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आर्थिक विकास पर भारी पड़ती है पहचान

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  10 02, 2022

 भारत में इस बात पर दृढ़ विश्वास किया जाता रहा है कि कश्मीर घाटी के मुस्लिमों के ‘दिलोदिमाग को जीतने’ का सबसे बेहतर तरीका है आर्थिक विकास। उन्हें रोजगार, सड़कें, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल आदि मुहैया कराइए और वे भारत से प्यार करना शुरू कर देंगे।

वास्तव में आबादी के एक हिस्से के विद्रोह और अलगाव की उसकी इच्छा से जूझ रहे दुनिया के कई देशों ने यह तरीका अपनाने की कोशिश की लेकिन यह कभी कारगर नहीं हुआ।

 तीन अर्थशास्त्रियों क्लॉस डेसमेट इग्नासियो, ऑर्टुनो-ऑर्टिन और ओमर ओजाक ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर यह तरीका कारगर क्यों नहीं साबित हुआ। उन्होंने इस बारे में व्यापक सर्वेक्षण किया और इससे निकले नतीजों को एक पर्चे के रूप में प्रस्तुत किया। यह पर्चा एनबीईआर की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है। मैंने अब तक जो भी पर्चे पढ़े हैं यह उनमें से श्रेष्ठतम पर्चों में शामिल है।

 यह पर्चा इस बात का ‘विश्लेषण करता है कि क्या प्रति व्यक्ति आय में अंतर या अलग पहचानों से उपराष्ट्रीय क्षेत्रों का अलगाव की ओर रुझान बढ़ता है।’ इस जबरदस्त पर्चे में वे कहते हैं, ‘प्रतितथ्यात्मक विश्लेषण बहुत मजबूती से यह संकेत देता है कि किसी क्षेत्र के अलग होने के रुझान को तय करने में पहचान हमेशा आय पर भारी पड़ती है।’

 उन्होंने 173 देशों में अलगाव की भावना का अध्ययन किया और पाया  ‘ पहचान के भेदों को कम करने से अलगाववाद को मिलने वाला समर्थन आबादी के 7.5 फीसदी हिस्से से घटकर 0.6 फीसदी हिस्से में रह जाता है।’ दूसरे शब्दों में कहें तो वह पुरानी कहावत काम नहीं आती है कि किसी श्वान को भोंकने से रोकने के लिए उसके सामने हड्डी डाल दो। पहचान, अलगाववाद के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा का काम करती है।

इन लेखकों ने दुनिया भर के 3,003 उपराष्ट्रीय क्षेत्रों का अध्ययन किया। उन्होंने ऐसे तरीके निकाले जिनसे ‘विभिन्न देशों में अस्थिरता और उपराष्ट्रीय क्षेत्रों में अलगाव के रुझान’ का आकलन किया जा सके। इसके परिणाम बहुत जानकारीपरक थे। वास्तव में उनका कहना यह था कि कोई व्यक्ति किसी अधोसंरचना या सार्वजनिक वस्तु से जो उपयोगिता हासिल करता है वह उस व्यक्ति की अलग पहचान की भावना से विलोमानुपाती होती है।

 इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि लेखकों ने सवाल किया, ‘अलगाववादी इलाकों को अपनी मांग छोड़ने के लिए प्रति व्यक्ति आय में कितनी गिरावट की जरूरत होगी...आय में बड़ी गिरावट की आवश्यकता होगी, इससे संकेत मिलता है कि आर्थिक अंतर तभी मायने रखते हैं जब वे काफी बड़े हों।’

 संक्षेप में संदेश यह है कि अलगाववादियों को भुगतने दो। हमें कश्मीरी अलगाववादियों की लल्लो चप्पो बंद करने की जरूरत है। इसके कई अन्य महत्त्वपूर्ण सबक भी हैं। मिसाल के तौर पर  इससे कई और महत्त्वपूर्ण पाठ मिले हैं। जैसे अलगववादी संप्रभुता की मांग के लिए भाषा, अलग नस्ल और धर्म काफी अहम हैं। ऐसे में भाषा सबसे ज्यादा असर डालती है।

 यहां हम सेलिग हैरिसन की पुस्तक ‘इंडिया: द मोस्ट डेंजरस डिकेड’ को याद कर सकते हैं। इसमें 1956 में भाषाई आधार पर राज्य गठन के बाद भारत के टूटने की आशंका को लेकर बात की गई थी। हैरिसन की यह आशंका गलत निकली और भारत सही साबित हुआ।

 लेखकों ने निष्कर्ष निकाला, ‘फिलहाल कोई अच्छे आंकड़े मौजूद नहीं हैं जो पूरे विश्व के लिए उप-राष्ट्रीय स्तर पर पहचान समूहों के बहुआयामी पहलुओं को शामिल करता है। इस तरह के आंकड़े एकत्र करना भविष्य के शोध का विषय होना चाहिए।’  अंत में उन्होंने कहा कि यह भी संभव है कि अलग लेकिन समान पहचान वाले लोगों के समूह अलगाव की मांग करें। वे अपना देश बनाने के लिए भी ऐसा कर सकते हैं और किसी अन्य  देश में शामिल होने के लिए भी। संक्षेप में कहें तो जब एक समूह अपने को अलग सोचने लग जाए और माने कि वह एक पृथक देश के रूप में बेहतर ढंग से काम कर सकता है। ऐसे में इस समूह की सोच बदलना मुश्किल होता है।

यह समूह अलग होने की सोच पर आगे बढ़ता जाएगा और बिना कुछ सोचे समझे चाहे अलग होने के कितने आर्थिक दुश्वारियां आए, वह पृथक होने की मांग करेगा।

भारत को पहचान पर आधारित पृथकतावाद की बखूबी जानकारी है। भारत ने 72 साल पहले संविधान के अनुच्छेद 370-72 के जरिये इसका हल खोजने की कोशिश की। भारत ने विविधता को अच्छी तरह अपनाया। कोई एक धार्मिक या भाषाई पहचान गढ़ने की कोशिश करके उस सफलता को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। ऐसा इसलिए कि किसी एक धर्म वाली पहचान के भीतर भी विविधता मौजूद रहती है।

Keyword: कश्मीर घाटी, आर्थिक विकास,
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