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अगली दर बढ़ोतरी कितनी होगीः 35 या 25 आधार अंक?

एमपीसी सितंबर के आखिरी हफ्ते में अपनी अगली बैठक में एक बार फिर नीतिगत दर बढ़ाएगी।
तमाल बंद्योपाध्याय / नई दिल्ली August 11, 2022

भारतीय केंद्रीय बैंक की दर तय करने वाली समिति- मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) सितंबर के आखिरी हफ्ते में अपनी अगली बैठक में एक बार फिर नीतिगत दर बढ़ाएगी। अगर अगले सात सप्ताह के दौरान बाह्य मोर्चे पर अचानक कोई बड़ी उठापटक नहीं होती है तो फिर से दर में 50 आधार अंक की बढ़ोतरी की संभावना नहीं है। एक आधार अंक एक प्रतिशत का 100वां हिस्सा है। यह बढ़ोतरी 35 आधार अंक हो सकती है, जिससे नीतिगत दर 5.4 फीसदी से बढ़कर 5.75 फीसदी पर पहुंच जाएगी। केवल 25 आधार अंक की बढ़ोतरी से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है। 

ऐसा लगता है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) शुरुआत में ज्यादा दर बढ़ाकर (फ्रंट लोडिंग) के जरिये अर्थव्यवस्था की सॉफ्ट लैंडिंग (महंगाई में कमी लाने के प्रयासों के दौरान मंदी से बचने) का दृढ़ निश्चय कर चुका है। ऐसे में अगली बैठक दौरान 35 आधार अंक की बढ़ोतरी की प्रबल संभावना है। 

इससे पहले आरबीआई की नीतिगत दर  5.4 फीसदी अगस्त 2019 में थी। उस समय खुदरा महंगाई 3.28 फीसदी थी, जो जुलाई 2019 में 3.15 फीसदी के मुकाबले मामूली अधिक थी। 

यह वह समय था, जब ब्याज दर चक्र उलटा घूम रहा था। इससे कुछ महीने पहले जून 2019 में नीतिगत दर 5.75 फीसदी थी। उस समय खुदरा महंगाई का स्तर क्या था? यह 3.18 फीसदी था, जो मई में 3.05 फीसदी के स्तर से बढ़ा था। एमपीसी का लचीला महंगाई लक्ष्य 4 फीसदी है, जिसमें किसी भी तरफ 2 फीसदी का दायरा है। महंगाई जनवरी 2022 से इस दायरे की ऊपरी सीमा से अधिक बनी हुई है। 

सामान्य मॉनसून और भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल मानते हुए हाल की एमपीसी की बैठक में वित्त वर्ष 2023 के लिए 6.7 फीसदी के जून के महंगाई अनुमान को बरकरार रखा गया है। इसने दूसरी और तीसरी तिमाही के अनुमानों में संशोधन किया है, लेकिन चौथी तिमाही के अनुमान को 5.8 फीसदी (दूसरी तिमाही में 7.1 फीसदी और तीसरी तिमाही में 6.4 फीसदी) पर अपरिवर्तित रखा है। जोखिम समान रूप से संतुलित रखा गया है। 

वित्त वर्ष 2024 की पहली तिमाही के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 5 फीसदी है। बहुत से विश्लेषकों को आरबीआई के अनुमान से कम महंगाई के आसार नजर आ रहे हैं। यह आलोच्य वर्ष में 6.7 फीसदी से कम रह सकती है। ऐसा होने पर भी यह केंद्रीय बैंक को ‘अस्वीकार्य’है। इसलिए दर आगे और बढ़ेगी। 

क्या आरबीआई सितंबर में दर बढ़ाने के बाद दिसंबर में भी दर बढ़ाएगा? अगर बढ़ाता है तो कितनी? यह कहां रुकेगा? दूसरे शब्दों में टर्मिनल रेट या तटस्थ दर क्या है, जिससे सुनिश्चित होता है कि अर्थव्यवस्था स्थिर संतुलन में है? मौजूदा चक्र कब खत्म होगा? 

इस समय यह अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन अगर अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही का महंगाई का अनुमान 5 फीसदी है तो दिसंबर तक कम से कम 6 फीसदी और अप्रैल 2023 तक और अधिक नीतिगत दर की उम्मीद की जा सकती है। इससे कम से कम एक फीसदी धनात्मक दर सुनिश्चित होगी। ऋणात्मक ब्याज दर चिंता का विषय है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने शुक्रवार को नीति जारी करने के बाद मीडिया के साथ बातचीत में भी इसका जिक्र किया था। इस समय दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं ऋणात्मक ब्याज दरों (महंगाई नीतिगत दरों की तुलना में काफी अधिक है) से जूझ रही हैं, जिससे धन का मूल्य घट रहा है। 

इससे पहले 6 फीसदी रीपो दर अप्रैल 2019 में थी। उस समय खुदरा महंगाई 2.99 फीसदी थी। 

हाल के बीते वर्षों में नीतिगत दर अगस्त 2018 में 6.5 फीसदी के सबसे ऊंचे स्तर पर थी। उस समय खुदरा महंगाई 3.69 फीसदी थी। तब से दर तेजी से घट रही है। कोविड महामारी की मार से निपटने के लिए मार्च से मई 2020 के बीच इसे 5.15 फीसदी से घटाकर 4 फीसदी कर दिया गया। मई और जून में दो बढ़ोतरी के बाद पिछले सप्ताह की दर बढ़ोतरी अनुमान के मुताबिक ही है। ज्यादातर क्षेत्रों में वृद्धि के संकेत नजर आ रहे हैं, लेकिन महंगाई सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि भारतीय केंद्रीय बैंक ने इस चुनौती से निपटने का दृढ़ निश्चय कर लिया है। डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य भी कम हो रहा है, जिससे स्थितियां ज्यादा विकट बन  रही हैं। हालांकि रुपये में गिरावट अन्य उभरते बाजारों की मुद्राओं के मुकाबले काफी कम है। 

आरबीआई रुपये के अवमूल्यन को लेकर खुले तौर पर चिंतित नहीं है, मगर वह इसके महंगाई पर असर को लेकर सजग है। दास ने कहा, ‘वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता का मुद्रा बाजार समेत घरेलू वित्तीय बाजारों पर भी असर पड़ रहा है, जो आयातित महंगाई का कारण बन रहा है।’

अप्रैल से 3 अगस्त के बीच 13.3 अरब डॉलर की पोर्टफोलियो निकासी हुई है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 642 अरब डॉलर के अपने सर्वोच्च स्तर से घटकर 29 जुलाई को 573.9 अरब डॉलर पर आ गया। आरबीआई की डॉलर बिक्री के अलावा डॉलर के मुकाबले अन्य मुद्राओं के अवमूल्यन से भी विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो रहा है। (संयोग से लंबे अंतराल के बाद 22 से 29 जुलाई तक के सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 2.3 अरब डॉलर बढ़ा है क्योंकि आरबीआई ने शायद डॉलर की बिक्री रोक दी है और डॉलर सूचकांक भी कमजोर हुआ है।)

व्यापार घाटे में बढ़ोतरी जैसे बाहरी कारकों से ऋणात्मक बुनियादी भुगतान संतुलन और ऊंचे चालू खाते के घाटे की स्थिति पैदा हो रही है, जिन्होंने भी दर में बढ़ोतरी के फैसले को प्रभावित किया है। आरबीआई का नीतिगत बयान साहसी रुख दर्शाता है, लेकिन आरबीआई निश्चित रूप से वित्त वर्ष 2013 को नहीं दोहराना चाहता है। 

नीतिगत रीपो दर को 50 आधार अंक बढ़ाकर 5.4 फीसदी करने का फैसला छह सदस्यीय एमपीसी ने सर्वसम्मति से लिया है। यह वृद्धि को सहारा देते हुए महंगाई को लक्षित दायरे में रखने के लिए नरम मौद्रिक नीति को वापस लेने पर ध्यान दे रही है। 

ऐसा लगता है कि एमपीसी वृद्धि को लेकर ज्यादा आश्वस्त है, इसलिए आरबीआई दरें बढ़ाने में अन्य केंद्रीय बैंकों से पीछे नहीं रहेगा। हम दर बढ़ोतरी के चक्र के बीच में पहुंच चुके हैं, जो महंगाई के काबू में आने तक अगले साल की शुरुआत में भी जारी रह सकता है। निस्संदेह अगर महंगाई अनुमान के नकारात्मक जोखिम बढ़ते हैं और अमेरिकी फेडरल रिजर्व यह संकेत देता है कि उसने अपना दर बढ़ोतरी का चक्र पूरा कर लिया है तो स्थिति का जायजा लेने के लिए किसी बैठक में दर बढ़ोतरी टाले जाने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। 

भारत के तेजी से वृद्धि करने में एमपीसी के भरोसे की बहुत सी वजह हैं। टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों के विनिर्माण, घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या और यात्री वाहनों की बिक्री से शहरी मांग में सुधार के संकेत मिलते हैं। हालांकि ग्रामीण बाजार के संकेतक मिलेजुले संकेत दे रहे हैं। उदाहरण के लिए दोपहिया वाहनों की बिक्री बढ़ रही है, लेकिन ट्रैक्टरों की बिक्री में संकुचन देखा जा रहा है। हालांकि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की अच्छी प्रगति और खरीफ की बुआई से ग्रामीण खपत को सहारा मिलने के आसार हैं। 

इससे भी अहम चीज यह है कि निवेश गतिविधि में तेजी आ रही है। विनिर्माण क्षेत्र में क्षमता उपयोग अब अपने लंबी अवधि के औसत से ऊपर है। इससे संकेत मिलता है कि अतिरिक्त क्षमता के सृजन के लिए ताजा निवेश की दरकार है। सालाना आधार पर बैंक ऋण वृद्धि 15 जुलाई को 14 फीसदी थी, जो एक साल पहले केवल 6.5 फीसदी थी। क्षमता उपयोग में बढ़ोतरी, सरकार के पूंजीगत व्यय पर जोर देने और बैंक ऋणों में तगड़ी बढ़ोतरी से निवेश गतिविधि को सहारा मिलेगा। 

साफ तौर पर आरबीआई वृद्धि को लेकर चिंतित नहीं है। यही वजह है कि यह महंगाई से लड़ सकता है और सकारात्मक बना रह सकता है। बहुत सी एजेंसियों ने पिछले कुछ महीनों के दौरान वित्त वर्ष 2023 के लिए भारत की वृद्धि के अनुमान घटा दिए हैं, लेकिन आरबीआई अपने जून के अनुमान 7.2 फीसदी पर अडिग है। महंगाई में कमी के कुछ संकेतों के बावजूद केंद्रीय बैंक ने महंगाई के अनुमान में कटौती नहीं की है। जब एमपीसी अगली बैठक में दर फिर बढ़ाएगी तो हमें इन दोनों स्तरों पर मामूली बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यह अनिश्चित समय में एकमात्र निश्चितता है। 
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
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