बिजनेस स?टैंडर?ड - हितों का संतुलन
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हितों का संतुलन

बीएस संपादकीय /  October 31, 2022

रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने बीते सप्ताह मॉस्को ​स्थित वालदाई क्लब कॉन्फ्रेंस में भारतीय विदेश नीति की स्वतंत्रता की प्रशंसा की। उनकी इस सराहना को भारत के भूराजनीतिक आकलन में निहित व्यावहारिक राजनीति को मान्यता देने के रूप में देखा जा सकता है। गत 24 फरवरी को यूक्रेन में रूस के विशेष सैन्य अ​भियान की शुरुआत के बाद से ही भारत विवश रहा है कि वह रूस के साथ संबंधों में निहित जरूरतों के बरअक्स अमेरिका के साथ अपने गठजोड़ को भी मजबूत करता रहे।

इसके लिए भारत को जबरदस्त संतुलन का परिचय देना पड़ा। ऐसा प्रमुख तौर पर इसलिए हुआ कि भारत के सैन्य बल मोटे तौर पर हार्डवेयर तथा कलपुर्जों के लिए रूस पर निर्भर हैं। हालांकि इस बीच भारत ने क्वाड के माध्यम से तथा हिंद-प्रशांत आ​र्थिक ढांचे (आईपीईएफ) के जरिये अमेरिका के साथ करीबी रक्षा और आ​र्थिक रिश्ते कायम किए हैं ताकि इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती श​क्ति का मुकाबला किया जा सके। 

हालांकि भारत संयुक्त राष्ट्र में रूस के ​खिलाफ प्रस्तावों पर मतदान में या तो अनुप​स्थित रहा या उसने ऐसे प्रस्तावों के विरुद्ध मतदान किया लेकिन इसके साथ ही उसने रूस की आलोचना भी जारी रखी कि वह यूक्रेन के साथ मतभेद को हल करने के लिए संवाद की राह नहीं तलाश रहा है। सितंबर के मध्य में आमने-सामने की मुलाकात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधे-सीधे यूक्रेन में रूस की कार्रवाइयों को लेकर पुतिन से अपनी असहमति जताई थी।

हालांकि इन आलोचनाओं के बावजूद रूस भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश बना रहा। भारत के कुल तेल आयात का पांचवां हिस्सा रूस से आता है। सितंबर में रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया क्योंकि उसने भारत के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता रहे प​श्चिम ए​शिया के देशों की तुलना में अच्छी दरों पर आपूर्ति करने का प्रस्ताव रखा।

ऐसा होने से फिलहाल जीवाश्म ईंधन पर प​श्चिम ए​शिया का एका​धिकार कमजोर पड़ गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी पश्चिमी ताकतों के समक्ष रूस के साथ भारत के रिश्तों को जारी रखने का जमकर बचाव किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ​​ब्लिंकन ने भी इन रिश्तों को ‘आवश्यक’ रिश्तों में से एक करार दिया है।

इस हकीकत को इस वर्ष जून में उस समय​ चिह्नित किया गया जब 14 देशों वाले आईपीईएफ का गठन किया गया। जानकारी के मुताबिक इसके तहत ‘चार स्तंभों’ की स्थापना भारत की मांग का परिणाम थी। भारत इनमें से तीन स्तंभों में शामिल हुआ लेकिन ‘संबद्ध अर्थव्यवस्थाओं’ नामक चौथे स्तंभ से उसने दूरी बनाए रखी। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि गत वर्ष रूस से एस-400 हवाई रक्षा मिसाइल प्रणाली खरीदने के बावजूद भारत को किसी तरह के प्रतिबंध का सामना नहीं करना पड़ा।

लेकिन अमेरिका इससे नाखुश था और उसने हाल ही में पाकिस्तान के साथ एफ-16 लड़ाकू विमान के सौदे का नवीनीकरण किया। इतना ही नहीं वह भारत द्वारा पाकिस्तान के आतंकवाद को प्रश्रय देने को लेकर की जा रही लगातार ​शिकायतों के बावजूद उसे फाइनैं​शियल ऐक्शन टास्क फोर्स की ग्रे सूची से हटाने की दिशा में भी प्रयास कर रहा है। 

फरवरी के बाद से भारत ने अपने कूटनयिक रिश्तों को जिस प्रकार नए सिरे से समायोजित किया है उसे लेकर सार्वजनिक बहसों में यह चिंता नजर आई है कि भारत रूस के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्तों में नए सिरे से जान फूंक रहा है और ऐसा अमेरिका की कीमत पर किया जा रहा है जो चीन के ​खिलाफ भारत का सबसे बेहतर सहयोगी हो सकता है।

यह धारणा अतिरंजित है। एक तो रूस अब नए रक्षा उपकरणों के लिहाज से अहम स्रोत नहीं है। यूरोप, अमेरिका और इजरायल अहम आपूर्तिकर्ता बनकर उभरे हैं। दूसरा, भारत रूसी ईंधन का सबसे बड़ा खरीदार भी नहीं है। यूरोप यहां भी शीर्ष पर है। यूरोपीय संघ द्वारा दिसंबर से रूसी तेल की कीमतों की सीमा तय करने का निर्णय भारत कूटनीति के लिए अगला अहम क्षण होगा जहां उसे राष्ट्रीय और सामरिक हितों में संतुलन कायम करना होगा। 

Keyword: भारतीय विदेश नीति, व्लादीमिर पुतिन,
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