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जानबूझकर भी देरी की जाती है अपील करने में
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  May 20, 2009

उच्चतम न्यायालय ने हाल में टिप्पणी की है - 'बार-बार दृष्टांत दिया जाता है कि कानून निर्दयी है।'

हम ऐसी समझ के आदी हो गए हैं कि ऐसी भावनाएं रोष, खेद व अनुकंपा की तरह हैं और कानूनी मामलों में इनकी झलक नहीं दिखाई देनी चाहिए, खास तौर पर न्यायपालिका में। इसने लोगों को यह सोचने को मजबूर किया है कि कानून नेकी के अहसास से अलग है। हमारी नजर में यह नासमझी है।

न्यायपालिका को कानून की अच्छी समझ है और यह सामाजिक न्याय और उपयुक्तता को बरकरार रखने के लिए काम करता है। इस तथ्य पर जोर डालने के लिए अदालत ने पिछड़ी जाति के एक शिक्षक को बहाल किया जिसकी जाति सरकार ने उसकी जानकारी के बिना बदल दी थी (प्रेमकुमारी बनाम डिविजनल कमिश्नर)।

कानूनी रूप से वह नौकरी गंवा चुकी होती, लेकिन उसकी आय व परिवार को बचाने के लिए अदालत ने असाधारण संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया। हालांकि न्यायालय ने कहा कि वह गलत सहानुभूति पर भरोसा नहीं करता, टैक्स के मामलों में मानवीय दया अबाध रूप से पाई जाती है जहां सरकार हारे गए मामले की बाबत सोई रहती है, बिना यह निर्णय किए कि ऊपरी अदालत में अपील की जाए या नहीं।

राजस्व से जुड़े अधिकारियों पर ऐसे मामलों में तुरंत अपील की जिम्मेदारी है क्योंकि इसमें जनता का पैसा शामिल होता है। लिमिटेशन ऐक्ट और दूसरे शासनादेश हर मामले में अपील दायर करने की समयसीमा का उल्लेख करते हैं। हालांकि सरकार द्वारा दायर अपील में एक आवेदन देरी के लिए क्षमादान से जुड़ा होता है और न्यायाधीश ऐसी प्रार्थना हमेशा स्वीकार करते हैं।

न्यायालय ने पिछले पखवाड़े दिए गए एक फैसले में इस रुख की आलोचना की थी (कर्नाटक सरकार बनाम वाई. मूईदीन कुन्ही (मृत))। साल 1982 में इस व्यक्ति ने इलायची बोर्ड व रबर बोर्ड के सर्टिफिकेट के साथ प्लांटेशन के लिए जमीन खरीदी। लेकिन सरकार ने पाया कि उसके पास मौजूद अतिरिक्त जमीन भूमि सुधार कानून द्वारा तय सीमा से ज्यादा थी।

लैंड ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय सरकार के खिलाफ हो गई, लेकिन 14 साल बाद सरकार ने देरी के लिए क्षमादान की इच्छा जाहिर करते हुए पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी। उच्च न्यायालय ने इस प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया और सरकार ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई से पहले न्यायालय ने सरकार को 10 लाख रुपये भुगतान करने का आदेश दिया और यह निर्देश भी दिया कि वह कथित रूप से घोटाले के जिम्मेदार व्यक्ति और कानूनी उपचार शुरू करने में देरी के लिए जिम्मेदार हर व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करे और जिम्मेदारी तय करे व उससे रकम वसूल करे।

सरकारी याचिका में कहा गया था कि अगर अत्यधिक देरी केलिए क्षमादान नहीं दिया गया और कठोर कानून लागू कर दिया गया तो अपील दायर करने में देरी से कुशल प्रबंधन के तौर पर जनता के नुकसान का नतीजा निकलेगा। इसने स्वीकार किया कि कई सरकारी अपील में या तो नौकरशाही प्रक्रिया की प्रकृति की बदौलत या फिर कानूनी खामियों का फायदा उठाने के लिए जानबूझकर देरी की जाती है।

उच्चतम न्यायालय ने इस मामले को देरी के लिए कुशल प्रबंधन के तौर पर व्याख्यायित किया है। अधिकारीगण इसमें या तो जानबूझकर देरी करते हैं या फिर इसके आशय को समझे बिना। फैसले में कहा गया है - आम शिकायत है कि ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि विवेकहीन याचिकाकर्ताओं की रक्षा जनहित या राजकोष की कीमत पर रक्षा की जा सके।

हालांकि देरी से पेश की गई अपील के निपटान में उदार रवैया अपनाता है, लेकिन इसकी भी सीमाएं हैं कि ऐसे उदारवादी रवैये को कहां तक आगे बढ़ाया जा सकता है। फैसले में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2003 में दी गई रिपोर्ट का जिक्र है जिसमें सीएजी ने टैक्स के मामलों में अपील दायर करने में हुई देरी का अध्ययन किया था।

हर चरण की प्रक्रिया के लिए कानून ने समय सीमा तय कर रखी है, लेकिन शायद ही इसका पालन होता है। हर चरण में देरी होती है : प्रमाणित प्रति की प्राप्ति, बोर्ड को कागजात सौंपने, उनकी जांच, पैनल काउंसिल द्वारा उसकी ड्राफ्टिंग और एक्साइज अधिकारी द्वारा अपील दायर करना। इनमें देरी दिन या महीने के रूप में नहीं होती बल्कि अक्सर वर्षों में होती है। इसके बाद सरकार इस देरी को सही ठहराने की कोशिश करती है।

अक्सर एक दलील पेश की जाती है कि सेंट्रल एक्साइज के नए कलेक्टर को काम में अपने आपको ढालने में समय की दरकार थी। लेकिन अदालत ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया। सीएजी रिपोर्ट में हर मामले केतहत सरकारी खजाने को हुए वित्तीय नुकसान का दृष्टांत दिया गया है।

एक बार अपील 30 साल बाद की गई और अदालत ने इस देरी को क्षमादान दे दिया, लेकिन यह एक नागरिक द्वारा अपील की गई थी और इसके वैध कारण मौजूद थे। हालांकि वैयक्तिक तौर पर लोग जल्दी से जल्दी काम निपटाते हैं, चूंकि राज्य ऐसी मशीनरी है जो अपने अधिकारियों के जरिए काम करती है, लिहाजा वे जिम्मेदार होने चाहिए।

हाल के महीने में यह ऐसा दूसरा मौका है जब न्यायालय ने राज्य से हर अधिकारी की जिम्मेदारी निश्चित करने को कहा है। दिल्ली राज्य बनाम अहमद जान के मामले में न्यायालय ने कहा कि समय पर अपील दायर नहीं करने में नाकाम रहने वाले अधिकारी को इस नुकसान के लिए निजी तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। हालांकि यह कहना आसान होगा कि ऐसा किया गया। नौकरशाही का भाईचारा अक्सर जनहित पर विजय पाता रहा है।

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