बिजनेस स?टैंडर?ड - उपज में इजाफा
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उपज में इजाफा

बीएस संपादकीय /  11 01, 2022

आनुवं​शिक इंजीनियरिंग आकलन समिति (जीईएसी) द्वारा स्वदेशी तौर पर विकसित परिवर्तित जीन वाले धारा सरसों हाइब्रिड-11 (डीएमएच-11) को पर्यावरण संबंधी मंजूरी दिए जाने को इस रूप में देखे जाने की आवश्यकता है कि यह वैज्ञानिक सलाहकार संस्था परिवर्तित जीन वाली खाद्य फसलों का मार्ग प्रशस्त करने का एक और प्रयास कर रही है। अगर ऐसा होता है तो यह देश की कृ​षि के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है।

पर्यावरण मंत्रालय के तहत काम करने वाली इस समिति ने 2017 में भी सरसों की इस हाइब्रिड किस्म को खेती के लिए मंजूर किया था लेकिन सरकार ने जीन संवर्द्धित किस्मों का विरोध करने वाली वि​भिन्न लॉबी के दबाव में तब इसे रोक दिया था। विरोध करने वालों में स्वदेशी जागरण मंच भी शामिल था जो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषंगी है।

इस संगठन के साथ-साथ जीन संव​र्द्धन की तकनीक का विरोध करने वाले अन्य समूह एक बार फिर डीएमएच-11 सरसों के वा​णि​ज्यिक इस्तेमाल को रोकने की को​शिश में लग गए हैं। बहरहाल अच्छी बात है कि इस बार पर्यावरण मंत्रालय ने न तो जीईएसी के निर्णय को समर्थन दिया है और न ही उसे किसी तरह रोका है। 

राष्ट्रीय कृ​षि विज्ञान अकादमी तथा ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज जैसे कृ​षि विज्ञान संस्थानों का मानना है कि जीईएसी के दिशानिर्देशों के अनुसार अब डीएमएच-11 के जमीनी परीक्षण, प्रदर्शन परीक्षण तथा बीजों की तादाद बढ़ाने के लिए अनुकूल परि​स्थितियां हैं।

 भारत खाद्य तेलों की भारी कमी वाला देश है और उसे तिलहन फसलों की और अ​धिक उत्पादक किस्मों की जरूरत है ताकि वह आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सके जो फिलहाल 55 से 60 प्र​तिशत है। वर्ष 2020-21 में हमने 1.17 लाख करोड़ रुपये खर्च करके 1.33 करोड़ टन खाद्य तेल आयात किया।

जीएम सरसों के बारे में जानकारी है कि यह मौजूदा किस्मों की तुलना में 28 फीसदी अ​धिक उपज देती है। इसके आगमन के बाद खाद्य तेल की घरेलू मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर काफी कम हो सकता है। दिलचस्प बात है कि जीईएएसी ने अपनी पिछली बैठक में कुछ और अहम निर्णय भी लिए जो जीएम सरसों को लेकर उत्पन्न​ विवाद की छाया में ढक गए।

उसने चार अन्य जीन परिवर्तित फसलों के जमीनी परीक्षण को मंजूरी दी है जिसमें आम खानपान में काम आने वाले केले और आलू के अलावा रबर और कपास जैसी वा​णि​ज्यिक फसल शामिल हैं। 2002 से अब तक देश में केवल एक जीएम फसल को औपचारिक उत्पादन की मंजूरी मिली है और वह है बीटी-कपास।

इसकी भी मौजूदा किस्मों को बदलने की आवश्यकता है क्योंकि वे अपनी उपयोगिता अव​धि पूरी कर चुके हैं। 2006 में बॉलगार्ड-2 के बाद से किसी नई बीटी-कपास हाइब्रिड किस्म को मंजूरी नहीं दी गई है। ऐसा इसलिए कि नए जीएम उत्पादों को विकसित करने का काम स्थगित कर दिया गया।

डीएमएच-11 का विकास भी दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स में किया गया। इसे विकसित करने वाले वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व इसके पूर्व कुलपति दीपक पेंटल ने किया जबकि इसकी फंडिंग राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड ने की। इसका पेटेंट डेरी विकास बोर्ड और दिल्ली विश्वविद्यालय के पास साझा रूप से है।

स्वदेशी जागरण का यह कहना बिल्कुल सही नहीं है कि डीएमएच-11 स्वदेशी नहीं है। यह किस्म पर्यावरण के साथ-साथ इंसानों और जानवरों के स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह नहीं है और यह बात जमीनी परीक्षणों से प्रमा​णित हो चुकी है। हकीकत में यह हाइब्रिड किस्म ऑस्ट्रेलिया में पहले ही खेती में इस्तेमाल की जा रही है ताकि इसकी अ​धिक उत्पादन की खासियत का लाभ लिया जा सके। जीएम ब्रिंजल के साथ भी ऐसा ही हुआ।

उसे भारत में विकसित किया गया और बांग्लादेश उसका उत्पादन कर रहा है। वहां पर्यावरण या स्वास्थ्य पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया। ऐसे में भारत के लिए पुरानी गलती दोहराते हुए जीन रूपांतरित सरसों के वा​णि​ज्यिक इस्तेमाल को और रोकना सही नहीं होगा। 

Keyword: आनुवं​शिक इंजीनियरिंग, सरसों हाइब्रिड-11 , जीएम ब्रिंजल,
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