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घटती वृद्धि‍ दर कितनी चिंताजनक

गुरुवार को मूडीज ने भी जी-20 के बढ़त अनुमान को घटाकर 2.5 फीसदी कर दिया जबकि मई में 3.1 फीसदी की बढ़त का अनुमान लगाया गया था
पुनीत वाधवा / नई दिल्ली September 01, 2022

दशक के उच्च स्तर पर पहुंची महंगाई ने वैश्विक केंद्रीय बैंकों को ब्याज दर बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे कैलेंडर वर्ष 2022 की शुरुआत में दुनिया भर के शेयर बाजारों की अवधारणा पर चोट पहुंचाई। बढ़ती महंगाई के कारण वस्तुओं व सेवाओं की मांग में कमी और केंद्रीय बैंकों की नीतियों के कारण गोल्डमैन सैक्स व मॉर्गन स्टैनली समेत अन्य ब्रोकरेज फर्मों के विश्लेषकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़त की रफ्तार से संबंधित अपने अनुमान में कटौती कर दी। अर्थव्यवस्था की रफ्तार की माप जीडीपी से होती है।

एक ओर जहां भारत (2022) के लिए गोल्डमैन सैक्स ने जीडीपी में बढ़त का अनुमान 7.6 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी कर दिया, वहीं मौजूदा वित्त वर्ष के लिए यह अनुमान 7.2 फीसदी से 20 आधार अंक कम कर दिया। मॉर्गन स्टैनली के विश्लेषकों ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए जीडीपी में अपने पूर्व के 7.2 फीसदी की बढ़ोतरी के अनुमान पर 40 आधार अंकों की गिरावट के जोखिम की चेतावनी दी है।

गुरुवार को मूडीज ने भी जी-20 के बढ़त अनुमान को घटाकर 2.5 फीसदी कर दिया जबकि मई में 3.1 फीसदी की बढ़त का अनुमान लगाया गया था। 2023 के लिए यह अनुमान 2.1 फीसदी कर दिया गया है।

मूडीज ने हालिया विज्ञप्ति में कहा है, हमारा संशोधित अनुमान बढ़ती महंगाई व केंद्रीय बैंकों के रुख से वैश्विक वित्तीय हालात में सख्ती के कारण आम लोगों की खरीद क्षमता पर लगे झटके को प्रतिबिंबित करता है। चीन में कोविड को लेकर पाबंदी और रूस की तरफ से यूरोप में गैस आपूर्ति में कटौती विकसित व उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक परिदृश्य पर असर डाल रहे हैं।

ऐसे में भारतीय इक्विटी बाजारों के लिए इसके क्या मायने हैं?

विश्लेषकों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में वैश्विक संकट भारतीय जीडीपी की रफ्तार को मध्यम स्तर पर ला सकता है, लेकिन उनकी उम्मीद बरकरार है कि भारत अहम वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में जीडीपी में सबसे तेज बढ़त हासिल करने वालों में से एक होगा। इस पृष्ठभूमि में देसी बाजारों के सेंटिमेंट को सिर्फ अस्थायी तौर पर झटका लग सकता है।

इक्विनॉमिक्स के संस्थापक व मुख्य निवेश अधिकारी जी. चोकालिंगम ने कहा, मंदी या मुद्रा की आपूर्ति घटने से आर्थिक गतिविधियों में नरमी जैसे वैश्विक संकट तेल की कीमतों में गिरावट लाएंगे, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को महंगाई थामने, व्यापार घाटा कम करने, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी टालने और रुपये में मजबूता लाने में मदद करेगा।

चोकालिंगम ने कहा, हम मध्यम से लंबी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था व बाजारों को लेकर आशावादी बने हुए हैं, यह मानते हुए कि सस्ता तेल, जीडीपी में तेज बढ़त और अन्य संकेतक मसलन अच्छा मॉनसून, कर संग्रह में मजबूती और कंपनियों की आय में दो अंकों की बढ़ोतरी की संभावना है। पर देसी बाजार गिर सकता है, लेकिन हर गिरावट के बाद उसमें तेजी से सुधार भी आएगा। हमारी राय में अहम देशों के बीच संभावित युद्ध‍ संभावित जोखिम होगा। 

इस बीच, जून तिमाही में पिछले साल की समान अवधि के निचले आधार के बावजूद भारत की जीडीपी 13.5 फीसदी रही क्योंकि उस दौरान महामारी के डेल्टा संस्करण  से आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई थी। 

जियोजित फाइनैंशियल सर्विसेज के मुख्य निवेश रणनीतिकार गौरांग शाह ने  कहा, ऐसे आर्थिक आंकड़ों पर बाजार सिर्फ प्रतिक्रिया जताएगा और फिर वापस पटरी पर लौट आएगा। मौजूदा आंकड़ों पर भी वैश्विक स्तर पर कुछही अर्थव्यवस्थाएं होंगी, जो भारत के  जीडीपी की बराबरी कर सकती हैं या इससे आगे निकल सकती है। हर गिरावट लंबी अवधि के लिहाज से खरीदारी का मौका उपलब्ध कराता है।

Keyword: ब्याज, बैंकों, भारत,
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