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सार्वजनिक-निजी साझेदारी की आधी सदी

विनायक चटर्जी / नई दिल्ली September 04, 2022

ऐसा नहीं है कि भारत के बुनियादी ढांचे के विकास में निजी पूंजी का इतिहास नहीं रहा। भारत में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बड़े पैमाने पर रेलवे की आधारभूत संरचनाओं की स्थापना स्टर्लिंग की पूंजी से की गई थी। मुंबई, कोलकाता और अहमदाबाद की बिजली वितरण कंपनियों पर निजी कंपनियों का नियंत्रण था और ये कंपनियां अलग-अलग क्षेत्र में बिजली उत्पादन भी करती थीं।

1990 के दशक में सार्वजनिक-निजी साझेदारी से अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नजर आए थे। इससे पहले ही आर्थिक नीति में प्रमुख नीति के रूप में सार्वजनिक-निजी साझेदारी का समावेश हो गया था। सरकार ने 1992 में स्पेक्ट्रम के काकीनाडा और जीवीके के जेगुरुपाडु बिजली संयंत्रों को स्वीकृति दी थी और ये दोनों संयंत्र स्वीकृत आठ फास्ट ट्रैक परियोजनाओं में शामिल थे। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज ने 1995 में मध्य प्रदेश के राऊ- पीथमपुर में 12 किलोमीटर लंबी टोल रोड का निर्माण कराया था जिसमें निजी पूंजी का इस्तेमाल हुआ था।

हालांकि वित्त वर्ष 1996-97 में सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) की आधिकारिक रूप से शुरुआत हुई। इस साल में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वाणिज्यीकरण पर विशेषज्ञों के समूह ने निजी पूंजी की महत्त्वपूर्ण भूमिका की जोरदार वकालत की, इस समूह के अध्यक्ष राकेश मोहन थे। इस रिपोर्ट के बाद साल 1997-98 में कई गतिविधियां सिलसिलेवार ढंग से हुईं। इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनैंस कॉरपोरेशन का गठन किया गया था। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण अधिनियम पारित किया गया था। प्रमुख बंदरगाहों पर टैरिफ अथॉरिटी का गठन हुआ। प्रमुख बंदरगाह ट्रस्टों के अधिनियम में संशोधन कर बंदरगाहों में निजी क्षेत्र को अनुमति दी गई। अधिनियम पारित कर केंद्र व राज्यों के बिजली क्षेत्र के लिए शीर्ष नियामक को अस्तित्व में लाया गया। हालांकि साल 1995 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का गठन कर दिया गया था और साल 1997-98 में इस प्राधिकरण के पूंजी आधार को बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दिया गया था।

तत्कालीन योजना आयोग ने 'आधारभूत संरचना' में कमी को स्वीकार किया। सकल पूंजी बढ़ाने की योजना बनाई गई। आयोग ने 11वीं योजना (2017-22) के अंतिम साल तक सकल घरेलू उत्पाद का 9 प्रतिशत आधारभूत ढांचे पर खर्च करने की योजना बनाई थी। इस रणनीति को क्रियान्वित करने के लिए मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने जोरदार ढंग से पीपीपी को योजना पेश की थी।  पीपीपी परियोजनाओं को दीर्घकालिक वित्तीय मदद प्रदान करने के लिए 2006 में इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी लिमिटेड की स्थापना की गई थी। इस क्रम में योजना आयोग ने मॉडल रियायती समझौतों की एक श्रृंखला पेश की थी। दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) में निजी पूंजी की हिस्सेदारी बढ़कर 22 फीसदी हो गई थी। 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12)में निजी पूंजी की हिस्सेदारी बढ़कर 37 प्रतिशत हो गई थी। 12वीं पंचवर्षीय योजना में निजी पूंजी की हिस्सेदारी बढ़ाकर 48 फीसदी करने का लक्ष्य किया गया था। हाल के समय में बुनियादी ढांचे में निजी निवेश की हिस्सेदारी सालाना करीब 30 खरब रुपये थी जो कुल निवेश का 20 प्रतिशत से भी कम था।

साल 2012 के बाद से पीपीपी में गिरावट का दौर शुरू हो गया था। इसके कारण अनुचित ढंग से जोखिम आबंटन, आक्रामक बोली, 'ट्विन बैलेंस शीट' की समस्याएं, रुकी हुई परियोजनाएं, नीतिगत समस्याएं, बढ़ती गैर निष्पादित परिसंपत्तियां और विवाद समाधान में कमी थी। मई 2014 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अस्तित्व में आया। इस सरकार ने परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक वित्त पोषण में बदलाव किया। इस सरकार ने समस्या के मूल कारणों से निपटने के लिए प्रयास किए। यह कोशिश वित्त मंत्री अरुण जेटली के जुलाई 2014 में पेश बजट में भी उजागर हुई।

जेटली ने बजट में महत्त्वपूर्ण संस्था '3पी' की स्थापना की और इसके लिए 500 करोड़ रुपये आबंटित किए थे। इसके बाद मई 2015 में सरकार ने पूर्व वित्त सचिव विजय केलकर की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति गठित की थी। इस समिति ने 19 नवंबर, 2015 को रिपोर्ट 'आधारभूत संरचना के मॉडल पीपीपी के पुनरीक्षण और पुनरुद्धार' पेश की थी। समिति ने "3पी इंडिया" की स्थापना का समर्थन किया। इसमें पीपीपी के जटिल मुद्दों जैसे पुन: बातचीत, स्वतंत्र नियामक, न्यायसंगत जोखिम-आबंटन, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 में संशोधन, विवादों का शीघ्र निवारण और क्षमता निर्माण शामिल हैं। इस अवधि में पीपीपी का 2.0 वर्जन सीमित तरीके से पेश किया गया था। इसके तहत निजी निवेश के जोखिम को दीर्घकालिक स्तर पर कम करने के लिए सालाना और हाइब्रिड सालाना मॉडल के आधार पर निर्धारित राशि देने की पेशकश की गई।  पीपीपी के दायरे में नई क्षेत्र जैसे रोपवे और एफ्लुएंट संयंत्रों को लाया गया।

अब पीपीपी के तहत नैशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन के 100 फीसदी से 60 खरब रुपये और राष्ट्रीय आधारभूत पाइपलाइन के 40 प्रतिशत से 1110 खरब रुपये जुटाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अगले पांच सालों में निजी पूंजी से 500 खरब रुपये जुटाने का लक्ष्य है। क्या ये लक्ष्य संस्था पीपीपी में महत्त्वपूर्ण सुधार किए बिना हासिल किए जा सकते हैं। यह एक बड़ी चुनौती है।

भारत के सभी कॉरपोरेशन और वाणिज्यिक ऋण देने वाली संस्थाएं ग्रीनफील्ड की पीपीपी परियोजनाओं में निवेश को लेकर अत्यधिक सतर्क हैं और विदेशी निवेशक ब्राउनफील्ड परिसंपत्तियों के परिचालन में निवेश करना पसंद करते हैं। हालांकि यह स्वीकार करना होगा कि पीपीपी कई क्षेत्रों जैसे जैसे टेलीकॉम, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली पारेषण  और नवीकरणीय ऊर्जा में योगदान दे रहा है और अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर कर रहा है

वित्त मंत्री ने 1 फरवरी को नवीनतम बजट भाषण में क्षमता निर्माण उपायों पर जोर दिया था। इस मामले में वित्त मंत्री ने जुलाई में नई संस्था इन्फ्रास्ट्रक्टर फाइनैंस सचिवालय (आईएफएस) की स्थापना की थी।

यह संस्था पीपीपी के इकोसिस्टम को बेहतर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। राजग सरकार ने पीपीपी को मदद मुहैया कराने के लिए दो विशेष आर्थिक संस्थाओं का निर्माण किया था। एक संस्था राष्ट्रीय निवेश और आधारभूत कोष थी जो इक्विटी मदद मुहैया कराने के लिए 2015 में स्थापित की गई थी। विकास को बढ़ावा देने वाली वित्तीय संस्था नैशनल बैंक ऑफ फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर और डेवलपमेंट को साल 2021 में बनाया गया था। इन दो संस्थाओं की सफलता के परिप्रेक्ष्य में आईएफएस का गठन किया गया था।

ग्रीन फील्ड परियोजनाओं के निर्माण में निजी कोषों को चरणबद्ध ढंग से सम्मिलित करने, ब्राउनफील्ड परिसंपत्तियों के परिचालन के मुद्रीकरण के जरिये निजी कोष को आकर्षित करने के मंत्र तहत पीपीपी का पुनरुद्धार किया जाएगा। यह पीपीपी का 3.0 वर्जन होगा और इसका प्रभाव एक चौथाई सदी तक रहेगा।

(लेखक बुनियादी ढांचा क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। वह 'द इन्फ्राविजन फाउंडेशन' के संस्थापक और प्रबंध न्यासी भी हैं)

Keyword: पूंजी, रेलवे, विकास,
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