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बदल रहा है देश में मीडिया का स्वरूप

वनिता कोहली-खांडेकर /  October 31, 2022

पिछले माह के आरंभ में ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज को कल्वर मैक्स एंटरटेनमेंट (पुराना नाम सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया) के साथ विलय को लेकर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की सशर्त मंजूरी मिल गई। ज़ी एंटरटेनमेंट जो इस माह 30 वर्ष पुराना हो गया, उसे नियामकीय चिंता दूर करने के लिए ऐसे उपाय करने पड़े जिनकी घोषणा नहीं की गई है।

राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, आय कर विभाग, कंपनी पंजीयक तथा अन्य ने अभी तक इस विलय को लेकर अपनी ओर से ‘अनाप​त्ति’ नहीं दी है। इसके बाद बात आती है ज़ी की सूचीबद्धता समाप्त होने, वास्तविक विलय और विलय के बाद बनने वाली कंपनी (जिसका अब तक कोई नाम नहीं है) की सूचीबद्धता की।  संभव है कि अप्रैल 2023 तक ज़ी के मुख्य कार्या​धिकारी पुनीत गोयनका 13,630 करोड़ रुपये (2021 का राजस्व) की सोनी-ज़ी का प्रभार संभालने की कोशिश करें।

देश की दूसरी बड़ी मीडिया कंपनी के निर्माण के साथ ही 1.6 लाख करोड़ रुपये के आकार वाले भारतीय मीडिया और मनोरंजन जगत में समावेशन की विशाल लहर का दौर पूरा हो जाएगा। फिक्की-ईवाई की वा​र्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2021 में मीडिया जगत में 118 विलय एवं अ​धिग्रहण सौदे हुए जिनका मूल्य था 67,200 करोड़ रुपये।

यह रा​शि सन 2020 के आंकड़े की तुलना में करीब 10 गुना थी। मूल्य और आकार की बात करें तो इनमें से करीब आधे प्रसारण क्षेत्र में थे। इस वर्ष पैरामाउंट ने रिलायंस के स्वामित्व वाले वायकॉम18 से आं​शिक रूप से दूरी बना ली और पीवीआर सिनेमा तथा आइनॉक्स का विलय हुआ। सोनी और ज़ी का विलय 2021 में घो​​षित हुआ था और वह धीमी प्रगति पर है।

इस सुदृढ़ीकरण का अर्थ क्या है? पहली बात तो यही है कि यह मीडिया के मानचित्र को नए सिरे से रेखांकित कर रहा है और इसे बड़ी कंपनियों के बीच की जंग में तब्दील कर रहा है। जियो (जिसमें वायकॉम 18 शामिल है), भारती एयरटेल, गूगल, मेटा (फेसबुक), डिज्नी-स्टार और सोनी-ज़ी हर एक का भारत में राजस्व 10,000 करोड़ रुपये और 17,000 करोड़ रुपये के बीच है। तकनीकी तौर पर देखा जाए तो टाइम्स समूह को इसका हिस्सा होना चाहिए क्योंकि वह 10,000 करोड़ रुपये के आसपास है लेकिन संभव है कि दोनों भाइयों समीर जैन और विनीत जैन के बीच क​थित अलगाव के बाद इसे वृद्धि के लिए वह जरूरी गति न मिल सके जो मिल रही थी।

इसके बाद सन नेटवर्क, नेटफ्लिक्स, एमेजॉन प्राइम वीडियो आदि की बारी आती है। इनमें से कुछ आने वाले समय में 10,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकते हैं। दूसरा, इससे कारोबार के सामग्री वाले हिस्से में बदलाव आएगा।अमेरिकी कंपनी मॉफेट नैथंसन के वरिष्ठ प्रबंध निदेशक माइकल नैथंसन ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा, ‘लगातार ढेर सारी सामग्री पेश करने का मॉडल पूंजी खपत वाला है। सबसे अच्छे शो भी दो या तीन सप्ताह में अपने ​शिखर पर होते हैं और पांचवें या छठे सप्ताह से उनमें गिरावट आने लगती है। ऐसे में आपको हर सप्ताह नए शो बनाते रहने होते हैं।’

दर्शकों को ढेर सारी सामग्री देने का विचार तब कारगर रहा जब केवल नेटफ्लिक्स था। अब डिज्नी, वार्नर, एमेजॉन प्राइम वीडियो, ऐपल तथा अन्य कंपनियों के आने से लागत दो से चार गुना बढ़ गई है। इससे भी अहम बात यह है कि सफलता की परिभाषा बदल गई है।

एमेजॉन जैसी ई-कॉमर्स कंपनी के लिए प्राइम वीडियो की सफलता का आकलन इस बात से होता है कि यह खरीदारी में कितनी मददगार होती है। ऐपल के लिए इसका अर्थ यह है कि यह ​उसके उपकरणों की बिक्री में कितना मददगार है। इन कंपनियों का राजस्व 250 अरब डॉलर से अ​धिक है। जाहिर है कोई नियमित मीडिया कंपनी उनसे अ​धिक खर्च नहीं कर सकती।

द इकनॉमिस्ट ने एम्प्री एनालिसिस नामक शोध कंपनी के हवाले से बताया कि कुल मिलाकर अमेरिकी मीडिया कंपनियां इस वर्ष वीडियो सामग्री पर 230 अरब डॉलर से अधिक रा​शि व्यय करेंगी जो एक दशक पहले की तुलना में दोगना है।

नैथंसन का अनुमान है कि 2022 में डिज्नी सामग्री तैयार करने पर 22 अरब डॉलर खर्च करेगी, पैरामाउंट 21.5 अरब डॉलर और नेटफ्लिक्स 17.2 अरब डॉलर की रा​शि व्यय करेगी। फिल्मों को भी रिलीज के 8 से 12 सप्ताह बाद ओटीटी और फिर ​टीवी पर रिलीज करने से अच्छी कीमत मिल रही है। एचबीओ जैसे सफल टीवी ब्रांड ने अपनी पहचान गेम ऑफ थ्रोंस और द सोप्रानोस जैसे शो को धारावाहिक के रूप में प्रसारित करके बनाई।

प्रसारण सामग्री की लागत सीमित रखने के लिए कई बड़ी वै​श्विक कंपनियां लोकप्रिय शोज के नए सीजन पेश कर रही हैं। एक सप्ताह में इनके कुछ ही भाग पेश किए जाते हैं। यंग शेल्डन, द मार्वलस ​मिसेज मैजल (दोनों एमेजॉन प्राइम वीडियो पर) ऐसे लोकप्रिय शो में शामिल हैं जिनकी नई कड़ियां लड़खड़ाहट के साथ आ रही हैं।

नेटफ्लिक्स इस वर्ष करीब एक करोड़ ग्राहक गंवा चुका है और वह 12 देशों में विज्ञापन समर्थित मॉडल पेश कर रहा है। इसमें हर घंटे के प्रसारण के बाद चार से पांच मिनट विज्ञापन आएंगे। इसके बाद खेल जगत का प्रसारण है जो तेजी से पहुंच बनाता है। देखा जाए तो स्ट्रीमिंग साइट अब प्रसारकों की भूमिका अपना रही हैं जबकि प्रसारक अपनी वृद्धि बचाने के लिए स्ट्रीमिंग अपना रहे हैं।

भारत के लिए इसका क्या अर्थ है? डिज्नी, सोनी-ज़ी, नेटफ्लिक्स आदि की भारत में अहम मौजूदगी है। इनकी वृद्धि के लिए भारत अहम बाजार है। एक ओटीटी सी की औसत लागत 40 लाख रुपये प्रति कड़ी है जबकि टीवी पर आधे घंटे का शो 10 से 15 लाख रुपये में बनता है। बीते तीन-चार साल में अच्छी सामग्री के बढ़ते दबाव के कारण प्रतिभाओं की लागत 40-50 प्रतिशत बढ़ गई है। कंपनियों के एकीकरण से लागत कम करने और आकार बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे नई पीढ़ी निवेश में भी मदद पा सकती है।

इन कंपनियों द्वारा अन्य जगहों पर उठाए जा रहे कदम भारत पर भी लागू होंगे। नैथंसन ने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि डिज्नी ने इंडियन प्रीमियर लीग के प्रसारण अ​धिकारों से दूरी बना ली। मीडिया पार्टर्नस ए​शिया के अनुसार डिज्नी ने 2017 में अ​धिकार लागत के रूप् में 2.2 अरब डॉलर की रा​शि चुकाई थी और पांच वर्ष में उसे 28.1 करोड़ डॉलर का लाभ हुआ।

आईपीएल ने स्ट्रीमिंग की मदद से ऑनलाइन की तुलना में दोगुनी आय कमाई। आश्चर्य नहीं कि इस बार डिज्नी प्रसारण अ​धिकारों तक सीमित रह गया। डिजिटल अ​धिकार वायकॉम 18 को चले गए। आईपीएल के लिए अपनी सेवाओं को परखने के क्रम में जियो सिनेमा नवंबर में फीफा विश्व कप का नि:शुल्क प्रसारण करेगा। भारतीय मीडिया बाजार अपना स्वरूप बदल रहा है। ऐसे में इस प्रकार के और कदम देखने को​ मिल सकते हैं। 

Keyword: ज़ी एंटरटेनमेंट, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, आय कर विभाग,
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