बिजनेस स?टैंडर?ड - डिजिटल उधारी की नई दुनिया में क्या हैं बाधाएं
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डिजिटल उधारी की नई दुनिया में क्या हैं बाधाएं

तमाल बंद्योपाध्याय /  09 20, 2022

 आखिरकार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने डिजिटल उधारी को वैधता दे दी है। इसने इस क्षेत्र के खिलाड़ियों को परिभाषित करने के लिए एक नया शब्द गढ़ा है, ऋण सेवा प्रदाता (एलएसपी)। वे अपनी बैलेंस शीट से उधार नहीं देंगे, बल्कि बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए वे एक आउटसोर्सिंग एजेंट की भूमिका निभाएंगे।

निश्चित रूप से भारतीय वित्तीय व्यवस्था के लिए यह अवधारणा कोई नई नहीं है। नवंबर 2006 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्तीय सेवा प्रदाताओं के लिए आउटसोर्सिंग की व्यवस्था शुरू की थी। बैंकों के प्रत्यक्ष बिक्री एजेंट (डीएसए) का ताल्लुक इस श्रेणी से है। भारत में बिना किसी नियंत्रण के डिजिटल उधारी जिस पैमाने और रफ्तार से फैल रही है उसकी वजह से बैंकिंग नियामक को इस महीने की शुरुआत में डिजिटल उधारी पर दिशानिर्देश देने के लिए मजबूर किया है।

यह डिजिटल उधारी पर एक कार्यसमूह की नवंबर 2021 की रिपोर्ट पर आधारित है। सबसे पहले हम यह समझते हैं कि डिजिटल उधारी मुहैया कराने वाला तंत्र कैसा है। वर्ष 2020 में बैंक फॉर इंटरनैशनल सेटलमेंट्स के एक शोध पत्र के मुताबिक वर्ष 2019 में वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) कंपनियां और बड़ी तकनीकों के माध्यम से कुल वैश्विक डिजिटल उधारी अनुमानतः 795 अरब डॉलर है जिसमें उस वक्त से ही काफी तेजी आई है।

फिनटेक, या वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियां दरअसल ऐसी कंपनियां हैं जो प्रौद्योगिकी के माध्यम से सॉफ्टवेयर के जरिये वित्तीय सेवाएं मुहैया कराती हैं जिसमें ऑनलाइन बैंकिंग, मोबाइल भुगतान ऐप शामिल हैं। बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों का संदर्भ ऐपल, गूगल, एमेजॉन, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसी प्रमुख कंपनियों से जुड़ा है।

वित्तीय प्रौद्योगिकी और बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बाजार चीन है और अमेरिका वित्तीय सेवाएं देने वाली तकनीक कंपनियों के लिए दूसरा सबसे बड़ा बाजार है लेकिन बड़ी तकनीक में इसकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। बैंकों और एनबीएफसी के नमूने (वित्त वर्ष 2020 के लिए बैंकों और एनबीएफसी की कुल परिसंपत्तियों की हिस्सेदारी क्रमशः 75 प्रतिशत और 10 प्रतिशत है) के आंकड़ों के आधार पर, आरबीआई की रिपोर्ट में बैंकों के डिजिटल माध्यम से उधार दी गई राशि 1.12 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि प्रत्यक्ष माध्यम से दी गई उधारी 53.08 लाख करोड़ रुपये है।

एनबीएफसी के लिए यह 1.93 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 23,000 करोड़ रुपये है। वर्ष 2017 और 2020 के बीच डिजिटल माध्यम से दिया गया ऋण 12 गुना से अधिक बढ़ गया है और यह 11,671 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.42 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है। कोविड महामारी की शुरुआत के बाद से यह हिस्सेदारी कई गुना अधिक बढ़ गई है। अब सवाल यह है कि कितने एलएसपी यानी उधार की सेवाएं देने वाली कंपनियां हैं? यह कहना मुश्किल है लेकिन यह आंकड़ा हजारों तक पहुंच सकता है। फरवरी 2021 की शुरुआत में, लगभग 1,100 उधार देने वाले ऐप थे जिनमें से 600 अवैध थे।

अब तक प्रचलन में यह था कि ग्राहकों को यह नहीं पता था कि वे किससे कर्ज ले रहे हैं। एजेंट के बजाय, एलएसपी ऋण प्रदाता के रूप में खुद को पेश कर रहे हैं। वे ही ऋण की दरें भी तय कर रहे हैं और डेटा तक उनकी असीमित पहुंच है और डिजिटल कर्जदाताओं की अपारदर्शी दुनिया इन डेटा का अक्सर गलत इस्तेमाल होता है। 

 आरबीआई के मानदंडों की वजह से बैंकों और एनबीएफसी जैसे ऋणदाता सबसे आगे खड़े हैं जो वास्तव में विनियमित संस्थाएं हैं। कर्जदाताओं और उधार लेने वालों के बीच एक सीधा इंटरफेस है और एलएसपी सिर्फ मंच मुहैया कराएगा। इसके अलावा, डेटा तक उनकी पहुंच सीमित यानी आवश्यकता पर आधारित होगी।

इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि नकदी वितरण क्षेत्र में डिजिटल ऋण अहम भूमिका निभाएगा ऐसे में मानदंडों का प्राथमिक जोर ग्राहकों का संरक्षण है। नई दुनिया में बैंकों और एनबीएफसी को उधार लेने वालों को एक ‘मुख्य तथ्य विवरण’ देते हुए अंतिम ब्योरा देना होगा। मसलन ऋण की पूरी अवधि के दौरान ब्याज दर और कुल ब्याज शुल्क क्या होगा, इसके अलावा अन्य अग्रिम शुल्क, प्रोसेसिंग शुल्क, बीमा शुल्क लिए जाएंगे या नहीं और ऋण की कितनी राशि दी जाएगी और उधारकर्ता द्वारा चुकाई जाने वाली राशि क्या होगी, ऋण की अवधि, ऋण की किस्तों की संख्या और प्रत्येक किस्त की राशि की जानकारी आदि से जुड़ा ब्योरा। कोई भी शुल्क और फीस जिसका ब्योरा नहीं दिया गया है उसे ऋण चुकाने के किसी भी चरण में नहीं लिया जा सकता है। ऋण समझौतों पर बैंकों/एनबीएफसी और उधारकर्ताओं द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। 

एलएसपी लेनदेन की सुविधा के लिए सिर्फ एक माध्यम बनेंगे। बैंक/एनबीएफसी सीधे ग्राहकों के बैंक खातों में ऋण की राशि डालेंगे। इसका अर्थ यह है कि ग्राहकों की पहचान करने, उनकी साख का आकलन करने, ऋण के संग्रह और इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों के लिए एलएसपी द्वारा ली जाने वाली फीस के लिए बैंकों/एनबीएफसी और एलएसपी के बीच एक समानांतर समझौता भी होगा। क्या बैंक/एनबीएफसी ग्राहकों से 28-30 फीसदी या उससे भी अधिक ऋण दरें वसूल सकते हैं (जैसा कि डिजिटल उधारी क्षेत्र में कई कर्जदाताओं के साथ ऐसे मामले हुए हैं), यानी वे 12 फीसदी अपने लिए (ब्याज आमदनी के रूप में) रख सकते हैं और बाकी को शुल्क के रूप में एलएसपी को दे सकते हैं? यह आसान नहीं होगा क्योंकि ऑडिटर, बैंकों के बोर्ड और बैंकिंग नियामक ऐसे लेन-देन पर पैनी नजर रखेंगे। इसका मतलब है कि दिसंबर से शुरू हो रही नई व्यवस्था में ऋण दर नीचे जा सकता है।

नए ग्राहकों के साथ-साथ नए कर्ज की तलाश करने वाले मौजूदा ग्राहकों पर यह मानदंड लागू होंगे। बैंकों और एनबीएफसी को 30 नवंबर तक नए मानदंडों के लिए प्रक्रियाओं को लागू करने की आवश्यकता है।

तथाकथित फर्स्ट लॉस डिफॉल्ट गारंटी (एफएलडीजी) के प्रचलन पर भी प्रतिबंध लगाया जा रहा है। दरअसल एफएलडीजी यह सुनिश्चित करता है कि भूगतान चूक यानी डिफॉल्ट के मामले में  नुकसान का कुछ निश्चित प्रतिशत (मान लीजिए 5-10 प्रतिशत) डिजिटल ऋणदाताओं द्वारा वहन किया जाता है।

उदाहरण के तौर पर अगर 1 करोड़ रुपये के बकाया ऋण में से 20 लाख रुपये की वसूली नहीं की जा सकती है तब डिजिटल ऋणदाताओं को 5-10 लाख रुपये के नुकसान की साझेदारी करनी होती है। एफएलडीजी पर प्रतिबंध लगाने के पीछे आखिर क्या तर्क है? एक गैर-ऋणदाता कंपनी नकदी से जुड़ा जोखिम नहीं ले सकती है। अब तक, कुछ एनबीएफसी अपना लाइसेंस किराये पर डिजिटल कर्जदाताओं को दे रही थीं, जो अधिक एफएलडीजी पर सहमत होकर कर्ज दिए जाने वाली पूंजी की व्यवस्था करने के साथ-साथ नकदी से जुड़ा जोखिम भी ले रही थीं। 

 क्या एलएसपी को आउटसोर्सिंग एजेंटों के रूप में कितने भी बैंकों और एनबीएफसी के साथ गठजोड़ करने की अनुमति दी जाएगी? इस पर दिशानिर्देशों में कोई ब्योरा नहीं दिया गया है। फिर भी, डिजिटल कर्जदाताओं के कारोबारी मॉडल को बदलना होगा क्योंकि उन्होंने ग्राहकों से सीधे वास्ता रखने की अपनी आजादी खो दी है। सभी ऋणों के लिए कर्जदाताओं को जवाबदेह ठहराया जा रहा है और वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियां लेनदेन के लिए एक मंच के अलावा और कुछ नहीं हैं। फिर भी, नए मानदंडों के एक और नतीजे में, ऑनलाइन मार्केटप्लेस या बिना कुछ गिरवी रखे छोटे ऋण देने वाले मंच से जुड़े पीयर-टू-पीयर (पी 2 पी) उद्योग को अपने कारोबारी मॉडल पर नजर डालनी पड़ सकती है।

इस क्षेत्र में संस्थाएं लोगों से ही पूंजी एकत्र करती हैं और लोगों के साथ-साथ सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को उधार देती हैं। एलएसपी के विपरीत, उन्हें पूंजी (2 करोड़ रुपये) की आवश्यकता होती है और इनका नियमन सीधे आरबीआई द्वारा किया जाता है। साथ ही ऐसे मंचों पर कर्जदाता के निवेश की सीमा 50 लाख रुपये तक सीमित है। इनमें से कुछ को इस कारोबार में बने रहने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिख सकता है क्योंकि इस खेल के मैदान में काफी बदलाव आया है।

हालांकि ध्यान देने वाली बात यह है कि नए मानदंड अवैध ऐप के खतरे को दूर नहीं करते हैं। जनवरी 2020 और मार्च 2021 के बीच मिली 2,562 ग्राहक शिकायतों में से अधिकांश अवैध ऐप से संबंधित हैं जिनका आरबीआई से कोई लेना-देना नहीं है। मीडिया में आत्महत्या के कम से कम दो दर्जन मामले सामने आए हैं जिसके लिए ऐसे ऋण ऐप परिचालकों ने दबाव बनाया था। 

 वित्त मंत्रालय ने ऐसे ऋण देने वाले अवैध ऐप को लेकर चिंता जताई है। आरबीआई कानूनी ऋण ऐप की एक सूची या ऑनलाइन पंजी तैयार करेगा और इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय यह सुनिश्चित करेगा कि ऐप स्टोर पर केवल सूची वाले ऐप ही नजर आएं। 

 इसके अलावा, अवैध ऐप से निपटने के लिए नियामक, राज्य सरकारों (उधार देना राज्य का विषय है), विभिन्न जांच एजेंसियों और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के बीच समन्वय बनाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, एक बड़े पैमाने पर डिजिटल साक्षरता अभियान, विशेष रूप से सुदूर इलाकों में शुरू करने की जरूरत है क्योंकि यह असहाय छोटे कर्जदाताओं के शोषण को रोकने के लिए जरूरी है।

(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और लेखक हैं और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं)
Keyword: आरबीआई, डिजिटल उधारी , एलएसपी,
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