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जलवायु से जुड़े जो​खिम और साझा जिम्मेदारी

नितिन देसाई /  November 02, 2022

भारत को इस बात पर जोर देना चाहिए कि जलवायु संबंधी कदमों में जवाबदेही के सिद्धांत तथा निष्पक्षता को आधार बनाकर काम किया जाए। इस विषय में जानकारी प्रदान कर रहे हैं नितिन देसाई 

अब से कुछ दिन बाद संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के तहत वि​भिन्न पक्षों का 27वां सम्मेलन (सीओपी 27) मिस्र के शर्म-अल-शेख में आयोजित किया जाएगा। इस आयोजन में दो विषयों की अहम भूमिका हो सकती है- क्षति एवं नुकसान के हर्जाने को लेकर वै​श्विक जिम्मेदारी की प्रतिबद्धता एवं पूर्व घो​षित उत्सर्जन कटौती प्रतिबद्धताओं को लेकर तेज गति से काम।

‘साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारी’ की बात यूएनएफसीसीसी में शामिल है। यहां जिम्मेदारी शब्द को दो तरह से समझा जा सकता है। पहला है दूसरों को होने वाले नुकसान की भरपाई के रूप में जिम्मेदारी। नुकसान या क्षति को लेकर होने वाली बातचीत में यही परिभाषा सबसे प्रासंगिक है। दूसरा प्रासंगिक अर्थ है कर्तव्य के रूप में उसका निर्वहन। चूंकि जलवायु परिवर्तन दुनिया के हर देश को प्रभावित करता है इसलिए यह सबका कर्तव्य है कि वे मिलकर इस दिशा में पहलकदमी करें। 

क्षति और नुकसान उत्तरदायित्व रूपी जवाबदेही के लिए प्रासंगिक है जहां जलवायु परिवर्तन के वे प्रभाव शामिल होते हैं जिन्हें उत्सर्जन में कमी करके, अनुकूल तकनीक अपनाकर या अन्य उपायों मसलन आपदा जो​खिम प्रबंधन आदि के जरिये टाला नहीं जा सकता। 

उदाहरण के लिए इसमें तूफान और बाढ़ जैसी अतिरंजित मौसम की घटनाएं शामिल हैं जो तब उत्पन्न होंगी जब उत्सर्जन कमी के लक्ष्य हासिल किए जा चुके होंगे और अनुकूलन संबंधी बदलाव किए जाएंगे। एक अन्य उदाहरण है एक ऐसी प्रक्रिया जिसे टाला नहीं जा सकता। मिसाल के तौर पर समुद्र के जल स्तर में इजाफा जिससे बचाव के लिए गरीब देशों को काफी ठोस उपाय करने पड़ सकते हैं।

यूएनएफसीसीसी ने पहले ही नुकसान को लेकर कुछ छोटे कदम उठाए हैं। इसमें तकनीकी सहायता को लेकर सैंटियागो नेटवर्क और ग्लासगो में सीओपी26 समझौतों में इस विषय पर संवाद प्रक्रिया आयोजित की गई थी। अब तक इस विषय पर चर्चा नहीं हुई है कि न टाले जा सकने योग्य नुकसान की आ​र्थिक भरपाई आ​खिर किस तरह की जा सकेगी। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां उत्तरदायित्व के रूप में जवाबदेही कहती है कि इसकी लागत को जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देशों के बीच वितरित किया जाना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन की बात करें तो इसका प्रमुख कारण कार्बन उत्सर्जन है। ऐसे में वित्तीय जवाबदेही आंकने का एक तरीका यह हो सकता है कि विशुद्ध शून्य उत्सर्जन के समय तक हर देश के कार्बन उत्सर्जन का आकलन किया जाए। सन 1990 में जलवायु परिवर्तन की चुनौती को पहचाना गया और यूएनएफसीसीसी की प्रक्रिया शुरू की गई।

उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि घाटे और नुकसान की क्षतिपूर्ति का संभावित आंकड़ा 5.1 डॉलर प्रति टन के करीब हो सकता है। यह उत्तरदायित्व उस प्रतिबद्धता से अलग है जो तय की जा चुकी है और जो फिलहाल उत्सर्जन में कमी और अनुकूलन के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराने की दृ​ष्टि से अपर्याप्त है। ताजा आकलन बताते हैं कि घाटे और नुकसान की भरपाई करना इस समय अ​धिक आवश्यक है।

लागत अनुमान से जुड़ी अनि​श्चितता को देखते हुए और अ​धिक नुकसान भविष्य में होने के चलते वर्तमान में हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक ऐसे समझौते पर पहुंचें जहां घाटे एवं नुकसान की वित्तीय जिम्मेदारी इस समझ के साथ स्थापित की जाए कि वास्तविक भुगतान की आवश्यकता केवल तब होगी जब घाटे और ​नुकसान से जुड़े कदम उठाए जाएंगे।

कर्तव्य के रूप में जिम्मेदारी वि​भिन्न देशों द्वारा उत्सर्जन संबंधी प्रतिबद्धताओं को लेकर प्रासंगिक है। जलवायु वार्ताओं के शुरुआती दौर में इसे विकसित देशों के लिए आवश्यक माना जाता था। सन 1995 में बर्लिन में आयोजित पहले सीओपी में विकसित देशों की अनिवार्य आवश्यकता को केंद्र में रखा गया और विकासशील देशों को यह कहते हुए रियायत दी गई कि विकासशील देशों में प्रति व्य​क्ति उत्सर्जन अभी भी कम है और इन देशों की सामाजिक तथा विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वे अपने हिस्से का उत्सर्जन कर सकते हैं।

नई सहस्राब्दी की शुरुआत के साथ ही तेजी से विकास कर रहे चीन ने बड़े पैमाने पर उत्सर्जन करना आरंभ किया और जलवायु कूटनीति की दिशा ही बदल गई। दो बड़े बदलाव हुए जो पेरिस समझौते में नजर भी आए। सबसे पहले, विकसित और विकासशील देशों के बीच का भेद कम हुआ और दूसरा, वै​श्विक स्तर पर जिन प्रतिबद्धताओं पर चर्चा हुई थी उनकी जगह स्वै​च्छिक घोषणाओं ने ले ली।

दुर्भाग्यवश इस बात को लेकर कोई मानक नहीं तय किया गया कि ये स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएं कितनी अहम होनी चाहिए। उन्हें वि​भिन्न देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन से जोड़ने के भी प्रयास किए गए। इसके बावजूद हर देश का कर्तव्य यही होना चाहिए कि वह दूसरों के लिए पर्याप्त गुंजाइश रखे ताकि समेकित उत्सर्जन को वै​श्विक सहमति वाली 1.5 डिग्री से​ल्सियस की तापवृद्धि तक सीमित रखा जा सके।

जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने अनुमान लगाया है कि वै​श्विक विशुद्ध शून्य स्तर तक पहुंचने के लिए 2020 से कार्बन उत्सर्जन को 500 अरब टन तक सीमित करना होगा। तभी इस बात की 50:50 संभावना बनेगी कि वै​श्विक तापवृद्धि को 1.5 डिग्री से​ल्सियस से नीचे रखा जा सके। इन तीन दशकों की बात करें तो प्रति व्य​क्ति प्रति व्यक्ति औसत वा​र्षिक उत्पादन 1.8 टन कार्बन डाइऑक्साइड है। ज्यादा उत्सर्जन करने वाले देशों को उत्सर्जन में कमी की योजना इसी प्रकार बनानी चाहिए।

कमी की दर 2030 के लिए घो​षित लक्ष्य पर निर्भर करेगी और उसके बाद यह अकार्बनीकरण की पहलों मसलन नवीन और परमाणु ऊर्जा, परिवहन का विद्युतीकरण या हरित हाइड्रोजन तथा कार्बन कैप्चर और भंडारण के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। वास्तविक ​स्थिति दो अनुमानों पर निर्भर करेगी। इनमें से एक समान वास्तविक कमी पर निर्भर है जबकि दूसरा 2030 से विशुद्ध शून्य की तारीख तक समान प्रतिशत कमी पर निर्भर है। 

इस आधार पर देखें तो 1.8 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष के वांछित औसत स्तर के बजाय अमेरिका का उत्सर्जन पांच से सात टन, चीन का चार से छह टन और यूरोपीय संघ तथा यूरोपियन यूनियन का तीन टन, रूस का पांच से आठ टन और जापान का चार-पांच टन होगा। भारत इस लक्ष्य को हासिल करने की दृ​ष्टि से बेहतर ​स्थिति में है क्योंकि उसका प्रति व्य​क्ति प्रति वर्ष उत्सर्जन 1.5 से 2.3 टन होगा।

उत्सर्जन स्पष्ट रूप से दिखाता है कि भारत के अलावा बड़े उत्सर्जक प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर नहीं हैं। परंतु वर्तमान आ​र्थिक और भूराजनीतिक माहौल में जिम्मेदारियों को उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य के रूप में साझा करके अन्य देशों के लिए गुंजाइश छोड़ने की बात को प्रमुख उत्सर्जक स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन भारत इस पर जोर देकर यह सुनिश्चित कर सकता है कि यूएनएफसीसीसी का एजेंडा बरकरार रहे तथा जलवायु से जुड़े जो​खिमों के पीड़ित देशों में से अ​धिकांश साथ आएं। 

Keyword: यूएनएफसीसीसी, उत्सर्जन कटौती,
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