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मुद्रास्फीति से मुकाबला

बीएस संपादकीय /  11 03, 2022

 लगातार ऊंची बनी हुई मुद्रास्फीति के ​खिलाफ पूरी दुनिया की लड़ाई जारी है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) ने उम्मीद के मुताबिक ही बुधवार को नीतिगत ब्याज दरों या कहें फेडरल फंड दरों में लगातार चौथी बार इजाफा किया और इसे 75 आधार अंक बढ़ा दिया।

अमेरिकी केंद्रीय बैंक सन 1980 के दशक के बाद सबसे तेज गति से दरों में इजाफा कर रहा है और ऐसा मुद्रास्फीति से निपटने के लिए किया जा रहा है।अमेरिका में मुद्रास्फीति चार दशक के उच्चतम स्तर पर है और यह मध्यम अव​धि के दो फीसदी के लक्ष्य से काफी अ​धिक है। सितंबर में यह दर 8.2 फीसदी थी।

फेडरल रिजर्व जहां मुद्रास्फीति की दर को मध्यम अव​धि के लक्ष्य के आसपास लाने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दुनिया भर के वित्तीय बाजार दो अत्यंत अहम सवालों से जूझ रहे हैं। पहला सवाल, फेड दरों में इजाफे की गति को कितनी जल्दी कम करेगा और दूसरा मौजूदा चक्र के लिए टर्मिनल फंड्स की दर क्या होगी?

बुधवार को पहले वित्तीय बाजारों को यह संकेत मिला कि दरों में इजाफे की गति को अब कम किया जाएगा क्योंकि एफओएमसी ने अपने वक्तव्य में कहा कि भविष्य में दरों में इजाफे का निर्णय करते हुए वह समेकित मौद्रिक सख्ती को ध्यान में रखेगी। बहरहाल, फेड अध्यक्ष जेरोम पॉवेल की तरफ से आए स्पष्टीकरण में कहा गया कि शायद यह काम अब तक पूरा नहीं हुआ है। इसके बाद शेयर बाजार में बिकवाली देखने को मिली।

पॉवेल ने यह भी कहा कि फिलहाल अ​धिक महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि आ​खिर दरों में किस हद तक इजाफा करने की जरूरत होगी और कितने लंबे समय तक मौद्रिक नीति को प्रतिबंधात्मक बनाकर रखना होगा। ऐसे में यह संभव है कि भले ही दरों में इजाफे की गति आने वाली बैठकों में कम की जाए लेकिन टर्मिनल दर अभी हाल तक जताए गए अनुमान की तुलना में अ​धिक रहेगी। फेड का मानना है कि अत्य​धिक सख्ती का जो​खिम कम सख्ती की तुलना में बेहतर रहेगा।  

अमेरिकी श्रम बाजार की बात करें तो वहां बहुत अ​धिक तंगी है ऐसे में मुद्रास्फीति के कुछ समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने की उम्मीद है। एक अनुमान के मुताबिक मूल मुद्रास्फीति की दर के अगले वर्ष की पहली तिमाही तक 6 फीसदी के स्तर के ऊपर बने रहने की आशा है। जिस स्तर की अपस्फीति की आवश्यकता है उससे पता चलता है कि वित्तीय हालात काफी सख्त होंगे और दरें भी कुछ समय तक ऊंचे स्तर पर रहेंगी। इससे वै​श्विक वित्तीय बाजारों में जो​खिम बढ़ सकता है।

अमेरिका में निरंतर पूंजी प्रवाह से मुद्रा बाजारों में अ​स्थिरता बढ़ेगी और शायद कुछ देशों में वांछित से अ​धिक मौद्रिक सख्ती की आवश्यकता होगी। बड़े केंद्रीय बैंकों द्वारा सुसंगत तरीके से ब्याज दरों में इजाफा भी वित्तीय ​स्थिरता के जो​खिम बढ़ाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक भी मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ब्याज दरों में इजाफा कर रहा है। हमारे यहां भी मुद्रास्फीति की दर ​लगातार तीन तिमाहियों से तय दायरे से ऊपर है और कहा जा रहा है कि केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति संबंधी लक्ष्य को हासिल कर पाने में नाकाम रहा है। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने गुरुवार को बैठक में सरकार को एक पत्र का मसौदा तैयार किया। कानूनी जरूरत के मुताबिक तैयार इस पत्र में मुद्रास्फीति नियंत्रण में नाकामी की वजह स्पष्ट की जानी है।

सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह जल्द से जल्द इस पत्र को सार्वजनिक करे। रिजर्व बैंक ने कहा है कि नीतियों को जल्दी सख्त बनाने के कारण वृद्धि पर असर पड़ा। यह बात ध्यान देने लायक है कि रिजर्व बैंक ने देर से शुरुआत की क्योंकि उसका आकलन था कि महामारी के बाद उच्च मुद्रास्फीति का दौर अस्थायी था।

चाहे जो भी हो बड़े केंद्रीय बैंकों द्वारा निरंतर सख्ती, खासकर फेडरल रिजर्व द्वारा सख्ती से एमपीसी की जटिलताएं बढ़ेंगी। हालांकि इसका लक्ष्य घरेलू स्तर पर मूल्य ​स्थिरता है लेकिन शायद उसने इस संभावना को भी ध्यान में रखा हो कि बड़े पैमाने पर पूंजी बाहर जा सकती है और मुद्रा बाजार में अ​स्थिरता आ सकती है क्योंकि मुद्रास्फीति संबंधी नजरिये उन पर भी असर डालेंगे।

Keyword: मुद्रास्फीति, फेडरल रिजर्व,
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