बिजनेस स?टैंडर?ड - रुपये का मूल्य और विदेशी मुद्रा भंडार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, November 27, 2022 11:30 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

रुपये का मूल्य और विदेशी मुद्रा भंडार

गुरबचन सिंह /  October 17, 2022

रुपये को अपना स्तर तलाश करने देना चाहिए। खासकर तब जबकि कई अन्य देशों की मुद्राएं डॉलर के विरुद्ध लगातार कमजोर हो रही हैं। इन मुद्राओं का कमजोर मूल्य स्थायी नहीं है। बता रहे हैं गुरबचन सिंह 

एक डॉलर का मूल्य करीब 82 रुपये हो चुका है। ऐसा इस वर्ष अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की उस नीति के पश्चात हुआ है जिसमें उसने फेडरल फंड्स की दरों में तेज इजाफा किया था और उन्हें मार्च के 0.25 फीसदी से बढ़ाकर सितंबर में 3.25 फीसदी कर दिया था। अन्य कारकों मसलन तेल कीमतों आदि ने भी मदद नहीं की है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी हस्तक्षेप नहीं किया और विदेशी मुद्रा भंडार भी 3 सितंबर, 2021 के 642.45 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर से 23 सितंबर, 2022 तक करीब 104.93 अरब डॉलर घट गया। परंतु ये आंकड़े जितना बताते हैं उससे अ​धिक छिपाते हैं। हमें तीन पहलुओं पर विचार करना होगा।

पहली बात, डॉलर वाली परिसंप​त्तियों के अलावा कुछ विदेशी मुद्रा भंडार यूरो, येन आदि विदेशी मुद्राओं में भी रहता है। विविधता की यह नीति अच्छी है। परंतु हुआ यह कि इन सभी मुद्राओं में काफी अधिक गिरावट आई और इसके चलते रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा की हानि हुई। बहरहाल, अगर इन अन्य मुद्राओं का अवमूल्यन स्थायी न हो तो उस ​स्थिति में अभी जो नुकसान दिख रहा है वह आगे चलकर नहीं दिखेगा।

दूसरा, आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार के पोर्टफोलियो में मध्यम अव​धि या दीर्घाव​धि के जितने बॉन्ड रखे हुए था उसे उसी ​अनुपात में नुकसान का सामना करना पड़ा। फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने के बाद उसे नुकसान हुआ। परंतु यह स्पष्ट नहीं है कि आ​खिर आरबीआई ने ऐसे बॉन्ड क्यों रखे थे या ऐसे में उन्हें लगातार अपने पास क्यों रखे हुए था जब यह स्पष्ट था कि ब्याज दरों में इजाफा होगा। ऐसे में उसके विदेशी मुद्रा भंडार का मूल्य कम हुआ। यह पूरे देश का नुकसान है।तीसरा, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी इसलिए भी आई कि रुपये के मूल्य में कमी आई। हालांकि इस पहलू के बारे में सभी लोग जानते हैं लेकिन इसे भलीभांति समझा नहीं गया है।

रुपये की गिरावट को थामने की को​शिश विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के एक तिहाई हिस्से के ​लिए जिम्मेदार है। इसे एक और तरह से देखा जा सकता है तथा वह यह कि विदेशी मुद्रा भंडार के उच्चतम स्तर से केवल 5.4 फीसदी हिस्सा रुपये में आई गिरावट से पिटने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह हिस्सा और ​धिक होना चाहिए था। क्यों?

अल्पाव​धि के उतार-चढ़ाव की अनदेखी करें तो रुपया लगभग हर वर्ष डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ता है। ऐसा प्राथमिक तौर पर इसलिए है क्योंकि भारत में मुद्रास्फीति अमेरिका की तुलना में अधिक रहती है। परंतु​ फिलहाल हालात एकदम उलट हैं। फिलहाल भारत में मुद्रास्फीति की दर अमेरिका की तुलना में कम है। ऐसे में आदर्श ​स्थिति में अस्थायी रूप से ही सही रुपये का अ​धिमूल्यन होना चाहिए था। परंतु ऐसा नहीं हुआ। इसके विपरीत रुपये का अवमूल्यन हुआ और काफी ज्यादा हुआ। बहरहाल, यह संतुलन की ​स्थिति नहीं है। हकीकत में यह अति जितनी अ​धिक होगी, अंतरिम तौर पर कुछ नुकसान के बाद हालात बदलने की प्रवृ​त्ति भी उतनी ही अ​धिक दिखेगी।

आगे चलकर देखें तो रुपये में कुछ अधिमूल्यन देखने को मिल सकता है। कम से कम रुपये का अवमूल्यन सामान्य की तुलना में कुछ कम हुआ होता। आने वाले महीनों या तिमाहियों में ऐसा देखने को भी मिल सकता है। रुपये में गिरावट के लिए विदेशी मुद्रा भंडार के कुछ हिस्से के इस्तेमाल से ऐसा हो सकता है। यदि आरबीआई ने अ​धिक आक्रामक ढंग से हस्तक्षेप किया होता तो शायद हम अ​धिक गिरावट को थाम पाते। ऐसे हस्तक्षेप मुद्रास्फीति को लेकर लचीले लक्ष्य वाली नीतिगत व्यवस्था के साथ निरंतरता वाले होते हैं।

यह सच है कि सुझाई गई नीति के साथ आरबीआई के भंडार में भी अ​धिक कमी आती। परंतु विदेशी मुद्रा भंडार की बुनियादी भूमिका भी तो यही है कि वह इनका इस्तेमाल उस समय किया जाए जब रुपये की कीमतों में गिरावट आ रही हो। चाहे जो भी हो अभी भी हमारा विदेशी मुद्रा भंडार इतना तो है कि संभावित चालू खाते के घाटे की 65 माह तक भरपाई कर सके। इसके नौ महीने के आयात के बराबर होने का जो वैक​ल्पिक मॉडल पेश किया गया है वह भ्रामक है।

कई बार यह दलील दी जाती है कि हमें रुपये को बाजार में अपना स्तर तलाश करने देना चाहिए। खासतौर पर उस समय जबकि डॉलर के मुकाबले दुनिया की अन्य मुद्राओं के मूल्य में भी कमी आ रही है और भारत को अपनी निर्यात हिस्सेदारी का बचाव करने की आवश्यकता है। यह दलील वैध है बशर्ते कि अन्य मुद्राओं में आने वाली गिरावट की प्रकृति स्थायी हो। परंतु ऐसा होना मु​श्किल है। यदि वैसा हो तो रुपया भी अपेक्षाकृत ​स्थिर नजर आएगा।

अन्य मुद्राओं का मूल्य स्थायी रूप से कम रहने की संभावना इसलिए नहीं है क्योंकि अंतत: किसी मुद्रा की क्रय श​क्ति मायने रखती है। ऐसे में कई मुद्राओं का कम मूल्य (जैसा कि इस मामले में रुपये के साथ है) हमेशा नहीं बना रह सकता। येन इसका एक सटीक उदाहरण है। फिलहाल यह डॉलर के मुकाबले 145 पर कारोबार कर रहा है। 

इस आलेख में हमने अंकेक्षण, पोर्टफोलियो चयन और रुपये में आने वाली गिरावट को कम करने में विदेशी मुद्रा भंडार की वास्तव में सीमित भूमिका पर बात कर चुके हैं। बहरहाल, कई अन्य नीतियां भी हैं लेकिन वह एक अलग किस्सा है। 

(लेखक भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली केंद्र में अति​थि प्राध्यापक हैं)

Keyword: रुपये, डॉलर,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या नियमों में संशोधन से बीमा क्षेत्र में बढ़ेगा निवेश
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.