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भारतीय बाजार में जारी रहेगी रस्साकशी

नीलकंठ मिश्रा /  08 06, 2022

लगातार 10 माह की बिकवाली के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक पिछले दो सप्ताह से भारतीय शेयरों के विशुद्ध खरीदार की भूमिका में दोबारा लौट आए हैं। इस अवधि में 33 अरब डॉलर की राशि देश से बाहर गई तथा बीएसई 500 में एफपीआई का स्वामित्व 18 फीसदी हो गया जो 2012 के बाद से न्यूनतम है। एफपीआई की बिकवाली मोटे तौर पर उभरते बाजारों से हुई और इन बाजारों से उसका बहिर्गमन बाजार पूंजीकरण के लिहाज से 14 वर्ष पहले आए वित्तीय संकट के बाद सबसे बुरा था। भारत सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है।

भारी बिकवाली के दौर के बाद बाजार में उछाल आती है और हम ऐसी ही उछाल के बीच में हैं। कई संकेतक उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके हैं जिससे अनुमान लगता है कि उचित मूल्य से कम पर बिकवाली हुई है।

अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला प्रतिफल भी बढ़े हुए स्तर से नीचे आया है। उच्च प्रतिफल परिसंपत्ति मूल्य को प्रभावित करता है और प्रतिफल में गिरावट जोखिम वाली परिसंपत्तियों की मांग तैयार करता है। इन तेजियों के शुरुआती चरण में अधिकांश निवेशक दूर रहते हैं क्योंकि व्यापक मान्यता विश्व अर्थव्यवस्था के खराब भविष्य के पक्ष में है। बहरहाल, कुछ सप्ताह के लिए बाजार इस अवधारणा पर यकीन कर सकते हैं कि ‘बुरी खबर अच्छी खबर है।’ इस कारोबारी व्यवहार के लिए मान्यता यही है कि बाजार अग्रगामी सोच के होते हैं और अब तक बाजार में गिरावट आर्थिक कमजोरी में परिलक्षित हुई है। ऐसे प्रमाण भविष्य की मौद्रिक नीति को लेकर संभावना मजबूत करते हैं जिससे शेयर कीमतों में तेजी आती है। अगर यह तेजी कुछ सप्ताह बरकरार रहती है तो बढ़ती शेयर कीमतें निवेशकों में मौका चूक जाने का भय पैदा कर सकती हैं। ऐसी तेजी तब समाप्त होती है जब आर्थिक आंकड़े अनुमान से कमतर साबित होते हैं या बड़ी तादाद में ऐसे निवेशक चूक जाने की आशंका से ग्रस्त हो जाते हैं। इस समय जब हम बहस कर रहे हैं कि क्या मौजूदा बाजार स्तर आर्थिक बुरी खबरों के अनुरूप है लेकिन उभरते बाजारों के लिए समान महत्त्व का प्रश्न यह भी है कि क्या एफपीआई स्वामित्व अपने न्यूनतम स्तर पहुंच चुका है। हमारा विश्लेषण कहता है कि शायद ऐसा न हुआ हो।

बीते पांच वर्ष से अधिक समय में वैश्विक शेयर बाजार पूंजीकरण में हुई वृद्धि में काफी तिरछापन आया है। पांच वर्ष पहले के 74 लाख करोड़ डॉलर से बढ़कर अब यह 97 लाख करोड़ डॉलर हो चुका है। इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 63 फीसदी, चीन की 21 फीसदी, सऊदी अरब की 11 फीसदी और भारत की पांच फीसदी है। बाकी विश्व में न के बराबर वृद्धि हुई है। सऊदी अरामको की सूचीबद्धता के कारण सऊदी अरब में तेजी आई और चीन में भी गत पांच वर्ष में वार्षिक सूचकांक रिटर्न ऋणात्मक रहा है। वहां भी वृद्धि मोटे तौर पर नयी सूचीबद्धता से ही आई है।

अमेरिका में बीते पांच वर्ष में सूचकांक 10 फीसदी वार्षिक की दर से बढ़े हैं जबकि उभरते बाजारों और यूरोपीय संघ में इनमें एक वर्ष में एक फीसदी की गिरावट आई है। कुछ लोग मान सकते हैं कि अगले पांच वर्षों में यह रुझान इसके उलट हो सकता है। बहरहाल, अगले पांच वर्ष में अमेरिका में मूल्य आय अनुपात में कमी आ सकती है लेकिन गैर अमेरिकी बाजारों में बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है।

दूसरी ओर बाजार पूंजीकरण और सकल घरेलू उत्पाद अनुपात के बीच अतियां देखी जा सकती हैं। वैश्विक जीडीपी में अमेरिकी हिस्सेदारी 2010 के बाद से कुछ खास नहीं बदली है। उस दौर में वैश्विक शेयर बाजार पूंजीकरण में अमेरिकी हिस्सेदारी 29 फीसदी से बढ़कर 43 फीसदी हो गयी। अमेरिकी बाजार पूंजीकरण और जीडीपी अनुपात तेजी से बढ़ा और 2010 के 95 प्रतिशत से बढ़कर 2017 में 140 और अब 160 प्रतिशत हो गया है। जबकि अन्य क्षेत्रों में यह एक तय दायरे में रहा। बीते पांच वर्षों में ऐसा उच्च मूल्य आय अनुपात की वजह से नहीं बल्कि अमेरिका के कॉर्पोरेट मुनाफे में जीडीपी की हिस्सेदारी बढ़ने से हुआ है। ऐसे रुझान पलटते भी हैं लेकिन उसकी वजह आमतौर पर राजनीतिक होती है तथा ऐसा कई वर्षों के अंतराल पर होता है।

ऐसे में परिसंपत्ति आवंटकों के लिए अमेरिका में मजबूत प्रतिफल, खासतौर पर पांच वर्ष की अवधि में मिलने वाला प्रतिफल शायद कोई प्रतिरोधक साबित न हो। बल्कि यह भविष्य में अमेरिका में और अधिक आवंटन को बढ़ावा दे सकता है। इन बातों के चलते एफपीआई की आवक बढ़ने का जोखिम रहता है। हकीकत तो यह है कि अगर वैश्विक वृहद आर्थिक अस्थिरता बरकरार रहती है तो एफपीआई की बिकवाली इस वर्ष के आखिर में फिर से शुरू हो सकती है क्योंकि निचले स्तर पर जोखिम तैयार होना जारी रहेगा।

एफपीआई की भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार काफी मजबूत रहा है। अमेरिकी डॉलर के संदर्भ में उसके कुल बाजार पूंजीकरण ने बीते 12 महीनों में शेष विश्व के शेयरों को 20 फीसदी से अधिक से पीछे छोड़ दिया है। ऐसा तब है जब हम भारतीय जीवन बीमा निगम की सूचीबद्धता को समायोजित कर दें जिसने बाजार पूंजीकरण में दो फीसदी का इजाफा किया। क्या घरेलू आवक जिसने बाजार का समर्थन किया वह जारी रहेगी? इसकी मदद से घरेलू आवक को चार हिस्सों में बांटा जा सकता है।

पहला है खुदरा निवेशकों की प्रत्यक्ष भागीदारी: निरंतर आवक के बावजूद कमजोर प्रदर्शन के कारण बीती तिमाही में बीएसई 500 में उनकी हिस्सेदारी कम हुई। आसान प्रतिफल रुक जाने के कारण खुदरा गतिविधियां धीमी पड़ी हैं तथा कई स्थानों पर ये ठप रही हैं। दूसरी है कर्मचारी भविष्य निधि संगठन या बीमा कपंनियों जैसी संस्थाओं द्वारा संस्थागत खरीदी। इसमें स्थिर आवक होती है और उसका एक हिस्सा शेयरों में जाता है। तीसरा है सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी की मदद से होने वाली भारी भरकम आवक जहां वृद्धि तो धीमी हो सकती है लेकिन एक सार्थक पलटाव की संभावना बहुत कम है। चौथा है शेयरों में होने वाला मोटा-मोटा आवंटन जो उच्च ब्याज दरों के कारण आगे चलकर कमजोर पड़ सकता है। कुल मिलाकर आर्थिक वजहों से सार्थक पलटाव होता नजर नहीं आता।

ऐसे में घरेलू संस्थानों द्वारा बीएसई 500 में एफपीआई को प्रतिस्थापित करना भविष्य में जारी रह सकता है क्योंकि भारतीय निवेशक उस कीमत पर खरीद के इच्छुक हैं जो विदेशी निवेशकों को बहुत अधिक लगती है। भारत में आने वाले एफपीआई की आवक का बड़ा हिस्सा उभरते बाजारों या एशिया फंड के माध्यम से आता है। भारत अभी अपने आप में एक परिसंपत्ति वर्ग नहीं है। ऐसे फंडों में शायद सतत आवक बरकरार नहीं रहे। उभरते बाजार फंड से एक और बर्हिगमन का जोखिम भारतीय बाजार पर मंडराता रहेगा।

Keyword: भारतीय बाजार, रस्साकशी, विदेशी निवेशक, बिकवाली, घरेलू खरीद, बॉन्ड प्रतिफल,
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