बिजनेस स?टैंडर?ड - भारत का एफटीए एजेंडा क्या होना चाहिए?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, December 02, 2022 08:04 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

भारत का एफटीए एजेंडा क्या होना चाहिए?

नौशाद फोर्ब्स /  September 27, 2022

 चीन+1 नीति के लिए भारत से अच्छा कोई देश नहीं है। लेकिन पहले उद्योग को अपने पर विश्वास करना होगा, फिर व्यापार भविष्य निर्धारित कर सकता है। बता रहे हैं नौशाद फोर्ब्स 

विश्व में अनेक क्षेत्रीय व्यापार समझौते हुए हैं। भारत ने भी 2012 के बाद श्रीलंका, बांग्लादेश, आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया से व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। भारत में मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के बारे में उद्योग व सरकार में एक विचार यह पनपना शुरू गया था कि इनसे भारत को फायदा नहीं हुआ बल्कि उल्टा इनसे उसके उद्योग को नुकसान हुआ। यह विचार त्रुटिपूर्ण था और हम एशिया के साथ महत्त्वपूर्ण समझौते क्षेत्रीय व्यापार आर्थिक भागीदारी (आरसेप) से 2019 में अलग हो गए। लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद हम मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत करने के लिए राजी हो गए हैं। ये समझौते यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ किए जा चुके हैं। इस क्रम में ब्रिटेन, कनाडा और यूरोपीय संघ (ईयू) से बातचीत विभिन्न चरणों में जारी है।

हमारे व्यापार पर एफटीए का कम ही प्रभाव रहा है। हमारे व्यापार में एफटीए की हिस्सेदारी साल 2000 में 16 फीसदी और अभी 18.5 फीसदी है। यह हमारे उद्योग के लिए विध्वंसक नहीं रहे हैं लेकिन हमें एफटीए से आशानुरूप फायदा नहीं दिखाई दिया है। हमारे व्यापार के ज्यादातर साझेदार गैरएफटीए देश अमेरिका, चीन और ईयू हैं। हमारे लिए आयात और निर्यात के मामले में अमेरिका का महत्त्व बरकरार है जबकि ईयू के मामले में गिरावट आ चुकी है। 

इस मामले में सबसे बड़ा विजेता चीन रहा है। साल 2000 में हमारे आयात में चीन की हिस्सेदारी 2.6 फीसदी और निर्यात में 1.5 फीसदी थी। लेकिन 2021 में भारत को होने वाले आयात में चीन की हिस्सेदारी 16.5 फीसदी और निर्यात में 7.3 फीसदी हो गई थी। इससे भारत के लिए अमेरिका के बाद चीन दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया।

कैसे हमें एफटीए से फायदा होगा? क्या एफटीए का एजेंडा होना चाहिए?

एफटीए पर हस्ताक्षर के मायने 

हमें उन एफटीए की जरूरत है जो वर्तमान समय में उपयोगी देशों और क्षेत्रों से संबंधित हों या जिनसे हमारा भविष्य में सरोकार रहेगा। हमें वर्तमान समय में शीर्ष के निर्यात बाजार अमेरिका, ईयू और बांग्लादेश पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हमारे भविष्य के प्रमुख बाजार अफ्रीका और लैटिन अमेरिका हो सकते हैं। 

हमने क्षेत्रीय व्यापार आर्थिक भागीदारी (आरसेप) से अलग होकर एशिया में अपनी पहुंच को सीमित कर दिया है और यह महाद्वीप आने वाले समय में विश्व की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अब हमारे पास दूसरा मौका है, हाल में बने एशिया पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क (आईपीईएफ) में शामिल होने का। भारत अपनी भूल के कारण आईपीईएफ में व्यापार के आधार स्तंभ से बाहर रहा है। लिहाजा हमें इसमें तुरंत शामिल होना चाहिए और व्यवस्थित ढंग से व्यापार के एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहिए। आईपीईएफ में चीन को छोड़ अमेरिका, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और वियतनाम हैं जो हमारी दिलचस्पी के देश हैं। 

लिहाजा आईपीईएफ में शामिल होने का दोहरा फायदा है। आईपीईएफ में शामिल होने से हम अपने देश के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप वार्ता के तरीके और प्रारूप तय कर सकते हैं। हमें इस मौके को हाथ से नहीं गंवाना चाहिए।

विस्तार की महत्त्वाकांक्षा 

विश्व का ज्यादातर कारोबार वैश्विक मूल्य श्रृंखला (जीवीसी) के तहत होता है। इसमें विभिन्न देशों में अनेक चरणों में मूल्य को जोड़ा जाता है। एफटीए का पुराना स्वरूप होने के कारण इसका प्रभाव सीमित हो गया है। 

एफटीए में अत्यधिक खपत वाले उत्पादों को बाहर रखा गया या लंबी समायोजन अवधि के साथ विस्तारित शुल्क लगाया गया। अभी अन्य देशों की महत्त्वाकांक्षा कहीं अधिक है। इसीलिए आसियान, दक्षिण कोरिया और जापान ने हमारी तुलना में कहीं अधिक देशों से एफटीए कर रखे हैं। 

इस क्रम में चीन ने भी समझौते कर रखे हैं। इनमें से कई समझौते हमारे समझौते के मुकाबले कहीं अधिक बड़े और ज्यादा प्रभाव डालने वाले हैं। इन्हें जीरो-फॉर-जीरो समझौते कहा जाता है। हालांकि जीरो सामान को एफटीए में शामिल नहीं किया गया है। जीरो टैरिफ अक्सर दोनों दिशाओं में लगता है। इससे करीबी व समृद्ध व्यापार श्रृंखला विकसित करने में मदद मिलती है जैसे इलेक्ट्रानिक्स। 

पूरे एशिया में इलेक्ट्रानिक्स सामान के कलपुर्जे मिलते हैं और इन्हें असेंबल किया जाता है। हर देश में इन उत्पादों में मूल्य संवर्द्धन हो जाता है। एडम स्मिथ ने 250 साल पहले कहा था कि 'बाजार के विस्तारीकरण से विशेषीकरण का स्तर सीमित हो जाएगा।' 

समझौते से कई वस्तुओं को बाहर करने के कारण हम बाजार के विस्तार की अपनी क्षमता को कम कर देते हैं और हमारी आपूर्ति श्रृंखला में हिस्सेदारी लेने की क्षमता भी कम हो जाती है। सफलता की कुंजी उत्पादकता है। उत्पादकता विशिष्टता से आती है और यह हर जगह उत्पाद तैयार करने से नहीं आती है। हमारे व्यापार की नीति में आसान लगने वाली सोच का दबदबा अधिक है। हमें निर्यात पसंद है लेकिन आयात पसंद नहीं है। व्यापार का कोई भी अर्थशास्त्री यह बता सकता है कि आयात पर कर लगाना, दरअसल निर्यात पर कर लगाना है। ज्यादा महंगे व मांग वाले निर्यात के उत्पादों को बनाने के लिए उच्च व मांग वाले आयातित सामान की जरूरत होती है।

कुछ महत्त्वपूर्ण संभावनाएं  

परिधान उद्योग के लिए कपड़ा बुनियादी जरूरत है। लेकिन परिधान में छोटे हिस्से जैसे बटन, जिप और अस्तर उत्पाद में जमीन-आसमान का अंतर डाल देते हैं।  वाहन उद्योग में आपूर्ति करने वाले स्तर की संख्या घटा दी गई है। इसका कारण यह है कि किसी भी स्तर पर अक्षमता से अगले स्तर पर उत्पाद कम प्रतिस्पर्धी हो जाता है। 

हमारा वाहन उद्योग यह दावा करता है कि वह विश्व में छोटी कारों के निर्माण के लिए लागत के हिसाब से सबसे उपयुक्त स्थान है। क्यों फिर यह ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए में शामिल किए जाने के खिलाफ जोरदार बहस करता है? हमें अपनी क्षमताओं पर अधिक भरोसा होना चाहिए।

हमें हस्ताक्षर किए जाने वाले एफटीए में वाहन (वाणिज्यिक वाहनों से लेकर कारों तक, दोपहिया वाहनों से लेकर निर्माण उपकरण तक) और वाहनों के कलपुर्जों दोनों को शामिल करना चाहिए। ब्रिटेन ने 99 प्रतिशत टैरिफ लाइन को शामिल करने की पेशकश की है। भारत 100 प्रतिशत चाहता है और इसे प्राप्त करना चाहिए। और हमें भी अपना शत-प्रतिशत देना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे और व्यापक और प्रभावशील बनाए जाने की जरूरत है।

अंतर्निहित प्रतिस्पर्धा को दर्शाते व्यापार के ढर्रे 

यह कोई संयोग नहीं है कि हमारा बीते दो दशकों में चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम से कारोबार बढ़ा है। ये विश्व के सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी देश हैं और लगभग सभी देशों के व्यापार संतुलन का झुकाव इन तीन देशों की ओर हो गया है। हम शायद गैर शुल्कीय बाधाओं और कारोबार की अधिक लागत की शिकायत कर सकते हैं लेकिन हम प्रतिस्पर्धा को बढ़ाकर व्यापार संतुलन को निश्चित रूप से सुधार सकते हैं।

हमें एफटीए का उपयोग अपनी फर्म की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। ऐसे में फर्म को अनिवार्य रूप से बदलाव करना चाहिए जिसमें आधारभूत सरंचना, नियमन, सहजता से कारोबार करना आदि हैं। इससे प्रतिस्पर्धी लागत में कमी आएगी।

समन्वित व्यापार और उद्योग नीति 

हमारे उद्योग नीति में प्रमुख तौर पर उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना है। इस योजना के तहत 14 क्षेत्रों में उद्योग को सकल घरेलू उत्पाद की एक फीसदी रियायत की अवधि पांच साल है ताकि उनका उत्पादन बढ़े। 

इन क्षेत्रों को हमारी व्यापार नीति से जोड़ा जाए। इसमें रियायत लेने वालों के लिए निर्यात अनिवार्य (अभी 14 क्षेत्रों में से दो या तीन क्षेत्रों में है) किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पीएलआई में शामिल सभी उत्पादों को हस्ताक्षर किए जाने वाले एफटीए में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। (यूएई से किए गए एफटीए में पीएलआई स्कीम के तहत एयर कंडीशनर को छोड़कर आने वाले सभी 'व्हाइट गुड्स' को शामिल किया गया था।)

चीन +1 नीति का फायदा उठाएं  

एफटीए में अनिवार्य रूप से निर्यात और आयात पर जोर होना चाहिए। हमारा इन उत्पादों से अधिक सरोकार है - वाहन और उनके कलपुर्जे, व्हाइट गुड्स, वस्त्र और परिधान, रसायन व औषधि और इंजीनियरिंग। लिहाजा हमें इन उत्पादों को अवश्य शामिल करना चाहिए। ये उत्पाद हमारे आने वाले कल के लिए जरूरी हैं।

हमें व्यापार वार्ताओं में ई-कॉमर्स, इलेक्ट्रिक वाहन और डेटा निजता को शामिल करना चाहिए - हमें इस मामले में जल्दी से राय बनानी चाहिए। हमें यह भी देखना चाहिए कि इन क्षेत्रों में हम कहां खड़े हैं।

विश्व चीन +1 की आपूर्ति की ओर बेसब्री से देख रहा है। ऐसी स्थिति का फायदा लेने के लिए भारत से अच्छा कोई देश नहीं है। लेकिन इस स्थिति का फायदा लेने के लिए यह जरूरी है कि हमारा उद्योग अपनी क्षमताओं पर विश्वास करे ताकि वह भारत और विश्व में सर्वश्रेष्ठ के लिए प्रतिस्पर्धा कर सके। भारतीय उद्योग का भविष्य व्यापार निर्धारित कर सकता है।

(लेखक फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन और सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष हैं )

Keyword: क्षेत्रीय व्यापार समझौते , श्रीलंका, बांग्लादेश, आसियान, जापान,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बीमा के लिए एक ही लाइसेंस से कंपनियों को होगा फायदा
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.