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कर्नाटक: भाजपा की बढ़ सकती हैं मुश्किलें

आदिति फडणीस /  October 28, 2022

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (और उसकी सरकार) के पास विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए मुश्किल से पांच महीने बचे हैं । भाजपा राज्य में अपनी योजनाओं को लेकर काफी आश्वस्त दिखाई देती है। ऐसी उम्मीद थी कि इस महीने की शुरुआत में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भाजपा की कर्नाटक इकाई की कार्यकारिणी की बैठक का उद्घाटन करने के लिए आएंगे लेकिन इसके बजाय वह पार्टी पदाधिकारियों और भाजपा नेताओं के साथ बैठक करने के लिए गुजरात और जम्मू के दौरे पर चले गए।

शाह ने अपनी जगह महासचिव अरुण सिंह को कर्नाटक की बैठक में भेजा। इसकी वजह से स्थानीय नेताओं का उत्साह ठंडा पड़ गया और उनमें से अधिकतर दोपहर के भोजन के बाद कार्यक्रम स्थल से वापस चले गए। मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई को खुद ही कार्यकारिणी की कार्यवाही का एक हिस्सा छोड़कर जाना पड़ा क्योंकि उन्हें एक सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लेना था जो उन्होंने ही बुलाई थी।

लेकिन इसके बावजूद अरुण सिंह मीडिया साक्षात्कार में यह बताने से खुद को रोक नहीं पाए कि बोम्मई आगामी चुनाव में पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। एक समाचार एजेंसी को दिए गए साक्षात्कार में सिंह ने कहा, ‘बोम्मई ने जिस तरह का काम किया है वह (राष्ट्रीय नेतृत्व) उससे काफी खुश है।’

हाल ही में भाजपा के संसदीय बोर्ड में बीएस येदियुरप्पा पदोन्नत हुए हैं, ऐसे में उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना लगभग खत्म हो गई है। उन्होंने बैठक में चेतावनी देते हुए कहा, 'चुनाव में केवल पांच महीने बचे हैं, अगर मंत्री और विधायक पांच महीने का दौरा करते हैं, तब वे पांच साल तक सत्ता में रह सकते हैं।’ इससे कार्यकर्ताओं में संदेश यह गया कि अब सभी लोगों को खुद के लिए मेहनत करनी है और वे जितनी जल्दी अपने क्षेत्र में सक्रिय होंगे उतना ही बेहतर होगा।

वहीं दूसरी तरफ कर्नाटक में पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व पर कटाक्ष करने का रुझान राज्य की भाजपा इकाई में एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री बसनगौड़ा यतनाल इसका नेतृत्व कर रहे हैं। राज्य भर में येदियुरप्पा-बोम्मई की प्रस्तावित संयुक्त यात्रा पर प्रतिक्रिया देते हुए यतनाल ने कहा, ‘अगर बोम्मई, येदियुरप्पा के साथ राज्य का दौरा करते हैं तो भाजपा को मात खानी पड़ेगी।' अन्य नेता भी इसी तरह अपमानजनक बयान जारी कर रहे हैं लेकिन इनमें से किसी का भी पार्टी पदाधिकारियों ने विरोध नहीं किया। ऐसे में विपक्ष की मुस्कराहट बढ़ गई है। 

येदियुरप्पा के समर्थकों का मानना है कि यतनाल जैसे नेता दिल्ली में मौजूद शीर्ष नेतृत्व के मौन समर्थन के बिना इस तरह के बयान नहीं दे सकते थे। पार्टी इकाई के अध्यक्ष नलिन कुमार कतील का कार्यकाल अगस्त में समाप्त हो गया था। लेकिन उनका उत्तराधिकारी नियुक्त करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।

कतील दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं लेकिन राज्य में कहीं और वह उतने जाने-माने चेहरे नहीं माने जाते हैं। उन्होंने चुनावों के लिए भाजपा के 'वॉर रूम' का उद्घाटन किया और अब यह आलम है कि भाजपा के अंदर ही युद्ध छिड़ता दिख रहा है! 

कर्नाटक में भाजपा के लिए गुटबाजी कोई नई बात नहीं है, खासतौर पर 1991 की शानदार वृद्धि और लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्राओं के बाद यह सामान्य बात हो गई। हिंदुत्व का विचार उभरने के बाद से ही आज तक बेंगलूरु शहर भाजपा का एक अजेय गढ़ बना हुआ है। लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हिंदुत्ववादी विचारधारा के बलबूते भाजपा ने अमीर और शक्तिशाली हिंदू मंदिरों और मठों को एकजुट किया। येदियुरप्पा ने इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाई और  यहां तक कि मठ के नवीकरण के लिए बजट आवंटन भी किया।

येदियुरप्पा की वजह से ही भाजपा को तुमकुर जिले के सिद्धगंगा मठ का समर्थन मिला। एक वक्त पर भाजपा का इतनी तेजी से विकास हुआ था कि पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार नहीं थे और उन्हें दूसरे दलों के लोगों को पार्टी में शामिल करना पड़ा। येदियुरप्पा ने विशेष रूप से मलनाड क्षेत्रों (कूर्ग, शिमोगा और चिकमंगलूर जिलों) और हुबली-धारवाड़ क्षेत्र में पार्टी को मजबूत किया जिसके चलते उनकी छवि, सत्ता के एक महत्त्वपूर्ण संगठनात्मक ध्रुव की बन गई।

लेकिन रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाले जनता दल से आए अधिक नेताओं की वजह से पार्टी में नए दबाव की स्थिति भी बनी। वर्ष 2004 तक येदियुरप्पा के प्रयासों से पार्टी, पश्चिमी कर्नाटक और विशेष रूप से हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सेंध लगाने में कामयाब रही। येदियुरप्पा ने कहा कि उन्होंने अपना बोलबाला कायम कर लिया था और वह चाहते थे कि उनके सभी विरोधियों को निर्वासित कर दिया जाए।

येदियुरप्पा को खुश करने के लिए उत्तरी कर्नाटक में अच्छी खासी प्रतिष्ठा पाने वाले बसनगौड़ा यतनाल को भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था। इसी वजह से उनका मौजूदा गुस्सा येदियुरप्पा के खिलाफ है। येदियुरप्पा के कहने पर उत्तरी कर्नाटक के एक अन्य महत्त्वपूर्ण नेता जगदीश शेट्टार को भी किनारे लगा दिया गया।

ये दोनों लोग अब येदियुरप्पा के कट्टर विरोधी हैं। मुख्यमंत्री बोम्मई सभी गुटों में संतुलन बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनके लिए यह एक बड़ी मुश्किल चुनौती है। दिल्ली में उनके एक महत्त्वपूर्ण प्रवक्ता हैं केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी जो उनका समर्थन करते हैं और उनकी  कर्नाटक में संभवतः अहम भूमिका हो सकती है।

आने वाले दिनों और हफ्ते में भाजपा को अपने द्वारा हासिल की गई बढ़त को बनाए रखने और नए लक्ष्य के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। भाजपा इस बात पर गौर कर रही है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के माध्यम से कांग्रेस की पहुंच का दायरा बढ़ रहा है। कुल 224 सीटों में से कर्नाटक में 36 विधानसभा सीट, अनुसूचित जाति के लिए और 15 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। वर्ष 2018 में भाजपा ने 36 में से 16 सीट पर जीत दर्ज की थी। अब दलित नेता मल्लिकार्जुन खरगे को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के बाद उसे और मेहनत करनी होगी।

अनुसूचित जनजाति की 15 सीट में कांग्रेस ने आठ और भाजपा ने छह पर जीत दर्ज की है। यहां भी पार्टी को अपनी पकड़ बनाए रखने और अपना दायरा बढ़ाने के लिए काम करना होगा। येदियुरप्पा संसदीय बोर्ड में अपनी पदोन्नति को लेकर पूरी तरह सचेत हैं। लेकिन अगर मतभेद जारी रहे और गुटबाजी को नियंत्रित नहीं किया गया तो यह सब निरर्थक हो सकता है।

पार्टी जानती है कि अगर पूर्व मुख्यमंत्री को विश्वास में नहीं लिया गया तो पार्टी को कितना नुकसान हो सकता है। वर्ष 2012 में भाजपा से बाहर निकलने के बाद वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के परिणाम ने यह साबित भी कर दिया था। फिलहाल एक संघर्ष विराम की स्थिति है लेकिन अगर यह असहजता की स्थिति तक पहुंचता है तब भाजपा को बड़े बदलाव का सामना करना पड़ सकता है।

Keyword: भारतीय जनता पार्टी, विधानसभा चुनाव,
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