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बैंकों में जमा राशि के लिए बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

तमाल बंद्योपाध्याय /  11 02, 2022

बैंकिंग प्रणाली में 7 अक्टूबर को जमा राशि का पोर्टफोलियो 172.8 लाख करोड़ रुपये और लोन बुक 128.6 लाख करोड़ रुपये हो गई है। अभी तक इस वित्त वर्ष में जमा वृद्धि 4.9 फीसदी जबकि ऋण वृद्धि 8.1 फीसदी रही है। 

यह रुझान बीते एक साल में जमा वृद्धि 9.6 फीसदी के मुकाबले ऋण वृद्धि 17.9 फीसदी के अनुरूप है। बैंकिंग प्रणाली में उधारी के पोर्टफोलियो से कहीं ज्यादा जमा राशि है।  बीते एक साल में जमा राशि 15.2 लाख करोड़ रुपये और उधारी राशि 19.6 लाख करोड़ रुपये रही।  उसी तारीख को वृद्धिशील उधारी जमा अनुपात 120 रहा। इसका अर्थ यह हुआ है कि 100 रुपये की जमा राशि पर बैंक 120 रुपये उधारी दे रहे हैं। हालांकि बकाया ऋण जमा अनुपात 74.45 है।

आमतौर पर बैंक को 100 रुपये बैंक में जमा होने पर भारतीय रिजर्व बैंक के पास 4.5 रुपये नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) के तौर पर रखने की जरूरत होती है। बैंक को सीआरआर पर कोई ब्याज नहीं मिलता है। इसके बाद 18 रुपये सरकारी प्रतिभूतियां को खरीदने के लिए जमा करने पड़ते हैं (लेकिन बैंकों ने अपनी देनदारियों का 29 फीसदी सरकारी बॉन्ड में निवेश कर रखा है)। इन नियामकीय आरक्षित जरूरतों को पूरा करने के बाद बैंक के पास उधारी देने के लिए 77.5 रुपये बचते हैं।

हालांकि वे जमा राशि से अधिक भी उधारी दे सकते हैं क्योंकि यही उनके लिए उधारी देने का स्रोत नहीं होता है। बैंक उधारी को बढ़ावा देने के लिए पूंजी और रिजर्व के साथ-साथ बाजार से ऋण भी ले सकते हैं। ऐसे भारत के बैंकिंग के आधार को बरकरार रखने के लिए बैंकों को अधिक जमाराशि का इंतजाम करना होगा। यदि बैंकों ने अधिक जमाराशि का इंतजाम नहीं किया तो उन्हें हालिया उधारी दर को बरकरार रखने में दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

 कई बैंक अपने देनदारी पोर्टफोलियो की मदद के लिए बाजार से अल्प अवधि प्रमाणपत्र पर रकम जुटा रहे हैं। हालांकि देश में सबसे ज्यादा उधारी देने वाले बैंक ने हाल में सीडी मार्केट टेस्ट किया है। बैंकों के समक्ष ज्यादा विकल्प उपलब्ध नहीं हैं। यदि बैंकों की सितंबर तिमाही की कमाई पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे कि एक बैंक की जमा राशि में उतनी ही बढ़त हुई है जितनी उनके ऋण में बढ़ोतरी हुई। कुछ बैंकों में प्रतिशत के संदर्भ में देखा जाए तो ऋण की आधी वृद्धि से भी कम जमा राशि की बढ़ोतरी रही।

 ऐसी स्थिति होने पर यह स्वाभाविक है कि जमा राशि पर ब्याज दर बढ़ानी होगी। यदि आप मुंबई के वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे पर गाड़ी लेकर जाते हैं तो सड़क के किनारे लगे बड़े इश्तहारों से इस क्षेत्र में शुरू हो चुकी प्रतिस्पर्धा का आभास हो जाएगा। दक्षिण भारत स्थित एक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ने सावधि जमा करने के लिए मुंबई के उपनगरीय इलाकों की सड़कों तक प्रयास तेज कर दिए हैं।

 बैंकों ने सावधि जमा के अलावा चालू और बचत खाते या कासा के जरिये सस्ते में धन एकत्रित करना शुरू कर दिया है। वे बचत खातों पर कम से कम पेशकश मुहैया कराते हैं और चालू खाते में रकम ब्याजमुक्त है। इसका अर्थ यह है कि जिस बैंक के पास ज्यादा कासा है, उसके लिए  धन की लागत भी कम है।

जून की तिमाही में कोटक महिंद्रा बैंक के पास उसकी जमा राशि का अधिकतम 58.1 फीसदी कासा में था। इसके बाद जम्मू ऐंड कश्मीर बैंक (55.74 फीसदी) और आईडीबीआई बैंक लिमिटेड (55.65 फीसदी) थे। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक का सीएएसए 50 फीसदी से अधिक था। हालांकि आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक , ऐक्सिस बैंक, बंधन बैंक और इंडसइंड बैंक का कासा 46.9 फीसदी से 43 फीसदी था। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बैंक ऑफ महाराष्ट्र का अधिकतम कासा (56.08 फीसदी), उसके बाद सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (51.15 फीसदी) का  था।

तीन बैंकों केनरा बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब ऐंड सिंध बैंक को छोड़कर अन्य सभी बैंकों का कासा 40 फीसदी से अधिक था। एसबीआई का कासा 45.33 फीसदी से अधिक पंजाब नेशनल बैंक का सीएएसए 46.34 फीसदी था।  

जब तक कासा में चालू खाते का प्रतिशत पर्याप्त नहीं रहता है तब तक कासा से जमा की लागत कम नहीं होती है। इसी तरह कोई बैंक दूसरे बैंक द्वारा सावधि जमा पर दिए जाने वाले ब्याज की तुलना में अपने ग्राहकों को बचत खाते पर अधिक ब्याज दे सकता है।

सावधि जमा में बहुत ज्यादा राशि जमा होती है तो उसकी लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा बैंक के सामने यह खतरा भी रहता है कि अत्यधिक मात्रा में धन की निकासी हो सकती है। इसलिए एसबीआई सहित कुछ बैंकों ने कुल जमाराशि का कुछ प्रतिशत ही जमा करने पर सीमा लगा रखी है।

 खुदरा जमा करने की प्रतिस्पर्धा जब खुले में आ जाती है तो अत्यधिक बड़ी राशि के जमा करने के मामले में प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। सरकारी उपक्रमों सहित बहुत बड़े आर्थिक संसाधनों वाले कॉरपोरेट अपनी अतिरिक्त राशियों के लिए बोली लगा रहे हैं। हाल यह है कि बंद लिफाफे में बैंक की बोलियां ऐसी कॉरपोरेट या सरकारी उपक्रमों के ट्रेजरी के प्रबंधन करने वाले डेस्क तक पहुंचती हैं।

 इसका एक विचित्र पक्ष भी है। कुछ बैंक अयोग्य सरकारी उपक्रमों को उधारी दे रहे हैं और उन्हीं इकाइयों पर राशि जमा कर रहे हैं। जमा की गई राशि पर ब्याज नाममात्र का कम हो सकता है, बराबर है या उधारी की दर से कुछ अधिक हो सकता है! यही वही पुरानी कहानी है जिसमें बैलेंस शीट को बेहतर बनाना होता है।

हालांकि जमा पर ब्याज दरें बढ़ने या बैंक जमा करने वाले को जितना भुगतान करते हैं और इस उधारी से जितना कमाते हैं, उससे बैंक के शुद्ध मुनाफे पर प्रभाव पड़ता है। ऐसे में बैंकों के समक्ष विकल्प यह है कि वे अपने निवेश पोर्टफोलियो में तरलता बढ़ाने के अन्य विकल्पों पर विचार करें।

 दो साल पहले अक्टूबर 2020 के पहले सप्ताह में बकाया निवेश जमा की दर 31.19 फीसदी था जबकि वृद्धिशील निवेश जमा की दर कहीं अधिक उच्च 97.18 फीसदी थी। महामारी वाले साल में मुश्किल से ही कोई उधारी ले रहा था। ऐसे में बैंक को अपने ज्यादातर निवेश सरकारी प्रतिभूतियों में रखने पड़ रहे थे। हालांकि अब तुलनात्मक आंकड़े 29.55 और 46.48 हैं।

 यदि उन्हें यह करने के लिए मजबूर किया जाता है तो सरकार की उधारी लेने की लागत बढ़ जाएगी। कोरोना प्रभावित वित्तीय वर्ष 2021 में सरकार की कुल उधारी तेजी से उछल लेकर 13.7 लाख करोड़ रुपये (शुद्ध 11.43 लाख करोड़) हो गई। यह बीते साल की तुलना में दोगुनी (जब सरकार की उधारी 7.10 लाख करोड़ रुपये और शुद्ध 4.74 लाख करोड़ रुपये) थी। बीते साल यह गिरकर 11.27 लाख करोड़ रुपये (शुद्ध 8.63 लाख करोड़ रुपये) थी।

इसके बाद इस साल यह ऐतिहासिक उच्च स्तर 14.31 लाख करोड़ रुपये (शुद्ध 11.61 लाख करोड़ रुपये) पहुंच गई। इसमें सर्वोपरि राज्य के विकास से जुड़ी उधारियां थीं।

आरबीआई के कदम वापस खींचने के संदर्भ में हर कोई प्रणाली में तरलता में कमी की बात कर रहा है। प्रणाली में 25 अक्टूबर को शुद्ध तरलता का घाटा 98,312 करोड़ रुपये था। इसमें सरकार की खर्च करने की पहल ने भी योगदान दिया।

हालांकि लोगों के पास धन या मुद्रा का चलन तेजी से बढ़ रहा है। नोटबंदी से कुछ समय पहले नवंबर, 2016 में 17.7 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा चलन में थी।

इसके बाद अगले छह हफ्तों दिसंबर के अंत तक यह संकुचित होकर 9.2 लाख करोड़ रुपये हो गई। इस साल 7 अक्टूबर तक यह करीब साढ़े तीन गुना बढ़कर 31.6 लाख करोड़ रुपये हो गई थी। आमतौर पर त्योहारी मौसम और चुनाव के दौरान मुद्रा का चलन बढ़ जाता है। (मुद्रा के चलन का कुछ हिस्सा बैंक की शाखाओं में रखा गया धन भी होता है)।

बैंक के कार्य सीमित हो गए हैं। बैंकों को तरलता की कमी का आरोप लगाने के बजाए अपने धन के कुछ हिस्से पर उच्च सावधि जमा मुहैया करानी चाहिए। यह उन लोगों को भी समझाने का एकमात्र तरीका है जिनके पास अन्य परिसंपत्ति वर्गों को छोड़कर बैंक में जमा कराने के लिए धन है।

 हम पसंद करें या नहीं करें, भारतीय रिजर्व बैंक दिसंबर में फिर नीतिगत दर में बढ़ोतरी करेगा। ऐसे में बढ़ती ब्याज दर के चक्र में बैंकिंग प्रणाली के समक्ष यह चुनौती होगी कि वह कैसे शुद्ध ब्याज दर मार्जिन को स्वस्थ रखती है। उधारी के इंजन ने गति लेनी शुरू कर दी है। लिहाजा उन्हें देनदारी प्रणाली को दुरुस्त करने की जरूरत है। स्मार्ट बैंकर्स जानते हैं कि बैंकिंग कारोबार में पूंजी से अधिक महत्त्वपूर्ण देनदारियों का प्रबंधन है।

Keyword: जमा वृद्धि, लोन बुक,
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