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सुनक की चुनौती राजनीतिक नहीं, सामाजिक

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  November 04, 2022

पहले चुनाव, फिर लिज ट्रस के इस्तीफे और उनकी जगह ऋषि सुनक के चुनाव ने ब्रिटेन की राजनीति में लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। सुनक श्वेत वर्ग से ताल्लुक नहीं रखते हैं। सभी लोगों का मानना है कि ब्रिटेन अपने पहले राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकट के दौर से गुजर रहा है। हालांकि इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि ब्रिटेन हमेशा से दुनिया के राजनीतिक रूप से सबसे अशांत देशों में से एक रहा है।

यह एक ऐसे घड़े की तरह रहा है जो गतिहीन है क्योंकि यह बहुत भारी है, लेकिन जिसके अंदर के पानी में हमेशा हलचल होती रहती है। मैं 525 साल पीछे के पन्ने पलट सकता हूं, लेकिन इसके लिए एक विशेष आलेख की आवश्यकता होगी। लेकिन मैं यहां खुद को सिर्फ पिछले 100 वर्षों तक ही सीमित रख रहा हूं जब कुछ ही दशक राजनीतिक रूप से शांत रहे थे।

अंग्रेजों ने बहुत पहले राजशाही, संसद और कानून के शासन जैसी विशिष्ट राजनीतिक व्यवस्थाओं को स्वीकार कर लिया था, हालांकि, 1715 तक वे इनके बारे में आश्वस्त नहीं थे। लेकिन आखिरकार इसे पूरी तरह से स्वीकार किया गया और उसके बाद अधिकांश अंग्रेजों ने लगातार मोल-तोल पर अपना ध्यान केंद्रित किया है जिससे विभिन्न समूहों द्वारा सत्ता पाने के लिए लगातार संघर्ष बढ़ता गया। इसकी वजह से राजनीतिक अस्थिरता जैसी स्थिति पैदा हुई है, जब सरकारें या तो बनीं या फिर सरकार तुरंत गिर गई। अगर कोई सरकार अपना पूर्ण कार्यकाल पूरा करने में कामयाब रही भी तो इसने देश को दो बेहद धुरविरोधी और क्रूरता से भरे असहिष्णु हिस्सों में बांट दिया।

इंगलैंड के लोग भी तीन हिस्सों में बंट गए: जब 1900 के दशक की शुरुआत में लिबरल पार्टी ने ठीक उसी तरह पहली बार जमीनी स्तर की सफलता हासिल की जैसी सफलता भारत में आम आदमी पार्टी को मिली थी। एक राजनीतिक ताकत के रूप में लगभग 30 वर्षों तक इसने अपना दमखम कायम रखा और फिर यह गायब हो गई क्योंकि यह कोई नहीं जानता था कि यह पार्टी किस मकसद के लिए खड़ी थी। लेकिन इससे लड़ाई खत्म नहीं हुई।

जब विभिन्न समूह सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, उस दौर में प्रधानमंत्रियों का सत्ता में आना-जाना लगा रहा। 1920 के दशक की शुरुआत में स्टैनली बाल्डविन को ही देखें जो तीन बार बेहद कम अंतराल में प्रधानमंत्री बने। इंगलैड के लोग यह दिखावा करते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच वाले वर्षों के दौरान स्थिरता थी, लेकिन यह सच नहीं है। वर्ष 1924-29 के बीच के दौर को छोड़कर इतनी अस्थिरता थी कि वहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) जैसे गठबंधन की सरकारें बनतीं रहीं। इंगलैंड के लोग उन्हें ‘राष्ट्रीय सरकारें’ कहते थे।

लेकिन ये सरकारें किसी विशेष श्रेणी की नहीं मानीं जा सकती थीं और हिटलर ने इस स्थिति का फायदा उठाया। ब्रिटेन के लिए, इस तरह की राजनीति के परिणाम और भी घातक होते। लेकिन इसके विशाल साम्राज्य, मुख्य रूप से भारत ने इसके राजनीतिक कुप्रबंधन की लागत का 90 प्रतिशत वहन किया।

वर्ष 1960 से 1980 तक की अवधि भी उतनी ही अस्थिरता से भरी थी। तब तक, ब्रिटेन में केवल दो मुख्य राजनीतिक दल थे, कंजर्वेटिव और लेबर पार्टी। ध्रुवीकरण का माहौल ऐसा बनने लगा कि एक बार फिर से राजनीतिक और आर्थिक दोनों तरह की अस्थिरता देखी गई थी। वैचारिक रूप से, एक पक्ष अमेरिकियों के साथ जबकि दूसरा  रूस के लोगों के साथ था। इस तरह शीत युद्ध का प्रभाव ब्रिटेन की राजनीति में स्पष्ट रूप से दिख रहा था और दोनों देश एक-दूसरे से और भी अधिक शातिर तरीके से लड़े।

1979 तक तमाम राजनीतिक बकवास से तंग आकर जनता ने मार्गरेट थैचर को बड़ा बहुमत दिया और वह 1990 तक सत्ता में रहीं। इसके बाद ही ब्रिटेन राजनीतिक रूप से स्थिर हुआ। विडंबना यह है कि लेबर पार्टी, थैचर से पहले कंजर्वेटिव पार्टी की तरह बन गई। कंजर्वेटिव लगभग अगले डेढ़ दशक के बाद ही हटे।

लेकिन यहां के मूल निवासी हमेशा बेचैन रहे हैं। ऐसे में ब्रिटेन राजनीतिक और आर्थिक रूप से भी स्थिर होता जा रहा था लेकिन सामाजिक स्तर पर यहां असंतुष्टि बढ़ने लगी। वर्ष 2017 के दौरान सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और प्रगतिशीलता के मुद्दे से जुड़े आंदोलन में वामपंथियों का दबदबा रहा।

कुल मिलाकर, परिणाम यह निकलता है कि सभी तरह की प्रशासनिक सत्ता का कभी न कभी लगभग टूटना तय है। अब सुनक को एक उग्र और आत्मलीन आबादी पर शासन करना है। यही कारण है कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक या राजनीतिक नहीं है जैसा कि लोग सोचते हैं बल्कि यह एक सामाजिक चुनौती है।

Keyword: ऋषि सुनक., ब्रिटेन, चुनाव,
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