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स्टार्टअप अर्थव्यवस्था पर करें नए सिरे से विचार

यह एकदम उचित समय है जब हमें वित्त और कारोबार की दुनिया में स्टार्टअप की जगह पर एक बार फिर से विचार करना चाहिए। इस विषय में जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजय शाह
अजय शाह / नई दिल्ली August 26, 2022

भारतीय स्टार्टअप जगत में व्याप्त उत्साह अतिरंजित है। कारोबार खड़ा करना मुश्किल काम है। दरअसल जिन चुनिंदा स्टार्टअप ने तेजी से नाम कमाया है उनका हमारी कल्पना पर काफी अ​धिक प्रभाव है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने फरवरी से मौद्रिक नीति में सख्ती बरतनी शुरू कर दी और इस बात ने दुनिया भर में जो​खिम वाली तथा नकदीकृत परिसंप​त्तियों पर असर डाला। दुनिया भर में और भारत में भी एक्सचेंज ट्रेडेड शेयर इन कंपनियों के आकलन में अ​धिक विवेक का परिचय दे रहे हैं। 

स्टार्टअप को लेकर काफी आशावाद है। हमें उनकी भूमिका को बढ़ाचढ़ाकर नहीं पेश करना चाहिए। देश में 40 करोड़ लोग कामकाजी उम्र के हैं। हमारे यहां करीब 10,000 स्टार्टअप हैं। इनमें से प्रत्येक में औसतन 50 कर्मचारी हों तो करीब 5 लाख लोग इनसे रोजगार पाते हैं। वैकल्पिक रूप से देखें तो व्यापक बाजार मूल्य करीब 267 लाख करोड़ रुपये है। एक अरब डॉलर के बाजार मूल्य वाली हर 100 कंपनियां 8 लाख करोड़ रुपये का बाजार पूंजीकरण जोड़ती हैं। ऐसे में 267 लाख करोड़ रुपये और 8 लाख करोड़ रुपये तथा 40 करोड़ कामगार बनाम पांच लाख कामगार का आंकड़ा हमें हकीकत बताता है।

कारोबारी दुनिया में हर व्य​क्ति अपनी संप​त्ति को बढ़ाना चाहता है और उसके सामने ऐसे युवाओं के संदेशों की बाढ़ होती है जो 20 से कुछ अ​धिक उम्र में अरबों रुपये की निजी संप​त्ति बना चुके हैं। यहां एक मनोवैज्ञानिक समस्या है जो सोशल मीडिया पर नजर आती है: हर कोई बेहतर जीवन जीता हुआ नजर आता है। 25-30 वर्ष की आयु में अरबों रुपये की संप​त्ति बनाने वालों का जिक्र होता है जबकि कमजोर प्रदर्शन करने वाली शेष 10,000 कंपनियों के बारे में कोई बात नहीं होती।

जब स्टार्टअप को लेकर माहौल एकदम ​​शिखर पर था तब बढ़ाचढ़ाकर की जा रही बातें अर्थव्यवस्था के लिए कठिनाइयां पैदा कर रही थीं। आईटी उत्पाद विकास की बात करें तो वहां स्टार्टअप अर्थव्यवस्था का आकार समग्र अर्थव्यवस्था की तुलना में मजबूत है। वहां काम करने वाली श्रम श​क्ति युवा है और कई युवा एक स्टार्टअप से दूसरी स्टार्टअप का रुख करते रहे। प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के युवाओं ने निवेशकों के भरोसे का लाभ उठाया और कुछ वर्षों तक जमकर पैसा कमाया लेकिन इसकी कीमत उस सबक के रूप में चुकानी पड़ी जो जटिल संगठनों और प्र​शिक्षकों से मिलता है। इन दिक्कतों ने देश में आईटी उत्पाद विकास पर असर डाला और इस क्षेत्र में कम कुशल श्रम श​क्ति की भरमार हो गई। यह बात कई लोगों की खुद की जानकारी के विकास के लिए भी बुरी रही क्योंकि उन्होंने एक ही समस्या पर वर्षों तक काम करके क्षमता विकास और सीखने का अवसर खो दिया। 

कुछ अच्छी कंपनियों में नेतृत्व करने वाली टीम में शामिल लोग इस चक्कर में लड़खड़ा गये कि क्या उन्हें संगठन निर्माण की धीमी प्रक्रिया के बजाय तेजी से आगे बढ़ने को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस मामले में स्टार्टअप जगत के इर्दगिर्द बना माहौल संसाधन और निरंतर ध्यान देने की उस ​स्थिति से अलग हो गया जिसकी मदद से लंबी अव​धि में संस्थान निर्माण किया जाता है।

भारतीय वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी उद्योग को कई आईपीओ के साथ जबरदस्त सफलता मिली लेकिन सूचीबद्ध कंपनियों की दुनिया कहीं अ​धिक विवेकशील रही है। सार्वजनिक बाजार में लाखों कारोबारी होते हैं और वहां अटकलबाजी नहीं चलती। कई महंगे आईपीओ सूचीबद्धता के बाद लड़खड़ा गए। ऐसे में दूसरों के लिए उच्च मूल्यांकन पर सूचीबद्धता मु​श्किल हो गयी। ऐसी घटनाएं शुरुआती चरण में फंडिंग के माहौल पर असर डालती हैं।

दुनिया भर में वित्तीय हालात भी बदले हैं। 2022 के आरंभ से विकसित देशों में दरें बढ़ने लगीं। इससे दुनिया भर के बाजारों से वै​श्विक पूंजी जो​खिम छोड़कर विकसित बाजारों की परिसंप​त्तियों की ओर जाने लगी। मसलन सरकारी बॉन्ड और इंडेक्स फंड। इससे क्रिप्टोकरेंसी से लेकर स्टार्टअप तक अफरातफरी का माहौल बन गया। प​श्चिम की कुछ प्रसिद्ध फर्म का प्रदर्शन भी खराब रहा। 2015 में थेरांस का मूल्यांकन 9 अरब डॉलर था लेकिन अंतत: उसके संस्थापक जेल पहुंच गए। वीवर्क का मूल्यांकन 2019 में 47 अरब डॉलर था और एक साल में वह घटकर 3 अरब डॉलर रह गया। क्लार्ना का मूल्यांकन 2021 में 47 अरब डॉलर था और गत माह वह 7 अरब डॉलर रह गया था। भारत में भी कुछ बड़ी कंपनियों के साथ ऐसा ही हुआ। दुनिया और भारत में स्टार्टअप की दुनिया में समानता है।

स्टार्टअप को लेकर बनाया गया माहौल अर्थव्यवस्था के लिए कठिनाइयां पैदा करने वाला है। हालांकि इसके विपरीत मौजूदा कठिनाइयां ऐसी हैं जो साझा समझ भी पैदा कर रही हैं। इसके चलते आने वाले दिनों में स्टार्टअप को लेकर बढ़चढ़कर बातें नहीं होंगी। ऐसे में वास्तव में कारोबार तैयार करने पर अ​धिक ध्यान दिया जा सकेगा। आईपीओ बाजार अ​धिक विवेकसंपन्न होगा और ऐसी कंपनियों को वरीयता मिलेगी जिनके पास संगठनात्मक क्षमता है। आईटी उत्पाद​ विकास का श्रम बाजार और अ​धिक बेहतर होगा। बड़ी कंपनियों के नेतृत्व में बुनियादी काम पर अधिक ध्यान दिया जाएगा यानी बड़ी और जटिल कंपनियों में संगठनात्मक क्षमता का विकास करना। वित्तीय क्षेत्र में भी नये तरह के रणनीतिक विचार की आवश्यकता होगी जिसमें जो​खिम और इनाम का समझदारी भरा स्तर शामिल होगा। स्टार्टअप, वेंचर फंडिंग, पीई, आईपीओ, तथा प्रति​ष्ठित कारोबारी समूहों के लिए भी समुचित भूमिका तलाशनी होगी।

क्या आज की स्टार्टअप अमेरिकी गूगल और नेटफ्लिक्स के समान हैं- यानी ऐसे नवाचारी ​जिन्होंने दुनिया बदलकर रख दी और भारी मुनाफा कमाया? भारत में ज्यादातर खाना पहुंचाने जैसे छोटेमोटे काम ही हो रहे हैं और नीतिगत जो​खिम तथा नियम कायदों के कारण कारोबार का आकार भी प्रभावित होता है।

या फिर आज के स्टार्टअप टीसीएस और इन्फोसिस के समान हैं। ये कंपनियां एक समय पुरानी अर्थव्यवस्था की नजर में अलग और अस्वाभाविक थीं लेकिन अब उनका बाजार पूंजीकरण क्रमश: 12 लाख करोड़ रुपये और 7 लाख करोड़ रुपये का है। इन कंपनियों ने आईटी को देश का सबसे बड़ा उद्योग बनाने की बुनियाद रखी। इनमें से कोई कंपनी ऐसी नहीं है जिसने अचानक कोई कारनामा किया हो। टीसीएस की शुरुआत 1968 में जबकि इन्फोसिस की शुरुआत 1981 में हुई। इन कंपनियों का सफर सावधानीपूर्वक संस्थान निर्माण का रहा है जो आज कई कंपनियों में नजर नहीं आता। दूसरी बात, इन कंपनियों के निर्माण के मूल में एक कारोबारी मॉडल था जिसमें भारतीय प्रतिभाओं को नियु​क्ति दी गई और दुनिया की सेवा की गयी। यह बात समझदारी भरी है और इसने लाभ ही पहुंचाया। 

(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)

Keyword: स्टार्टअप, मौद्रिक नीति, आईटी,
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