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पूर्वोत्तर राज्यों का श्रम क्षेत्र में सराहनीय प्रदर्शन

महेश व्यास /  11 03, 2022

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के कंज्यूमर पिरामिड हाउसहोल्ड सर्वे (सीपीएचएस) की पूर्वोत्तर में सीमित पहुंच है। यह सर्वे असम, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम में होता रहा है। सीएमआईई पूरब में और आगे सीमावर्ती राज्यों अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम तक सीपीएचएस की पहुंच स्थापित नहीं कर पा रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन सीएमआईई अपने सर्वे को इन राज्यों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

 उपलब्ध आंकड़ों से यह पता चलता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों का श्रम के क्षेत्र में सराहनीय प्रदर्शन है। श्रम सहभागिता दर (एलपीआर) और रोजगार दर  में शीर्ष पर मेघालय और त्रिपुरा हैं। सबसे ज्यादा एलपीआर मेघालय में 60 फीसदी से अ​धिक है। यहां रोजगार दर भी सबसे ज्यादा करीब 60 फीसदी है। बेरोजगारी की दर सबसे कम तकरीबन 2 फीसदी है।

मेघालय के बाद त्रिपुरा की सबसे ज्यादा करीब 52 फीसदी एलपीआर है। यहां रोजगार दर अपेक्षाकृत कम करीब 45 फीसदी है और बेरोजगारी की दर कुछ अधिक करीब 14 फीसदी है। हालांकि असम में श्रम के आंकड़े शानदार हैं। असम में एलपीआर 48 फीसदी है। हाल के समय में इस राज्य में बेरोजगारी की दर बढ़कर 7-9 फीसदी हो गई है। लेकिन इसकी रोजगार दर शानदार है और करीब 44 फीसदी है।

पूर्वोत्तर के इन राज्यों के श्रम बाजार के आंकड़ों की सबसे अच्छी जानकारी तब मिलती है जब इनकी तुलना अखिल भारतीय औसत से की जाती है  जिनमें एलपीआर 40 फीसदी से कम, रोजगार दर करीब 37 फीसदी और बेरोजगारी की दर करीब 7-8 फीसदी है। सरकारी सां​ख्यिकीय प्रणाली में भी ये आंकड़े हैं।

 आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2020-21 के मुताबिक मेघालय में रोजगार दर करीब 62 फीसदी और त्रिपुरा में 54 फीसदी थी। यह सीपीएचएस के अनुमानों से अधिक है लेकिन पीएलएफएस के आंकड़े प्रदर्शित करते हैं कि इन राज्यों के उच्च औसत श्रम मानदंड हैं। पीएलएफएस के मुताबिक उत्तर पूर्व के जिन राज्यों को सीपीएचएस में शामिल नहीं किया गया है, उनकी बेरोजगारी दर मेघालय और त्रिपुरा से खराब है। ये दो राज्य मेघालय और त्रिपुरा श्रम आंकड़ों के मामले में आगे दिखाई देते हैं। 

दोनों राज्यों मेघालय और त्रिपुरा की सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं। इन दोनों राज्यों में श्रम के आंकड़े शानदार हैं। असम की सीमा बांग्लादेश और भूटान से लगती है। पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की सीमाएं नेपाल, भूटान और म्यांमार से लगती हैं। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों की सीमाएं 'लैंडलॉक' हैं यानी पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य की सीमा समुद्र से नहीं लगती है।

 सभी राज्यों में मेघालय कई मायनों में अलग है। यहां बारिश अधिक होती है और पहाड़ हैं। मेघालय का शाब्दिक अर्थ है जहां मेघों का निवास हो। मेघालय में पृथ्वी पर सबसे अधिक बारिश वाला स्थान चेरापूंजी है। विकिपीडिया के मुताबिक इस राज्य की ज्यादातर आबादी आदिवासी है और करीब 75 फीसदी आबादी ईसाई धर्म का पालन करती है।

रोचक तथ्य यह है कि यह राज्य मातृसत्तात्मक प्रणाली को अपनाता है जहां महिला से वंश और विरासत तय होती है। इस राज्य में सबसे छोटी बेटी को पूरी संपत्ति मिलती है और वह अपने माता-पिता की देखभाल करती है।

 मातृसत्तात्मक प्रणाली होने के कारण ही भारत के इस राज्य में सबसे अधिक महिला एलपीआर दर है। मई-अगस्त, 2022 को इस राज्य में महिला एलपीआर 49.5 फीसदी थी। यह बांग्लादेश के 36 फीसदी से भी अधिक है। महिला एलपीआर में दूसरे स्थान पर तेलंगाना है जहां पर यह दर 27.1 फीसदी है। उच्च महिला एलपीआर पर यह सामान्य तर्क दिया जाता है कि गरीब राज्य बेरोजगार रहने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। मेघालय में तुलनात्मक रूप से कम प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) है। साल 2021-22 में यह राष्ट्रीय औसत 1,07,670 रुपये का दो तिहाई 69,133 रुपये था।

लेकिन बिहार (34,465 रुपये), उत्तर प्रदेश (47,857 रुपये) और झारखंड (61,905 रुपये) से तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक मेघालय का जीएसडीपी है। मेघालय से कम एलपीआर बिहार में 3.05 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 2.18 फीसदी और झारखंड में 2.09 फीसदी है। मेघालय की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। लेकिन कई अन्य राज्यों की तुलना में मेघालय की अर्थव्यवस्था खेती पर कम आधारित है।

मेघालय में कृषि में 29 फीसदी से कम रोजगार है जबकि मई-अगस्त 2022 में अखिल भारतीय स्तर पर कृषि में रोजगार में रोजगार 36 फीसदी रहा। मेघालय की करीब 21 फीसदी आबादी रियल इस्टेट और निर्माण क्षेत्र में कार्यरत है। बीते कुछ समय में श्रम आंशिक रूप से खेती व अन्य सहयोगी गतिविधियों को छोड़कर निर्माण क्षेत्र में आ गया।

यदि यह गरीबी या रोजगार की औद्योगिक संरचना आधारित रोजगार के लिए अनुचित व्याख्या यह की जाती है कि मेघालय में असाधारण रूप से महिलाओं की उच्च एलपीआर है। ऐसे में यह भी संभव है कि ईसाई और मातृसत्तात्मक कारण राज्य में ऐसी स्थिति होती है। 

हालांकि राज्य में दोहरे इंजन यानी दोनों पुरुष और महिलाओं की सहभागिता का श्रम बाजार में समुचित रूप से दोहन नहीं किया गया है। पूर्वोत्तर के राज्यों में मेघालय में सबसे कम प्रति व्यक्ति जीएसडीपी है। हो सकता है कि मणिपुर में कम हो लेकिन 2021-22 के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। शायद पहाड़ी इलाका निवेश के लिए चुनौती खड़ा करता है। लेकिन राज्य में महिलाओं की रोजगार पाने की ललक उत्साहवर्धक है। त्रिपुरा में ज्यादातर बांग्ला बोलने वाले प्रवासी हिंदू है।

सबसे अधिक साक्षरता दर वाले राज्यों में से एक त्रिपुरा है। देश में मेघालय और तेलंगाना के बाद तीसरे स्थान पर त्रिपुरा में महिला एलपीआर  23.8 फीसदी है। त्रिपुरा न ही तो आदिवासी राज्य है, न ही ईसाई बहुल राज्य है और न ही मातृसत्तात्मक राज्य है। यहां साक्षरता की दर अधिक है लेकिन ऐसे ही राज्य केरल में महिलाओं की एलपीआर बेहद कम है। 

त्रिपुरा की संस्कृति प्रवासियों से प्रभावित है जो उच्च एलपीआर होने का कारण बताती है।  सबसे अच्छा है कि उच्च महिला एलपीआर के कारण जानने का काम शिक्षाविदों पर छोड़ दिया जाए। लेकिन यहां पर यह अधिक ध्यान देने योग्य है कि पूर्वोत्तर के इन राज्यों में महिला एलपीआर का उच्च होना बेमिसाल है।

आजकल के मुकाबले आने वाले दिनों में उच्च महिला साक्षरता और उच्च एलपीआर के बूते बेहतर जीएसडीपी प्राप्त की जा सकती है। हालांकि जिन राज्यों में महिलाएं काम करने के लिए ज्यादा इच्छुक नहीं हैं, उनके मुकाबले इस क्षेत्र में श्रमआधारित उद्योगों में निवेश कर बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

(लेखक सीएमआईई प्राइवेट लिमिटेड के लेखक हैं)
 
Keyword: इंडियन इकॉनमी, हाउसहोल्ड सर्वे,
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