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मप्र: आगामी चुनाव में अहम हैं आदिवासी

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव करीब एक वर्ष दूर हैं। कांग्रेस और जयस के बीच संभावित गठबंधन और भीम
संदीप कुमार / भोपाल 11 04, 2022

जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया था तब भोपाल के राजनीतिक माहौल में भी इसका असर देखने को मिला। मुर्मू के नामांकन का जश्न मनाने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सार्वजनिक आयोजनों में आदिवासी वेशभूषा में पहुंचे और उन्होंने आदिवासी शैली में नृत्य भी किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह उत्साह इस मान्यता पर आधारित था कि एक आदिवासी के राष्ट्रपति बनने से पार्टी को आगामी चुनावों में आदिवासी अंचल में लाभ मिलेगा।

 माना जा रहा है कि आगामी चुनावों में जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन की अहम भूमिका होगी। यह प्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में आदिवासी युवाओं का एक प्रमुख सामाजिक संगठन है। संगठन के संरक्षक हीरालाल अलावा कांग्रेस से विधायक हैं। अलावा ने आदिवासी युवाओं का आह्वान किया है कि वे विधानसभा में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए प्रयास करें ताकि विभिन्न दलों वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किए जाने के बजाय वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें।

 अलावा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘जयस ने हाल ही में धार जिले के कुक्षी में आदिवासी महापंचायत का आयोजन किया था जहां हमने यह तय किया कि हम उन 80 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे जहां आदिवासी अच्छी खासी तादाद में हैं।’ अपनी रणनीति के बारे में उन्होंने कहा कि चिह्नित आदिवासी इलाकों के युवाओं से कहा गया है कि वे अपने समुदाय की दिक्कतों के बारे में रिपोर्ट तैयार करें और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम आयोजित करें।

जब उनसे कांग्रेस से रिश्ते के बारे में पूछा गया तो अलावा ने कहा, ‘मेरे लिए संगठन और आदिवासी समुदाय सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं। बाकी सब उसके बाद आता है। अगर कांग्रेस गठबंधन चाहती है तो उसे एक योजना के साथ आगे आना होगा। हम देखेंगे क्या वह हमारे लिए उपयोगी है और तभी हम कोई निर्णय लेंगे।’

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ के एक करीबी कांग्रेस नेता ने कहा कि जयस और कांग्रेस दोनों एक ही राह के राही हैं। दोनों का एजेंडा एक है और वह है भाजपा को पराजित करना। ध्यान रहे कि कमल नाथ ने हाल ही यह कहकर सुर्खियां बटोरी थीं कि जयस और कांग्रेस का डीएनए एक ही है।

कांग्रेस और जयस के रिश्ते के बारे में पूछने पर भाजपा प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी कहते हैं, ‘एक लोकतांत्रिक देश में हर किसी को यह अधिकार है कि वह चुनाव लड़े और अपने साझेदार चुने। जहां तक भाजपा का संबंध है आदिवासी जन उसके लिए कभी वोट बैंक नहीं रहे। भाजपा लगातार आदिवासी समुदाय की बेहतरी के लिए प्रयास कर रही है।

चाहे जनजातीय गौरव दिवस मनाने की बात हो, आदिवासी नायकों शंकर शाह- रघुनाथ शाह के बलिदान को याद करना हो, भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन को गोंड रानी कमलापति के नाम पर करने की बात हो, मुख्यमंत्री राशन आपके ग्राम योजना हो, साहूकारों द्वारा दिया गया कर्ज माफ करने की बात हो या अन्य सशक्तीकरण योजनाएं, इन सभी का लक्ष्य यह रहा है कि आदिवासी भाइयों और बहनों को उनकी विरासत पर गर्व करने का मौका दिया जाए और उन्हें बतौर समाज आगे ले जाया जाए।’

इंदौर निवासी पत्रकार और आदिवासी राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले सुचेंद्र मिश्र जयस की राजनीति को लेकर एक अलग नजरिया सामने रखते हैं। वह कहते हैं, ‘2018 के चुनाव में जयस ने जबरदस्त छाप छोड़ी और मालवा-निमाड़ में भाजपा की हार की वजह बनी। कांग्रेस ने अलावा को मनावर से टिकट दिया जिसका फायदा कांग्रेस को भी मिला और उसके प्रत्याशी कई सीटों पर जीते। लेकिन अब जयस की चमक फीकी पड़ चुकी है।’

उन्होंने कहा कि भाजपा अच्छी तरह जानती है कि उसे 1.53 करोड़ आदिवासियों के मत मिलेंगे तभी वह करीब 50 आदिवासी बहुल सीटों पर जीत पाएगी। 2018 में उसे इसलिए सत्ता गंवानी पड़ी थी क्योंकि कांग्रेस को इनमें से 31 सीटों पर जीत मिली थी जबकि भाजपा 18 सीटों पर सिमट गई थी।

 भोपाल के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर के अनुसार यह मानना गलत है कि 2018 में कांग्रेस को आदिवासी सीटों पर जीत मिली थी। वह कहते हैं, ‘सन 1957 से लेकर अब तक के किसी भी चुनाव पर नजर डालिए, आदिवासी बहुल सीटों का रुझान प्रदेश के बाकी हिस्सों के चुनावी रुझान के अनुरूप ही रहता है।

जहां तक जयस की बात है तो मुझे नहीं लगता कि कोई एक संगठन विविध आदिवासी समुदायों का नेतृत्वकर्ता होने का दावा कर सकता है। मध्य प्रदेश में भील-भिलाला, गोंड, सहारिया, बैगा परधान समेत अनेक आदिवासी समुदाय हैं। उनकी संस्कृति और जीवन शैली तक अलग है। ऐसे में उन्हें किसी एक दिशा में प्रेरित करना असंभव प्रतीत होता है।’

Keyword: आदिवासी, शिवराज सिंह चौहान, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आदिवासी राजनीति,
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