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यात्रा से राहुल को लाभ लेकिन कांग्रेस को नहीं

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  October 18, 2022

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की महत्त्वाकांक्षी भारत जोड़ो यात्रा ने अपने निर्धारित लक्ष्य की राह में करीब एक हजार किलोमीटर का पड़ाव पार कर लिया है। जबसे यह यात्रा शुरू हुई, तबसे ही इसके इर्दगिर्द तमाम बिंदुओं के साथ ही कुछ इस प्रकार का वृत्तांत रचा जा रहा है कि यह कवायद पार्टी के राजनीतिक संवाद में भारी सुधार करने वाली है। जहां तक ऐसी अपेक्षाओं का प्रश्न है तो उच्च-वर्ग और नास्तिक तबके जैसी कुछ श्रेणियों के लिए यह संभवतः सच भी हो। 

परंतु, हमें यह भी स्मरण करना होगा कि कांग्रेस पार्टी का आर्थिक संवाद हमेशा से बहुत शानदार रहा है। वर्ष 2014 में ‘सूट-बूट की सरकार’ जैसे जुमले से लेकर कांग्रेस ने अपनी आर्थिक संवाद रणनीति से सरकार को बखूबी घेरकर परेशान किया है, जो उन नाकामियों पर केंद्रित है, जिसे मतदाता समझते हैं।

हालांकि, यह अफसोस की बात है कि भारत जोड़ो यात्रा जो धर्मनिरपेक्षता के तानेबाने पर बुनी गई गई, उससे किसी व्यापक असर पड़ने के खास आसार नहीं हैं। भीड़ राहुल गांधी को देखने के लिए तो उमड़ पड़ सकती है, लेकिन लगता नहीं कि ‘अल्पसंख्यकों के प्रति भलाई से पेश आने वाले’ संदेश को लेकर शायद ही वह कोई आग्रह या फिक्र दिखाए। 

यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि अधिकांश गैर-मुस्लिम लोग मुसलमानों को पसंद नहीं करते। इस नापसंदगी का स्तर अलग-अलग हो सकता है और ऐसा करने वाले लोग अपने ऐसे भाव से इनकार भी करें, लेकिन कुल मिलाकर वे इस प्रकार के उत्पीड़न को प्रोत्साहन देने वालों के खिलाफ मतदान को लेकर बहुत ज्यादा परवाह नहीं करते। वास्तव में तमाम तो ऐसे ही लोगों के लिए मतदान करते हैं। 

यही कारण है कि भारत जोड़ो यात्रा भले ही राहुल गांधी के लिए निजी तौर पर बहुत उत्कृष्ट सिद्ध हो, लेकिन इसमें संदेह है कि यह कांग्रेस के लिए भी समग्र रूप से कारगर सिद्ध होगी। बहरहाल, जो भी हो भाजपा के आर्थिक संवाद के उलट कांग्रेस का राजनीतिक संवाद भी उतना ही बुरा है। 

जैसे कि कांग्रेस इस बात को लेकर सही है कि भारतीय राजनीति को कैसे संचालित किया जाना चाहिए, वैसे ही भाजपा कि भारतीय अर्थव्यवस्था को किस प्रकार चलाया जाए। फिर भी, इससे कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ सकता। भाजपा अपने आर्थिक प्रदर्शन को लेकर मतदाताओं को आश्वस्त नहीं कर पा रही, जबकि उसका प्रदर्शन काफी उल्लेखनीय है, लेकिन वह आमदनी और कीमतों जैसे उन मोर्चों पर नहीं, जो मतदाताओं के लिए मायने रखते हैं।

यही बात कांग्रेस पर लागू होती है कि धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा में वह निरंतर रूप से सक्रिय रही है, लेकिन उसका मतदाता के मानस पर शून्य प्रभाव पड़ा है। वहीं, भाजपा इसे नकार नहीं सकती कि आमदनी कम हुई है और कीमतें चढ़ रही हैं। इस प्रकार, मतदाताओं में यही आम धारणा घर कर रही है कि अब उनकी आर्थिक स्थिति 2014 से पहले की तुलना में बदतर है। 

इसका मुख्य कारण यही है कि भाजपा ने व्यापक रूप से तार्किक और मूलभूत आर्थिक नीतियों को अपनाया है। यह उसकी सामाजिक-राजनीतिक नीतियों के धुर विपरीत है, जिसे भले ही चुनावी सफलता मिले, लेकिन वह प्रतिगामी है। इसके उलट कांग्रेस जब सत्ता में थी तो उसने बहुत तार्किक आर्थिक नीतियां नहीं अपनाईं, विशेषकर सब्सिडी देने और घाटे को नियंत्रित करने के मामले में। ये नीतियां चुनावी सफलता की दृष्टि से तो पुरस्कृत होने लायक थीं, लेकिन उन्होंने अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क कर दिया। याद कीजिए कि एक दौर में भारत ‘फ्रेजाइल फाइव’ यानी दुनिया की पांच सबसे नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो गया था। 

हालांकि इससे वह तथ्य धुंधला नहीं होना चाहिए कि इन नीतियों ने मतदाताओं को आर्थिक स्तर पर बहुत सहज महसूस कराया। कम से कम 2011 तक तो ऐसा ही रहा। उन्होंने ज्यादा कमाई की और उपभोग वस्तुओं पर कम खर्च किया। कर्जों की लागत भी कम ही थी। भाजपा के मामले में यह तस्वीर अलग दिखती है। फिर भी आर्थिक संकट और दुश्वारियों ने उन्हें लगातार दो लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों में भाजपा की सामाजिक-राजनीतिक नीतियों को प्रोत्साहित करने से नहीं रोका।

वास्तव में, उनमें से 40 प्रतिशत तो खासे उत्साही रहे हैं। यह उतना अजीब नहीं है, जितना लगता है। वर्ष 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के मुकाबले 62 सीट अधिक जीती थीं और कांग्रेस को यह जीत तब मिली थी, जब चुनाव से डेढ़ साल पहले महंगाई लगातार बढ़ने पर थी। वहीं भाजपा की सीट उससे पिछले चुनाव के मुकाबले और 20 घट गई थीं। 

विश्लेषण के अंतिम पड़ाव पर कांग्रेस के लिए मुख्य चुनौती का उल्लेख करते हैं। आज मतदाता आर्थिक मोर्चे पर जिस तरह बदहाल हैं, उस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन भारतीय राजनीति में सामाजिक मुद्दे कहीं ज्यादा मायने रखते हैं। भाजपा इसे बखूबी समझ गई है कि चुनावी लिहाज से यही संदेश सही है। जैसा कि राहुल के पूर्वज बीके नेहरू ने लिखा भी है कि ‘अच्छे लड़के दूसरे स्थान पर आते हैं’ और यहां तक कि दूसरे पायदान पर भी नहीं। 
Keyword: राहुल गांधी, भारत जोड़ो यात्रा,
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