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नये औषधि विधेयक ने आयुष में सुधार का मौका गंवाया

प्रस्तावित विधेयक को रद्द करके संरचनात्मक नियामक के मुद्दे को आगे बढ़ाया जा सकता है।
दिनेश ठाकुर और प्रशांत रेड्डी टी / नई दिल्ली August 29, 2022

भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति ने बीते एक दशक में भ्रामक विज्ञापनों से लेकर रासायनिक दर्द निवारक दवाओं व भारी धातुओं की मिलावट तक के घोटाले झेले हैं। हाल में पेश किए गए नई औषधि, सौंदर्य प्रसाधन एवं चिकित्सा उपकरण विधेयक, 2022 को इस क्षेत्र में सुधार का अवसर मिला था लेकिन दुर्भाग्यवश इस विधेयक को तैयार करने वालों ने ठोस सुधार को करने से परहेज किया।

 

इस बारे में इतिहास के कुछ पन्ने पलटने से आयुष उद्योग को नियमित करने से जुड़ी चुनौतियों के  बारे में जानकारी मिलेगी। संसद ने साल 1940 में औषधि अधिनियम पारित किया था। इस कानून में ‘दवा’ की परिभाषा से आयुर्वेदिक और यूनानी (आयुष) दवाओं को बाहर रखा गया था। इसका स्वाभाविक कारण यह था कि आधुनिक दवाओं की तरह पारंपरिक दवाओं को ‘प्रमाणीकृत’ नहीं किया जा सकता था। दरअसल आयुष की दवाएं पौधों और जड़ी-बूटियों से बनाई जाती हैं। इनके ‘सक्रिय फार्मास्यूटिकल अवयवों’ के बारे में कम ही जानकारी उपलब्ध है और इनकी मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती है। निर्धारित मात्रा के बिना प्रमाणीकरण नहीं किया जा सकता है और प्रमाणीकरण के बिना तैयार किए गए उत्पादों की 'मानक गुणवत्ता' का तो प्रश्न ही नहीं उठता है।

 

साल 1964 में  सरकार आयुष दवाओं को औषधि एवं सौंदर्य सामग्री अधिनियम 1940 के दायरे में लेकर आई थी लेकिन तब भी प्रमाणीकरण नहीं किया गया था। इस कानून में पारंपरिक दवा निर्माताओं को केवल यह सुनिश्चित करना था कि उनकी दवाएं कानून द्वारा मान्यता प्राप्त पारंपरिक ग्रंथों में वर्णित सूत्र के अनुसार बनी थी। इस कानून में सुरक्षा व असर के बारे में न तो आंकड़ों की आवश्यकता थी और न ही शुद्धता जैसे मानदंडों का प्रमाणीकरण किया गया था। यह विनिमय के लिए आधा अधूरा दृष्टिकोण था।

 

यह मामला 1982 में तब और खराब हो गया जब कानून में संशोधन कर गुपचुप तरीके से आयुष दवाओं के बारे में 'पेंटेंट व स्वामित्व' की संकल्पना पेश की गई थी और पारंपरिक ग्रंथों में वर्णित सामग्री का उपयोग करके नई आयुष दवाओं के निर्माण की अनुमति दी गई थी। हालांकि व्यावहारिक तौर पर आधुनिक दवाओं की तरह आयुष की इन दवाओं की सुरक्षा और असर का आकलन किया जाना चाहिए था और इसके लिए कभी भी व कहीं से भी नमूने लेकर कठोर परीक्षण किए जाने चाहिए थे। लेकिन इस समय इन्हें लागू नहीं किया गया।

 


नया विधेयक

 

नए विधेयक में आयुष दवाओं को 'आयुर्वेद या सिद्ध, या सोवा-रिग्पा या भारत के यूनानी औषधि कोश (फार्माकोपिया) में वर्णित पहचान, शुद्धता' के मानकों को पूरा करने की आवश्यकता है। यह अनिवार्यता 1995 से औषधि और प्रसाधन सामग्री नियमों में रही। लेकिन मसौदा समिति ने इसे नियमों से मुख्य कानून में स्थानांतरित कर दिया। हमारी राय के अनुसार ये दो कारणों से काफी हद तक निरर्थक है। पहला, आयुष का 'फार्माकोपिया' असाधारण रूप से अस्पष्ट हैं और आधुनिक दवाओं के 'फार्माकोपिया' द्वारा पेश किए गए कठोर मानकीकरण से बहुत दूर हैं। भारतीय फार्मोकोपिया आयोग ने आधुनिक दवाओं के 'फार्माकोपिया' का प्रकाशन किया है। दूसरा, बाजार में अधिकांश आयुष उत्पाद "पेटेंट या मालिकाना" वाले हैं लेकिन वे 'फार्माकोपिया' में शामिल नहीं हैं।

 

सुरक्षा व प्रभाव के लिए सभी आयुष दवाओं का 'पेटेंट व मालिकाना' के मुद्दे पर आधुनिक दवाओं की तरह परीक्षण व मूल्यांकन किया जाना था लेकिन नए विधेयक में नई श्रेणी 'आयुर्वेद व यूनानी के लिए अभिनव दवा' बनाकर असमंजस की स्थिति बना दी। नए विधेयक के तहत इन दवाओं का नई संस्था 'वैज्ञानिक शोध बोर्ड' के दिशानिर्देशों के तहत परीक्षण किया जाना चाहिए और इस बोर्ड में आयुष के विशेषज्ञ होंगे। यह स्पष्ट नहीं है कि क्यों आधुनिक दवाओं को स्वीकृति देने वाले विशेषज्ञ इन दवाओं को स्वीकृति नहीं दे सकते हैं। यहां पर हितों का टकराव होने की आशंका है क्योंकि आयुष मंत्रालय के तहत वैज्ञानिक शोध बोर्ड होगा। यह बोर्ड आयुष मंत्रालय के तहत आयुष शोध परिषदों द्वारा विकसित 'नई दवाओं' को मुख्य तौर पर स्वीकृति देगा। इन परिषदों का नई दवा विकसित करने का खराब ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। ऐसे में आयुष मंत्रालय पर इसे दिए गए धन को सही ठहराने का दबाव है, ऐसे में वैज्ञानिक शोध बोर्ड पर जांच के दौरान आसान प्रक्रिया अपनाने का दबाव रह सकता है।

सुरक्षा से जुड़े महत्त्वपूर्ण विषय जैसे आयुर्वेदिक दवाओं में भारी तत्त्वों की उपस्थिति के मुद्दे पर इस विधेयक में कदम पीछे खींचे गए हैं। इस विधेयक में धारा 108 (ए) में नरम रुख अपनाया गया है। भारी तत्त्वों के कारण गंभीर स्वास्थ्य परिणाम आ सकते हैं लेकिन इस मामले पर केवल 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। सजा को कम किया गया है। हालांकि अभी लागू कानून के अनुसार धारा ईईबी की धारा 33 के तहत भारी धातुओं पर दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने पर छह महीने की जेल की सजा और 10,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। भारी धातुओं की मिलावट होने से मरीज को पहुंचे नुकसान के लिए जेल की सजा होनी चाहिए, ऐसे में केवल जुर्माना नहीं लगाया जाना चाहिए।

 

नए विधेयक की प्रारूप समिति ने आयुष उद्योग को कड़े परीक्षणों पर आधारित आधुनिक विज्ञान की ले जाने का मौका खो दिया है। मंत्री इस प्रस्तावित विधेयक को रद्द करके विश्वसनीय समिति का गठन कर संरचनात्मक नियामक के मुद्दे को आगे बढ़ा सकते हैं।

 

(ठाकुर रैनबैक्सी मामले के ​व्हिसलब्लोअर हैं। रेड्डी दवा नियमन क्षेत्र के वकील हैं)
Keyword: चिकित्सा पद्धति, दर्द निवारक दवा, आयुष उद्योग, फार्मास्यूटिकल, कानून,
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