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यूक्रेन युद्ध भारत के लिए नुकसानदेह

बीएस संपादकीय / नई दिल्ली 08 22, 2022

यूक्रेन पर रूस  के हमले को कल छह महीने पूरे हो जाएंगे। यह हमला ऐसे अति दुर्भाग्यपूर्ण समय में हुआ है, जब दुनिया वैश्विक महामारी के आर्थिक प्रभावों से उबर रही है। इस युद्ध के खत्म होने के कोई आसार नजर नहीं आना और भी बदतर खबर है क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ती जा रही है। यूक्रेन के पूर्व एवं दक्षिण में रूस की घुसपैठ तथा कड़े पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ डटे रहने की उसकी ताकत और यूक्रेन का उन्नत हथियारों से सुसज्जित होना अप्रत्याशित बदलावकारी साबित हुआ है। 

रूस के जल्द पीछे हटने या राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के तख्तापलट के अनुमान अपरिपक्व साबित होने से ये भविष्यवाणियां निराशा पैदा कर रही हैं। इस विवाद के मूल में यूरोप के रूसी तेल और गैस पर अपनी भारी निर्भरता को खत्म करने की अपनी क्षमता है। इस विवाद के तत्काल बाद वैश्विक जीवाश्म ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर पहले ही आगाह कर दिया था। अब तेल की कीमतें कुछ हद तक कम हुई हैं, जिसकी एक वजह सुस्त पड़ती वैश्विक अर्थव्यवस्था में कमजोर मांग भी है। लेकिन गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है क्योंकि यूरोप में सर्दियां नजदीक आ गई हैं। गैस मुख्य रूप से ताप के लिए इस्तेमाल होती है। 

इन वैश्विक विवादों ने भारत के लिए प्रत्याशित और अप्रत्याशित चुनौतियां पैदा कर दी हैं। देश लगातार अमेरिकी  प्रस्तावों पर रूस की आलोचना करने से दूर रहा है। इसका देश को कम कीमतों पर रूसी तेल मिलने के लिहाज से फायदा मिला है। इसके चलते रूस कुछ समय के लिए भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया, जिसके नतीजतन पश्चिमी एशियाई देशों को भी भारतीय खरीदारों के लिए कीमतें घटाने को बाध्य होना पड़ा। लेकिन प्राकृतिक गैस को लेकर अनिश्चितता बरकरार है। अब यूरोप रूस की जगह कतर जैसे अहम पश्चिमी एशियाई आपूर्तिकर्ताओं से बड़ी खरीद के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा है। इससे न केवल कीमतें ऊंची बनी हुई हैं बल्कि इसके भारत की खुद की गैस अर्थव्यवस्था- इसकी सब्सिडीयुक्त रसोई गैस योजना और इसकी सिटी गैस वितरण परियोजनाओं के विस्तार के लिए भी निहितार्थ हैं। सिटी गैस वितरण परियोजनाओं के लिए आयात टर्मिनल और पाइपलाइन नेटवर्क को बढ़ाने पर भारी निवेश पहले ही किया जा चुका है। भारत यूरोप की मांगों के नुकसानदेह प्रभावों से कुछ ज्यादा समय बचा रह सकता है क्योंकि उसके कतर के आपूर्तिकर्ताओं के साथ लंबी अवधि के करार हैं। लेकिन इन करारों की अवधि समाप्त होने के बाद गैस आपूर्ति का भविष्य असहज मुद्दा बना हुआ है। जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा के अपने सफर की भारत की योजनाओं में देरी हो सकती है। 

इस युद्ध के नतीजतन भू-राजनीतिक संरचना भारत के लिए ठीक नहीं रहने के आसार हैं। पश्चिमी देशों की रूस की कड़ी आलोचना को मद्देनजर रखते हुए इस युद्ध से पहले रूस और चीन के बीच ‘असीमित’ दोस्ती इतनी मजबूत हो गई है कि रूस को चीन का ‘अधीनस्थ’ कहा जाने लगा है। चूंकि यह संधि अमेरिका के खिलाफ थी, इसलिए भारत के क्वाड और हाल में हिंद-प्रशांत आर्थिक मंच के जरिये अमेरिका से प्रगाढ़ होते संबंधों पर जोखिम है। यह संभव है कि रूस आने वाले समय में चीन की लगातार सीमा घुसपैठ और उकसावे वाली हरकतों पर तटस्थ रुख न रखे। 

भारत अब भी रूस के रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा खरीदार है। इससे समीकरण कुछ हद तक संतुलित हो सकता है। हालांकि कलपुर्जों का एक बड़ा हिस्सा यूक्रेन से खरीदा जाता है, जिसे लगातार बरबाद किया जा रहा है। इसी तरह भारत की नाटो देशों से सामग्री खरीद की सूची लंबी हो जाएगी। यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर लगातार विवेकशील कूटनीति और आर्थिक योजना की दरकार होगी। 
Keyword: यूक्रेन,रूस, व्लादीमिर पुतिन, तेल, गैस, भारत, वैश्विक विवाद,
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