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वैश्विक घटनाक्रम पर नजर जरूरी

बीएस संपादकीय /  October 02, 2022

ऐसे समय में जब भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजार कई स्तरों पर अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने पिछले सप्ताह बाजार को हैरानी में नहीं डालकर अच्छा ही किया। दरें तय करने वाली समिति ने नीतिगत रीपो दर को 50 आधार अंक बढ़ाकर 5.9 फीसदी कर दिया। इसी वजह से स्थायी जमा सुविधा और सीमांत स्थायी सुविधा दरों का समायोजन उसी हिसाब से किया गया है।

महंगाई की स्थिति को देखते हुए दर को और बढ़ाने की जरूरत होगी। मौद्रिक नीति समिति मौजूदा चक्र में इसे किस हद तक बढ़ाएगी, यह मुद्रा बाजार की हलचलों सहित विभिन्न कारकों पर निर्भर करेगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का अनुमान है कि मुद्रास्फीति वर्ष 2022-23 की अंतिम तिमाही में घटकर 5.8 प्रतिशत और अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 5 प्रतिशत के स्तर पर आ जाएगी। शुक्रवार को जारी मौद्रिक नीति रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई को उम्मीद है कि वर्ष 2023-24 में मुद्रास्फीति की दर औसतन 5.2 प्रतिशत रहेगी।

हालांकि यह अब भी 4 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी ऊपर होगा, ऐसे में आरबीआई को समायोजन के लिए कुछ नीतिगत गुंजाइश मिल जाएगी। लेकिन फिलहाल जैसी परिस्थितियां हैं, उस हिसाब से मुद्रास्फीति की दर लगातार तीन तिमाहियों तक स्वीकार्य सीमा से ऊपर रहने की संभावना है। ऐसे में इसे लक्ष्य हासिल करने में विफलता माना जाएगा।

नतीजतन, आरबीआई को केंद्र सरकार को पत्र लिखकर यह बताना होगा कि ऐसा क्यों हुआ, केंद्रीय बैंक की प्रस्तावित कार्रवाई क्या होगी और किस अपेक्षित समय-सीमा में लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस संवाद को सार्वजनिक किया जाएगा या नहीं। हालांकि सरकार और आरबीआई इसे सार्वजनिक कर अच्छा ही करेंगे। इससे प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी। इसे जारी नहीं करने से गलत मिसाल कायम होगी और बाजार का भरोसा भी प्रभावित होगा।

हालांकि मोटे तौर पर वर्ष के लिए आरबीआई का मुद्रास्फीति पूर्वानुमान बाजार की उम्मीदों के अनुरूप है, लेकिन आने वाली तिमाहियों में इसके वृद्धि अनुमानों को आजमाया जा सकेगा। अप्रैल-जून तिमाही में वृद्धि दर का अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से काफी कम रहने के कारण पूरे साल के अनुमान को मामूली रूप से संशोधित कर 7.2 प्रतिशत से 7 प्रतिशत कर दिया गया है। इस प्रक्रिया में इसने वित्त वर्ष की दूसरी छमाही के लिए वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 4.6 प्रतिशत कर दिया जबकि पहले यह अनुमान लगाया गया था कि यह करीब 4 प्रतिशत के स्तर पर रहेगा।

यह पेचीदा होता जा रहा है। यह तर्क दिया जा सकता है कि अगर पहली तिमाही के अनुमान आरबीआई की उम्मीद के अनुरूप होते हैं तब उसे पूरे साल के पूर्वानुमान को ऊपरी स्तर पर ऐसे समय में संशोधित करना पड़ता जब दुनिया भर में वृद्धि अनुमान कम किए जा रहे हैं।

वैश्विक परिस्थितियां आने वाले महीनों में परिणामों को काफी प्रभावित करेंगी। इसकी एक वजह यह है कि भूराजनीतिक तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। यूक्रेन युद्ध में बढ़ते दांव न केवल जिंसों की कीमतें प्रभावित कर सकते हैं बल्कि जोखिम से बचने और वैश्विक वित्तीय स्थितियों में सख्ती लाने में भी वृद्धि कर सकते हैं। इस बीच, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में वृद्धि जारी रख सकता है जिससे पूंजी प्रवाह और मुद्रा मूल्यांकन प्रभावित होंगे।

हालांकि आरबीआई ने सही कहा है कि नीति घरेलू परिस्थितियों से निर्धारित होती है लेकिन रुपये में लगातार गिरावट मुद्रास्फीति के नतीजों को प्रभावित कर सकती है। इस संदर्भ में ध्यान देने लायक बात यह है कि डॉलर की मजबूती और अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी के कारण चालू वित्त वर्ष में विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 67 प्रतिशत की गिरावट हुई है।

इस तरह के दबाव वाली स्थिति के लिए पर्याप्त मुद्रा भंडार और विविधीकरण पर जोर देने की आवश्यकता होगी। ऐसे में अगले कुछ महीनों में वैश्विक घटनाक्रम पर सावधानीपूर्वक नजर रखने की आवश्यकता होगी।

Keyword: आरबीआई, एमपीसी, वित्तीय बाजार,
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