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राजकोषीय मोर्चे पर जरूरी कदम

बीएस संपादकीय /  11 02, 2022

यह संभव है कि केंद्र सरकार इस वित्त वर्ष में सीमा एवं उत्पाद शुल्क के लिए तय राजस्व संग्रह लक्ष्य को हासिल न कर पाए। जैसा कि इस समाचार पत्र में प्रका​शित हुआ, इन मदों में एक लाख करोड़ रुपये तक की राजस्व कमी हो सकती है। मोटे तौर पर ऐसा इसलिए कि पेट्रोलियम उत्पादों और खाद्य तेल में शुल्क कटौती की गई।

सरकार को गैर कर राजस्व प्रा​प्तियों में भी कमी देखने को मिल सकती है क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक से कम लाभांश मिला है और गैर कर प्राप्तियों के अन्य मोर्चों पर प्रदर्शन निरंतर कमजोर पड़ा हुआ है। बहरहाल, सरकार को भरोसा है कि खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी के मामले में बजट की तुलना में अ​धिक व्यय के बावजूद वह राजकोषीय घाटे के अपने लक्ष्य को हासिल कर लेगी। यह​ विश्वास बेहतर कर संग्रह की बदौलत आया है।

वित्त वर्ष की पहली छमाही के इस सप्ताह जारी आंकड़े दिखाते हैं कि राजकोषीय घाटा बजट अनुमान के 37.3 प्रतिशत के स्तर पर था जो पिछले वर्ष की समान अव​धि के 35 प्रतिशत से थोड़ा अ​धिक है। 

हालांकि पहली छमाही में शुद्ध कर संग्रह बजट अनुमान के 52.3 प्रतिशत के स्तर पर था जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 59.6 फीसदी रहा था। ऐसे में अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि अंतिम आंकड़ा बजट अनुमान से काफी अधिक होगा। सरकार ने इस वर्ष के अपने उधारी लक्ष्य को भी 10,000 करोड़ रुपये कम किया है। सरकार चालू वर्ष में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 6.4 फीसदी के स्तर पर सीमित रखना चाहती है।

हालांकि सरकार का सतर्क रहना सही होगा क्योंकि अर्थव्यवस्था के वर्ष की दूसरी छमाही में और धीमा होने की उम्मीद है। सितंबर तिमाही के शुरुआती कॉर्पोरेट नतीजे बताते हैं कि आय वृद्धि में कमी आ रही है जो कर संग्रह को प्रभावित करेगी। सरकार चालू वर्ष के लक्ष्य को हासिल कर सकती है लेकिन उसे मध्यम अव​धि के लिए एक खाका तैयार करना होगा।

जानकारी के मुताबिक नीति निर्माता अगले बजट में राजस्व अनुमानों को लेकर अपने रूढि़वादी रुख को त्यागने पर विचार कर रहे हैं। चूंकि व्यय में अक्सर बजट अनुमान से परे निकल जाने की प्रवृ​त्ति होती है इसलिए अ​धिक आशावादी रुख रखने से राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है।

मध्यम अव​धि में राजकोषीय घाटा ऊंचा बना रह सकता है और ध्यान इस बात पर केंद्रित होना चाहिए कि कैसे उसे जल्दी से जल्दी कम किया जाए। इस संदर्भ में सरकार को लोकसभा चुनाव के पहले व्यय बढ़ाने की चाह को रोकना होगा। ध्यान रहे फरवरी 2023 का बजट चुनाव के पहले का अंतिम पूर्ण बजट होगा।

राजकोषीय घाटे को कम करने के अलावा सरकार अगर कुछ अन्य अहम सुधार करे तो बेहतर होगा। केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी वित्त आयोग की अनुशंसाओं की तुलना में काफी कम है। ऐसा मोटे तौर पर इसलिए कि केंद्र सरकार उपकरों और अ​धिभारों पर निर्भर है। केंद्रीय करों में उपकरों और अ​धिभारों की हिस्सेदारी 2014-15 के 6 फीसदी से बढ़कर अब 20 फीसदी से अ​धिक हो चुकी है। चूंकि इन्हें साझा नहीं किया जाता इसलिए राज्यों की कुल हिस्सेदारी कम हुई है।

इसमें सुधार की आवश्यकता है क्योंकि यह राज्यों के साथ उचित व्यवहार नहीं है। इसके साथ ही इससे वित्तीय असंतुलन भी पैदा हो सकता है। दूसरी बात, हालांकि यह पूरी तरह केंद्र सरकार के नियंत्रण में नहीं है लेकिन वह वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दरों को व्यावहारिक बनाने की दिशा में भी पहल कर सकती है।

अब यह सबको पता है कि जीएसटी व्यवस्था वांछित परिणाम नहीं दे सकी है। आं​शिक तौर पर ऐसा इसलिए हुआ कि दरों को समय से पहले कम कर दिया गया। इसमें सुधार की जरूरत है। यह केंद्र और राज्यों दोनों के लिए जरूरी है क्योंकि ऐसा करने से वृद्धि को बल देने वाले व्यय को बढ़ाने की गुंजाइश बनेगी। 

Keyword: राजस्व, उत्पाद शुल्क,
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