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गोपनीय होते आंकड़े

टी. एन. नाइनन /  November 04, 2022

क्या  भारत में आंकड़ों को लेकर गोपनीयता बढ़ती जा रही है? भले ही ऐसा पूरी तरह न हुआ हो लेकिन ऐसा होता नजर तो आ रहा है। जरा इन बातों पर विचार कीजिए: रोजगार के जिन आंकड़ों की बाट आमतौर पर जोही जाती है वे सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकॉनमी (सीएमआईई) द्वारा जारी किए जाते हैं। सीएमआईई इनके लिए अपने सर्वे में उतने ही बड़े नमूनों का इस्तेमाल करता है जितने कि सरकार द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं।

देश में ​शिक्षा की ​स्थिति पर शायद सर्वा​धिक विश्वसनीय आंकड़े एक गैर लाभकारी संस्थान प्रथम जारी करता है। प्रथम हर वर्ष ​शिक्षा को लेकर सर्वे ​करता है जिसकी सबको प्रतीक्षा होती है। जिन अन्य आंकड़ों पर करीबी नजर रहती है वे हैं आईएचएस मार्किट का परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स जो आ​र्थिक माहौल के बारे में विश्वसनीय जानकारी देता है। एक विश्लेषण फर्म क्रिसिल कंपनियों की क्रेडिट के बारे में जानकारी का सही स्रोत है। वहीं तकनीकी क्षेत्र के ढेर सारे आंकड़ों के लिए सेंटर फॉर टेक्नॉलजी, इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च (सीटीआईईआर) पर भरोसा किया जाता है।

इस बीच मॉनसून का पूर्वानुमान लगाने वाली एक निजी कंपनी स्काईमेट ने पिछले कुछ वर्षों में सरकार के मौसम विभाग से बेहतर प्रदर्शन किया है। जब विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि भारत में कोविड से जुड़ी मौतों का आंकड़ा सरकारी आंकड़े से 10 गुना अ​धिक है तो ऐसे में कई लोगों को सरकारी आंकड़ों पर संदेह होना लाजिमी है। यहां तक कि भारतीय रिजर्व बैंक जो गुणवत्तापूर्ण आंकड़ों का विश्वसनीय जरिया रहा है, उसके लिए भी कॉर्पोरेट क्षेत्र के प्रदर्शन के आंकड़ों की गति और दायरे के साथ तालमेल बिठा पाना मु​श्किल है।

ऐसे अनेक अन्य उदाहरण भी हैं। सीएमआईई, प्रथम, क्रिसिल, स्काईमेट, आईएचएस मार्किट, सीटीआईईआर तथा इन जैसे अन्य संस्थान बीते दो या तीन दशक में ही अ​स्तित्व में आए हैं या कहें चर्चा में आए हैं। ऐसा ही होना भी चाहिए। एक विकासशील अर्थव्यवस्था में आंकड़ों के नए और ढेर सारे स्रोत होंगे। इनमें डिजिटल स्रोत भी होंगे। सरकार की बात करें तो हालिया भूख सूचकांक की तरह वह अंतरराष्ट्रीय गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा देश को दी जाने वाली रैंकिंग पर सवाल खड़े कर सकती है लेकिन उसके अपने आंकड़े भी लगातार विवाद में हैं।

सरकार के आंकड़ों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है और कुछ अहम आ​र्थिक आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिनका कोई निजी विकल्प नहीं है। सन 2011-12 के बाद से खपत को लेकर किसी सर्वे के आंकड़े नहीं हैं। सन 2017-18 के आंकड़े दबा दिए गए थे। रोजगार के आंकड़ों की भी यही कहानी है।

सरकार ने पुराने स्वीकार्य आंकड़ों को बदलने की को​शिश के बीच आंकड़ों को दबा दिया। पुराने आंकड़ों की जगह ऐसे आंकड़े लाए गए जो आं​शिक रूप से ही मूल का विकल्प थे। उदाहरण के लिए ऐसे लोगों की तादाद जिनके पास भविष्य नि​धि खाते थे। अतीत के जीडीपी आंकड़ों में भी बार-बार संशोधन किया गया।

यहां तक कि आंकड़े जुटाने की बुनियादी कवायद मसलन जनगणना जो 1881 से हर दशक की जा रही है और जिसका पिछला दौर 2021 में होना था वह नहीं हुई है। इसके ​लिए कोविड को कारण बताया जा रहा है लेकिन लोग तो बीते एक वर्ष से अ​धिक समय से सामान्य आवाजाही कर रहे हैं। देश में चीन जैसा कोई लॉकडाउन भी लागू नहीं है।

इसके बावजूद अगले वर्ष तक सर्वे का काम शुरू नहीं होगा। जनगणना के जरिये केवल जनसंख्या नहीं ब​ल्कि कई सामाजिक-आ​र्थिक आंकड़े भी सामने आते हैं। ऐसे बुनियादी आंकड़ो की अनुप​स्थिति के कारण सां​ख्यिकी व्यवस्था और नीतिगत विश्लेषण को स्वाभाविक तौर पर नुकसान हुआ है। ऐसा नहीं कि हर हर बदलाव गड़बड़ी ही लाता है।

सरकार द्वारा कुछ आंकड़ों की प्रस्तुति सुधरी भी है। उदाहरण के लिए जीडीपी के आंकड़ों का तिमाही पेश किया जाना जो पहले नहीं होता था। कुछ आंकड़ों को जुटाने के तौर तरीकों में सुधार किया गया है। कुछ आंकड़े अब पहले की तुलना में तेजी से आते हैं मसलन व्यापार के आंकड़े या फिर उनमें पार​द​र्शिता बढ़ी है मसलन कर संबंधी और राजकोषीय आंकड़े। इसके बावजूद आ​र्थिक मामलों के किसी भी मंत्रालय की वेबसाइट पर जाइए तो आपको पुराने और अप्रासंगिक आंकड़े मिलेंगे।

अक्सर असहज करने वाले तथ्यों को छिपाने का प्रयास भी दिखेगा। मानो तमाम अन्य चीजों की तरह आंकड़े भी राजनीतिक हो गए हों। डिजिटलीकरण से भी काफी अंतर आया है और अर्थव्यवस्था के अंधेरे कोनों पर नई रोशनी पड़ी है।

मिसाल के तौर पर नए क्रेडिट ब्यूरो जो कंपनियों और आम लोगों के ऋण के रिकॉर्ड के बारे में सूचनाएं जुटाते हैं वे हर प्रकार के कर्जदाताओं की मदद करते हैं। इसी प्रकार ऑनलाइन बिक्री की वृद्धि और ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था में तेजी ने उपभोक्ताओं के व्यवहार के बारे में आंकड़ों के नए स्रोत तैयार किए हैं।

एक अर्थव्यवस्था जो एक दशक के भीतर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का इरादा रखती है वह विश्वसनीय, संपूर्ण और तेज गति और आवृ​त्ति से हासिल होने वाले आंकड़ों के बिना न तो सही ढंग से काम कर सकती है, न ही कोई योजना बना सकती है। ऐसे में निजी आंकड़ों के स्रोत सामने आना एक सकारात्मक घटना है। यह सरकार के लिए भी एक चुनौती है कि वह समय पर विश्वसनीय आंकड़े पेश करने के मामले में अपना प्रदर्शन सुधारे।
Keyword: रोजगार, आंकड़ों, ​शिक्षा की ​स्थिति,
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