क्षति पहुंचा सकती है। सलमान रश्दी की किताब के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए उन्होंने अमेरिकी दूतावास के साथ यही किया था। रश्दी भारत में जन्मे और ब्रिटेन में रहते थे तो फिर अमेरिकी दूतावास को निशाना क्यों बनाया गया?

इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं। दो साल पहले फ्रांसीसी दूतावास का भी यही हश्र हुआ और इस बार ऐसा उस हत्यारे के पक्ष में किया गया जिसने पेरिस के स्कूल अध्यापक सैमुएल पैटी पर ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए जान ले ली थी। ऐसी किसी भीड़ ने अब तक किसी सैन्य प्रतिष्ठान को निशाना नहीं बनाया। भारत के उलट पाकिस्तान में पश्चिमी, उत्तरी, दक्षिणी जैसे सैन्य कमांडर नहीं होते। वहां प्रमुख क्षेत्रों में नौ कोर हैं और उनके कमांडर पोलितब्यूरो की तरह हैं जिनसे सेना प्रमुख भी डरते हैं।

कोर कमांडरों से कोई नहीं उलझता खासकर ताकतवर पेशावर कोर से। कराची, लाहौर, मांगला, मुल्तान और रावलपिंडी भारत का सैन्य मुकाबला करती हैं लेकिन राजनीतिक-सामरिक संदर्भ में पेशावर शीर्ष पर है। वह अफगानिस्तान पर नियंत्रण और निगरानी के साथ-साथ वजीरिस्तानियों और पाकिस्तानी तालिबान द्वारा फैलायी अशांति पर नजर रखती है। वह उस डूरंड रेखा की निगरानी करती है जिसे किसी अफगान सरकार ने कभी स्वीकार नहीं किया।

यह सेना के संरक्षण में होने वाले तमाम आतंकी नेटवर्क को मदद मुहैया कराने का काम करती है। याद कीजिए कि ओसामा बिन लादेन कहां रह रहा था और जैश-ए-मोहम्मद के अड्डे पर मिसाइल दागते भारतीय मिराज विमान कहां गए थे। पाकिस्तान के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन की शुरुआत हुई लेकिन सबसे तीव्र विरोध पेशावर में हुआ जहां दसियों हजार लोगों ने कोर कमांडर के घर को घेर लिया।

उन्होंने सैनिकों को खदेड़ दिया और गोलीबारी के बीच यह नारा लगाते रहे- ‘ये जो दहशतगर्दी है/इसके पीछे वर्दी है।’ हम अतीत में भी यह सुन चुके हैं लेकिन विपक्षी नेता भी अपनी रैलियों में इस नारे को रोकने की कोशिश करते हैं। संदेश यही रहता है कि कोई हमारी बहादुर सेना पर हमला नहीं करेगा।

हमारा तीसरा सवाल यह है कि सेना ने अपना बचाव क्यों गंवा दिया?

 हत्या की इस कोशिश के आसपास पाकिस्तानी मीडिया की सुर्खियों पर नजर डालिए। उनके एक प्रमुख राजनीतिक सहयोगी ने उन लोगों के नाम बात दिए थे जो उनकी हत्या की योजना बना सकते थे। इस सूची में सबसे ऊपर मेजर जनरल फैजल नसीर का नाम था। उनका घर इस समय एक ऐसी भीड़ ने घेर लिया जो पहले की तुलना में अधिक हिंसक और नाराज है।

जो लोग शीर्ष सैन्य अधिकारियों या आईएसआई प्रमुखों को हत्याओं के लिए दोषी ठहराते हैं वे या तो विदेशों में सुरक्षित जी रहे समकालीन इतिहासकार हैं या फिर निर्वासित विदेशी या पाकिस्तानी। हालांकि नीदरलैंड में एक पाकिस्तानी असंतुष्ट की हत्या की कोशिश समेत कुछ घटनाएं बताती हैं कि अब निर्वासन भी सुरक्षित नहीं है।

अभी चंद रोज पहले ही आईएसआई से जुड़े एजेंटों पर ब्रिटेन में यह आरोप तय हुआ कि उन्होंने नीदरलैंड में हत्या का प्रयास किया था। सवाल यह है कि ऐसे में पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय लेकिन सत्ता से बाहर चल रहे राजनेता के करीबी लोग सेना के वरिष्ठ अधिकारियों पर हत्या की योजना बनाने का इल्जाम कैसे लगा रहे हैं? 

पांचवा और आखिरी मुद्दा वह है जिसके बारे में हमने गत सप्ताह विस्तार से चर्चा की थी। अगर आईएसआई प्रमुख को उस प्रधानमंत्री पर हमला बोलने के लिए संवाददाता सम्मेलन आयोजित करना पड़ा जिसने पहले उन्होंने गलत ढंग से चुना और फिर उसी तरह हटा दिया। इससे पता चलता है पहली बार सेना एक लोकप्रिय राजनेता से डर रही है।

पांचवा प्रश्न यह है कि इन गंभीर चेतावनियों और सेना की दुश्मनी की खुली घोषणाओं के बावजूद आखिर इमरान खान ने सामान्य समझ से भी काम क्यों नहीं किया और इस्लामाबाद मार्च स्थगित क्यों नहीं किया?

हम इनमें से पांचों के उत्तर के बारे में विस्तार से बात कर सकते हैं। इनका जवाब दो शब्दों में दिया जा सकता है। यह उत्तर है एक नाम: इमरान खान। यह बात हमें शुरुआत में पहुंचा देती है जिसके चलते हमने कहा था कि यह पाकिस्तान में क्रिकेट के जानकारों और षडयंत्र सिद्धांत के पंडितों को भी हैरत में डाल देगा।

कई राजनीतिक पत्रकार यह कह सकते हैं कि वे क्रिकेटर इमरान खान को निजी तौर पर जानते हैं, उनसे मिले हैं, उनका साक्षात्कार लिया है, उनसे अनौपचारिक बातचीत की है और उनका अध्ययन किया है। मैंने भी यह सब किया है। वह एक विशिष्ट क्रिकेट सितारे तो हैं ही उनमें हमेशा जोखिम उठाने की इच्छाशक्ति रही है।

खेलों की कवरेज करने के अपने दौर में मेरा ढेर सारे क्रिकेटरों से परिचय रहा है और मैं कह सकता हूं कि वह न केवल जानकार थे बल्कि सजग भी थे। उनका कहना था कि भारत ने पाकिस्तान से हारने की आदत डाल ली क्योंकि भारतीय हारने से बहुत डरते थे।

तब जोखिम लेना आम नहीं था। सन 1994 में जब वह गेंद के साथ छेड़छाड़ के कारण आलोचना के केंद्र में थे तब मैंने लंदन के उनके अपार्टमेंट में इंडिया टुडे के लिए साक्षात्कार लिया था। उस बहुउद्धृत साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि किसी स्तरीय अंग्रेज क्रिकेटर ने उनकी आलोचना नहीं की।

ऐसा बॉथम और लैंब जैसे खिलाड़ियों ने किया जो निचले दर्जे के थे। बॉथम और लैंब ने उन पर मुकदमा किया और इमरान तथा उनकी तत्कालीन पत्नी जेमिमा मुझे फोन कर-करके कहते रहे कि मैं कह दूं कि मैंने इमरान के हवाले से गलत बात कही है ताकि वह बरबाद होने से बच सकें।

उनके राजनीतिक सफर पर नजर डालिए। 2013 में वह पाकिस्तान के सभी पांच राज्यों में एक-एक सीट से चुनाव लड़े और हर जगह हार गए। पाकिस्तानी विमान सेवा की इस्लामाबाद से लाहौर की एक उड़ान पर उनके पुराने दोस्त और अब दुश्मन सरफराज नवाज मेरे साथ बैठे थे। मैंने उनसे पूछा कि उनके मित्र पांच सीटों से चुनाव कैसे लड़ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जब इमरान क्रिकेट खेलते थे तो उन्हें लगता था कि वह पूरी क्रिकेट टीम हैं। अब सत्ता से बाहर होने के बाद वे उन सभी सात सीटों से लड़े जहां उपचुनाव हुए थे और छह पर जीतने में भी कामयाब रहे। और वह संसद भी नहीं आ रह क्योंकि वह उसे अवैधानिक मान रहे हैं। उन्होंने सेना को नए चुनाव कराने की चुनौती दी लेकिन साथ ही यह भी दिखा दिया कि अगर चुनाव हुए तो क्या होगा। इमरान से यह आशा मत कीजिए कि वह अपने पत्ते छिपा कर रखेंगे।

लब्बोलुआब यही है कि जरूरत पड़ने पर वह गेंद से छेड़छाड़ करेंगे, ताकतवर लोगों पर बुरे से बुरे आक्षेप लगाएंगे, ब्रिटेन के मजबूत कानूनों का सामना करने का जोखिम उठाएंगे, खुद को पूरी टीम मानेंगे और एक मित्र से अपेक्षा करेंगे कि वह अदालत में झूठ बोल दे। और अब वह सोचते हैं कि अल्लाह उनके साथ है।

पाकिस्तान में पारंपरिक दलील वही है जो कसीनो में चलती है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपके पास कौन से पत्ते, कौशल या कितना पैसा है। मायने हमेशा हाउस रखता है। इमरान खान को पसंद करें या नापसंद लेकिन हाउस को ध्वस्त करने के लिए कोई इमरान खान ही चाहिए।

Keyword: इमरान खान, पाकिस्तान में षडयंत्र,
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