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ब्याज दर में वृद्धि के पक्ष विपक्ष में स्वस्थ बहस

साजिद जेड चिनॉय /  11 04, 2022

नीतिगत दरों को बढ़ाकर करीब 6 फीसदी करने के बाद क्या भारत की मौद्रिक नीति समिति को और कदम उठाने की आवश्यकता है? बता रहे हैं साजिद जेड चिनॉय

 बढ़ते अमेरिकी डॉलर, वै​श्विक जिंस कीमतों में इजाफे और 40 वर्षों की सबसे आक्रामक वैश्विक मौद्रिक सख्ती के बीच भारत की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने अप्रैल से खामोशी अ​ख्तियार कर रखी है और कुछ जरूरी कदम उठाए हैं। मसलन मुद्रास्फीति को नए सिरे से प्राथमिकता देना और महामारी के बाद के हालात को देखते हुए देश की मौद्रिक व्यवस्था का आकलन। परंतु प्रभावी नीतिगत दर को 3.35 फीसदी से बढ़ाकर 6 फीसदी करने के बाद एमपीसी का सामना अब एक स्वस्थ बहस से है: क्या और अ​धिक कदम उठाने की जरूरत है? क्या मुद्रास्फीति को ही निशाना बनाना है? समिति के भीतर एक समूह ऐसा है जो चाहता है कि प्रतीक्षा करने की रणनीति अपनाई जाए। क्यों? 

पहली बात, मौद्रिक नीति लंबे और परिवर्तनीय अंतराल के साथ काम करती है। यानी किसी कदम का असर आगामी तिमाहियों में ही महसूस किया जा सकता है। चूंकि वै​श्विक अर्थव्यवस्था में धीमापन आने की संभावना है इसलिए कुछ हद तक अवस्फीति आना लाजिमी है। इतना ही नहीं यह भी अहम है कि कहीं अग्रसोची वास्तविक नीतिगत दर कुछ ज्यादा ही न बढ़ जाए।

 दूसरी दलील यह है कि भारत के मुद्रास्फीति को निशाना बनाने वाले ढांचे में मौद्रिक नीति को केवल घरेलू वृद्धि-मुद्रास्फीति के ग​णित पर ध्यान देना चाहिए, न कि बाह्य बातों पर। अन्य उपायों का इस्तेमाल बाहरी क्षेत्र के प्रबंधन में किया जा सकता है। दोनों दलीलें महत्त्वपूर्ण हैं और इनका सावधानी से आकलन करना चाहिए।

 सबसे पहले मौद्रिक नीति को अग्रसोची होना चाहिए लेकिन इस समय व्याप्त अनिश्चितता को देखते हुए पूरे परिदृश्य पर नजर रखनी होगी। मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमान जो अभी काफी हद तक भविष्य के गर्भ में हैं वे यकीनन बड़ी गलतियों की संभावना को सीमित करेंगे और इसलिए उनका मूल्य भी सीमित हो सकता है।

उदाहरण के लिए रिजर्व बैंक का अनुमान है कि वित्त वर्ष 24 में मुद्रास्फीति औसतन 5.2 फीसदी रहेगी लेकिन नीति में अभी भी उन निष्कर्षों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। इसके बजाय आने वाली​ तिमाहियों पर अ​धिक ध्यान देना चाहिए। रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति की अपेक्षा रख रहा है और असमान मॉनसून तथा कमजोर रुपया कई जो​खिम पैदा कर सकता है। बीते 30 महीनों में मुद्रास्फीति का औसत 6 फीसदी रहा है ऐसे में मौद्रिक नीति को सतर्क रहना होगा।

सतर्क रहने का दूसरा मामला दबाव की प्रकृति का है। मुद्रास्फीति केवल कुछ विशेष कारणों से संचालित नहीं होती। बल्कि मुद्रास्फीति को रेखांकित करने वाले उपाय बताते हैं कि कीमत का दबाव व्यापक आधार वाला होता है। इस बात पर तब जोर पड़ा जब सितंबर में बुनियादी कीमतों की वा​र्षिक मासिक गति 6 फीसदी तक पाई गई। इससे यह भी समझा जा सकता है कि आ​खिर क्यों आम परिवारों और कारोबारों की मुद्रास्फीति के अनुमान जो पिछले दो वर्षों के दौरान लगातार बढ़ने के बाद नरम हुए लेकिन एक बार फिर उनमें तेजी देखने को मिलने लगी।

 वास्तविक दरों के अग्रगामी नजरिये से सकारात्मक होने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या वे दरें अ​धिक हैं। उदाहरण के लिए अगर रिजर्व बैंक को नीतिगत दरों को बाजार की अपेक्षा के अनुरूप यानी करीब 6.7 फीसदी रखना होता तो मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के 2024 के 5.2 फीसदी के अनुमान के अनुसार भी अग्रगामी वास्तविक दर 1.5 फीसदी होती। याद कीजिए कि महामारी के पहले पांच वर्षों में मुद्रास्फीति को 4 फीसदी के लक्ष्य में रखने के लिए 2.5 फीसदी की वास्तविक नीतिगत दर की आवश्यकता पड़ी थी। 

क्या तबसे निरपेक्ष दरों में गिरावट आई है? क्या 1.5 फीसदी की दर निरेपक्ष से ऊपर होगी? शायद। परंतु अगर लक्ष्य अवस्फीति जारी रखने का है तो पहले मुद्रास्फीति को 6 फीसदी के नीचे लाना होगा और फिर धीरे-धीरे 4 फीसदी की ओर। यहां असाधारण हालात को देखते हुए कहा नहीं जा सकता है कि पुराना नियम लागू होगा या नहीं।

ऐसे में रिजर्व बैंक को नीतिगत निरंतरता का आकलन करना होगा। जहां तक इस सलाह की बात है कि मौद्रिक नी​ति को बाहरी कारकों पर ध्यान नहीं देना चाहिए तो नि​श्चित तौर पर मुद्रास्फीति को लेकर लचीला रुख रखने का ढांचा एक अलग मामला है जहां ब्याज दर और नकदी प्रबंधन दोनों आंतरिक संतुलन पर केंद्रित रहते हैं जबकि अन्य उपाय मसलन विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप, विनिमय दर, पूंजी प्रवाह आदि का इस्तेमाल बाहरी संतुलन हासिल करने के लिए किया जा सकता है।

अन्य उभरते बाजारों की तरह भारत का भुगतान संतुलन दबाव में रहा है क्योंकि चालू खाते का घाटा तेजी से बढ़ा है जिस पर लगाम लगाने की जरूरत होगी। यह दो तरह से हो सकता है: सख्त मौद्रिक और राजकोषीय नीति की मदद से मांग को सीमित कर और दूसरा विनिमय दर को समायो​जित होने देना ताकि निर्यात बढ़े और गैर तेल, गैर स्वर्ण आयात कम हो। परंतु कमजोर विनिमय दर घरेलू मुद्रास्फीति को गति देगी।

 अगर चालू खाते के घाटे पर नियंत्रण के लिए नीतिगत दरों को पर्याप्त सख्त नहीं किया गया तो विनिमय दर पर बोझ पड़ता है। परंतु तब इसका परिणाम घरेलू मुद्रास्फीति में इजाफे के रूप में दिखेगा और मौद्रिक नीति को इस पर प्रतिक्रिया करनी ही पड़ेगी।

 यकीनन इस ​स्थिति में विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल किया जा सकता है। परंतु इसका बड़ा हिस्सा पहले ही इस्तेमाल किया जा चुका है और भ​विष्य के झटकों से निपटने के लिए भी मुद्रा भंडार बचाकर रखना होगा। इतना ही नहीं भंडार का इस्तेमाल वास्तविक विनिमय दर में​ गिरावट रोकने में नहीं करना चाहिए।

 यदि किसी को वै​श्विक ब्याज दरों के अंतर के भारत के पूंजी खाते पर असर को लेकर संशय है तो मौद्रिक नीति चालू खाते के कारण बाहरी कारक की अनदेखी नहीं कर सकती और न ही रुपये के जरिये मुद्रास्फीति पर इसके असर का। ऐसे में मुद्रास्फीति को ल​क्षित करने वाले ढांचे की सख्त व्याख्या में बाहरी कारकों को शामिल करना होगा।

नीति निर्माताओं को यह श्रेय मिलना चाहिए कि उन्होंने महामारी के दौरान वित्तीय ​स्थिरता का बचाव किया और विदेशी मुद्रा का भंडार तैयार किया। अब हमें वृहद आ​र्थिक ​स्थिरता को भी ध्यान में रखना चाहिए और बाहरी और आंतरिक असंतुलन को सीमित करने का प्रयास करना चाहिए। 

मौजूदा वै​श्विक माहौल में बेहतर यही होगा कि तेजी से कदम उठाए जाएं क्योंकि उन्हें आसानी से वापस लिया जा सकता है। परंतु अगर कम कदम उठाए गए तो वृहद आ​र्थिक ​स्थिरता के लिए दबाव की ​स्थिति बन जाएगी और मुद्रास्फीतिक अनुमान का लेकर ​स्थिति बिगड़ेगी। यदि ऐसा हुआ तो इसका प्रभाव बहुत लंबे समय तक महसूस हो सकता है। 

क्या वृद्धि को भी इसकी कीमत चुकानी होगी? उभरते बाजारों को एक असहज हकीकत का सामना करना पड़ेगा जहां वृद्धि और वृहद ​स्थिरता के बीच कम समय के लिए ही पारस्परिक लेनदेन की ​स्थिति बन सकेगी।

पुनश्च: 2016 में मौद्रिक नीति समिति का गठन इस मान्यता पर किया गया कि ऐसे मंच पर होने वाली चर्चा और बहस की मदद से निर्णय प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकेगा। मजबूत और उच्च गुणवत्ता वाली बहस जो हमें मौद्रिक नीति समिति में देखने को मिल रही है वह इस बात का संकेत है कि कैसे यह संस्थान परिपक्व हो रहा है और इसलिए इस पूरी प्रक्रिया का स्वागत किया जाना चाहिए। 

(लेखक जेपी मॉर्गन में चीफ इंडिया इकॉनमिस्ट हैं। लेख में विचार निजी हैं)

Keyword: मौद्रिक नीति समिति, डॉलर, नीतिगत दर, एमपीसी,
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