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असमय बारिश से मुरझाए बागवानों के चेहरे, लगी तगड़ी चपत

फीकी पड़ी गेंदा की चमक, गुलाब में नहीं आई रंगत
बीएस संवाददाता / लखनऊ 11 02, 2022

उत्तर प्रदेश में इस बार के मानसून में पहले सूखे और बाद में हुई जोरदार बारिश के बाद फूलों की खेती करने वालों के चेहरे मुरझा गए हैं। प्रदेश में फूलों की सबसे ज्यादा खेती वाले इलाके वाराणसी, लखनऊ और कन्नौज सहित ज्यादातर जिलों में बागवानों को इस बार तगड़ी चपत लगी है। 

असमय बारिश से फूलों में लगे कीड़े

सितंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर आधे अक्टूबर तक हुई जोरदार बारिश के चलते सबसे ज्यादा उगाए जाने वाले गेंदा के फूलों के रंग फीके और काले पड़े है तो गुलाब में कीटों का प्रकोप फसल चौपट कर रहा है। बागवानों का कहना है कि असमय की बारिश के चलते फूलों में बड़े पैमाने पर कीड़े लग गए हैं और जिस क्वालिटी के फूल तैयार हो रहे हैं उनके खरीददार नहीं मिल रहे हैं। मौसम की मार से अकेले गेंदा और गुलाब ही नहीं बल्कि चमेली, बेला और यहां तक कि तुलसी के पौधों पर भी असर पड़ा है।

स्थानीय की जगह बाहर से आ रहे फूलों की हो रही अधिक बिक्री

राजधानी लखनऊ में चौक व नवीन मंडी स्थल पर लगने वाली फूलों की थोक बाजार में खरीददारों का टोटा साफ नजर आ रहा है। वहीं जो फूल उपलब्ध भी हैं उनकी अच्छी कीमत नहीं लग पा रही है। मंडियों में स्थानीय की बजाय बाहर से आ रहे फूलों की उठान हो रही है और कीमत भी मंहगी लग रही है। 

बागवानों को इस बार लगी तगड़ी चपत 

प्रदेश में सबसे ज्यादा फूलों की खेती वाले जिले वाराणसी में बागवानों पर मार गहरी है जहां बीते महीने आई बाढ़ ने खासा नुकसान कर दिया था। वाराणसी जिले में 565 हेक्टेयर में फूलों की खेती होती है जिसमें सबसे ज्यादा करीब 130 हेक्टेयर का रकबा गेंदा का है। मंदिरों की बहुतायत के चलते वाराणसी शहर में ही फूलों की काफी मांग है वहीं बाहर भी फूल भेजे जाते हैं। 

वाराणसी के बाद हाल के दिनों में राजधानी लखनऊ में भी फूलों की खेती का चलन काफी बढ़ा है। लखनऊ शहर से सटे कस्बे बख्शी का तालाब, काकोरी से लेकर सीतापुर के इंटौजा और सिधौली तक में फूलों की खेती हो रही है। इसके अलावा कन्नौज, बलिया और जौनपुर में फूलों की खेती व्यावसायिक तरीके से की जा रही है।

असमय बारिश से गुलाब में नहीं आई रंगत 

लखनऊ में चौक स्थित फूलों की मंडी के कारोबारी अजय त्रिवेदी का कहना है कि फूलों की खेती के लिए जून, जुलाई और अगस्त महीने की बारिश काफी मुफीद मानी जाती है। इस बार इन महीनों में तो बारिश नहीं हुई जबकि अक्टूबर के महीनों में जब फूल तैयार हुए तो पानी कहर बन कर बरस गया। उनका कहना है कि जाते हुए मानसून की इस जोरदार बारिश के बाद गुलाब में रंगत नहीं आई और गेंदा सहित कई अन्य फूल बरबाद हुए हैं। 

त्योहारी सीजन में भी कारोबार ठंडा रहा 

त्रिवेदी बताते हैं कि वाराणसी के बाद लखनऊ में सबसे ज्यादा गेंदा और गुलाब के फूलों का कारोबार होता है जबकि कन्नौज और जौनपुर में इत्र उद्योग के लिए चमेली और बेला की मांग खासी रहती है। वाराणसी, बलिया व जौनपुर सहित पूर्वी जिलों में रोज 50 लाख रुपये के फूल बिक जाते थे तो राजधानी लखनऊ में सीजन में 20 लाख रुपये तक का कारोबार हो जाता था। इस बार नवरात्रि और दीवाली में कारोबार ठंडा रहा तो आने वाले सहालग व नए साल की मांग को लेकर भी कोई उत्साह नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि कोरोना के बाद से धंधा मंदा हुआ था और सामान्य के मुकाबले इस बार नवरात्रि, दीवाली के त्यौहारों में आधी बिक्री हो पाई है।
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