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बरकरार है कोविड का खतरा

बीएस संपादकीय /  September 25, 2022

 अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने उत्साहपूर्वक घोषणा की है कि कोविड-19 महामारी का अंत हो चुका है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस अधनॉम गेब्रिएसस ने अपेक्षाकृत सतर्कतापूर्वक आकलन करते हुए कहा कि महामारी का ‘अंत होता नजर आ रहा है।’ इसके बावजूद भारत के केंद्रीय और राज्य स्तरीय स्वास्थ्य प्रशासन को ​ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए।

फिलहाल जो हालात हैं कि उनके मुताबिक तो स्वास्थ्य बिरादरी यह मानने को तैयार है कि शायद सबसे बुरा समय पीछे छूट चुका है। जाहिर है यह बात आंकड़ों से निकली है: दर्ज होने वाले संक्रमण के नए मामलों में तेज गिरावट आई है और  इस वर्ष जनवरी के तीन लाख मामले रोजाना से घटकर 23 सितंबर को 5,000 मामले रोजाना रह गए।

मृत्यु दर में भी तेजी से गिरावट आई है और अब इसका साप्ताहिक औसत मई 2021 के 4,000 से घटकर 26 रह गया है। ये उत्साह बढ़ाने वाले आंकड़े मोटेतौर पर तेज टीकाकरण कार्यक्रम के कारण तथा वायरस के अपेक्षाकृत कम घातक प्रकार ओमीक्रोन के कारण हैं। इस समय दुनिया भर में इस वायरस के करीब 32 प्रकार हैं। लेकिन अगर कोविड का खतरा समाप्त हो चुका है तो भी यह नहीं माना जा सकता है कि यह बीमारी गायब ही हो गई है।

कई ऐसे तथ्य हैं जो कोविड प्रोटोकॉल को ​शि​थिल किए जाने के ​खिलाफ हैं। टीकाकरण कार्यक्रम भी इनमें से एक है। हालांकि ओमीक्रोन तथा अन्य प्रकार कहीं अ​धिक संक्रामक हैं लेकिन ये कम घातक हैं तथा इनसे लोगों की मौत होने की आशंका भी कम है। परंतु इनमें से कोई भी प्रकार किसी भी समय घातक रूप ले सकता है। इसके अलावा विषाणुविज्ञानी लगातार इस बात को रेखांकित कर रहे हैं कि भारत अभी भी घातक डेल्टा प्रकार से जूझ रहा है जिसकी वजह से 2021 में बड़ी तादाद में लोगों की जान गई थी।

इन बातों का यही अर्थ है कि टीकाकरण कार्यक्रम हमारी प्राथमिकता होना चाहिए। इस कार्यक्रम के लिए हमें दुनिया भर से सराहना मिली है लेकिन अभी भी इस पर ध्यान केंद्रित रखना आवश्यक है।

यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि बुजुर्ग और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग तथा स्वास्थ्यकर्मी आदि जिन्हें जनवरी से अप्रैल के बीच टीके की तीसरी और एहतियाती खुराक लग चुकी है उन्हें विषाणुविज्ञानियों की सलाह के मुताबिक चौथी खुराक की जरूरत पड़ सकती है। परंतु सरकारी संसाधन जहां अभी भी पूर्ण टीकाकरण और एहतियाती खुराक देने में लगे हैं, ऐसे में लगता नहीं कि इस पर ध्यान दिया जा सकेगा।

बार-बार सामने आ रही चुनौतियां ‘वायरस के साथ जीने के सबक’ को एक नया मायना दे रही है। देश की अ​धिकांश आबादी ने इसका अर्थ यह लगाया कि कोविड के बुनियादी सुरक्षा प्रोटोकॉल को त्याग देना है और शारीरिक दूरी के मानकों का भी पालन नहीं करना है। वहीं जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया है कि उन लोगों को इन व्यवहारों का पालन जारी रखना चाहिए जो बुजुर्गों के साथ रहते हैं।

यदि सरकार इस विषय पर जनहित में एक अ​भियान छेड़े तो बहुत अच्छा और उपयोगी होगा। फिलहाल जो कोविड टीके लगाए जा रहे है वे अल्फा और डेल्टा प्रकार के समक्ष तो कुछ सुरक्षा मुहैया कराते हैं लेकिन वायरस के नए प्रकारों के सामने समुचित सुरक्षा नहीं मुहैया करा पाते।

इसका अर्थ यह भी है कि सरकार को फार्मा उद्योग के साथ मिलकर काम करना होगा और नए अध्ययन करके ऐसे टीके विकसित करने होंगे जो वायरस के वि​​​भिन्न प्रकारों के ​खिलाफ बचाव मुहैया कराते हों। इसके साथ ही लगातार जेनेटिक सीक्वेंस करते रहना अहम है ताकि यह सुनि​श्चित किया जा सके कि हमारी तैयारी बेहतर है। ऐसा करके ही कोविड की चौथी या किसी अन्य लहर से सहजता से निपटा जा सकेगा। 

 
Keyword: महामारी, मृत्यु दर, टीकाकरण,
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