बिजनेस स्टैंडर्ड - 75 वर्ष का प्रदर्शन
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75 वर्ष का प्रदर्शन

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 06, 2022

आजादी के बाद के 75 वर्षों में एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत के प्रदर्शन का आकलन किस प्रकार किया जाना चाहिए? सबसे स्पष्ट बिंदु तो यही है कि हमारे देश ने आजादी से पहले के 90 वर्ष के औपनिवे​शिक शासन तथा उससे पहले के एक सदी के औपनिवे​शिक शोषण की तुलना में जबरदस्त बदलाव हासिल किया है। पहले तेज गिरावट और उसके बाद ठहराव की लगभग दो सदियों के बाद सन 1947 में औसत जीवन संभाव्यता 32 वर्ष थी और वहां से भारत एक नये ढंग से उभरा। वह एक लक्ष्य के साथ आगे बढ़ा और उसने खुद को सामाजिक और आ​र्थिक प्रगति के लिए झोंक दिया।

प​श्चिमी पर्यवेक्षकों की खराब ​टीका-टिप्प​णियों को झुठलाते हुए (सन 1960 में सेलीग हैरिसन ने कहा था कि पाकिस्तान की तरह भारत भी सैन्य शासन के हवाले हो जाएगा या विखंडित हो जाएगा। या फिर जैसा कि साम्राज्यवादी-नस्ली सोच के वशीभूत विंस्टन चर्चिल ने कहा था, ‘भारत भूमध्य रेखा से अ​धिक एकजुट राष्ट्र नहीं है।‘ दरअसल ऐसा कहकर वह एक देश के रूप में भारत की पहचान को नकार रहे थे )। परंतु इन सभी बातों के बावजूद भारत एक देश के रूप में एकजुट रहा और उपनिवेशकाल के बाद उन गिनेचुने देशों में शामिल है जो लोकतांत्रिक बने रहे हैं। ये अपने आप में मामूली कामयाबियां नहीं हैं।

आ​र्थिक मोर्चे पर भारत एक नयी सुबह के शुरुआती वादे से आगे बढ़ा और चिंतित करने वाले कमजोर प्रदर्शन से गुजरते हुए उसने सुधार हासिल किया और बीते तीन दशकों में दुनिया की सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली अर्थव्यवस्थाओं वाले देश में शुमार हुआ। अब वह ऐसी ​स्थिति में है कि निकट भविष्य में दुनिया की सबसे तेज गति से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था बन सकता है। इस वर्ष भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। एक दशक पहले यह शीर्ष 10 से बाहर था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत अच्छी ​स्थिति में है और ऊपरी श्रेणी में अपनी जगह तलाश रहा है। वै​श्विक मानचित्र पर भारत एक ऐसा देश है जिसे लेकर चिंता की कोई वजह नहीं। भारत ​स्थिर, पूर्वानुमेय तथा एक जिम्मेदार परमाणु श​क्ति है। दो पड़ोसी मुल्कों के साथ अनसुलझे विवादों के बावजूद लगभग सभी देशों से उसके सकारात्मक संबंध हैं। उसकी कोई ऐसी मांग नहीं है जिसके तहत वह अतीत में गंवायी जमीन पर दावा करता हो। जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं की बात करें तो वह समस्या नहीं ब​ल्कि हल का हिस्सा है। वै​श्विक आ​र्थिक वृद्धि में वह तीसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है।

लेकिन उसका प्रदर्शन उतार-चढ़ाव वाला है। 75 वर्ष बीत जाने तथा एक संसाधन संपन्न बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत तीन प्रमुख मोर्चों पर विफल रहा है: कक्षा 10 तक सार्वभौमिक स्कूली ​शिक्षा मुहैया कराने के मामले में, एक अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने में और रोजगार चाहने वाले सभी लोगों को रोजगार देने में।

इन प्रमुख विफलताओं के अलावा दो और विफलताएं हो सकती हैं: स्वच्छ जल और स्वच्छ हवा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुंच मुहैया करा पाना तथा समुचित कानून और न्याय व्यवस्था मुहैया कराना ताकि देश की जेलों में बंद दो तिहाई कैदी   ‘विचाराधीन’ की श्रेणी के न हों। पर्यावरण को पहुंच रहा नुकसान तथा गलत कृ​षि व्यवहार के कारण बढ़ते जल संकट ने इन विफलताओं के कारण होने वाली क्षति को बढ़ा दिया है। इन नाकामियों के ​शिकार प्राय: वंचित वर्ग के लोग हैं यानी दलित और आदिवासी, प्रवासी और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक। एक शब्द में कहें तो नि:शक्तजन।

इस प्रकार भारत एक भारी असमानता वाला और अन्यायपूर्ण समाज बन गया। इन नाकामियों को व्यापक तौर पर चिह्नित भी किया गया लेकिन इन्हें लेकर तत्काल प्रभावी कदम नहीं क्यों नहीं उठाए गए इसका विश्लेषण होना अभी बाकी है। ऐसे में व्यापक मध्य वर्ग पर दिया जाने वाला ध्यान एक प्रकार का विषयांतर है। खासतौर पर इसलिए कि मध्य- वर्ग दरअसल मध्यवर्ग नहीं है ब​ल्कि वह शीर्ष एक चौथाई वर्ग में आता है। कुछ मानकों पर तो वह शीर्षस्थ दायरे में आता है। वि​भिन्न क्षेत्रों में हमारी प्रभावी सफलताएं दरअसल ऊपरी वर्ग की सफलताएं हैं लेकिन उन्हें इस आधार पर कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।

इस बीच सार्वजनिक संस्थान जो एक सादा लोकतंत्र (ऐसा देश जो समय-समय पर होने वाले चुनाव से शासित होता है) बनाते हैं और एक उदार गणतंत्र में क्रियान्वयन पर नजर रखते हैं, उनका वर्षों से लगातार क्षरण हो रहा है। विधायिकाएं बमु​श्किल काम कर रही हैं, न्यायालयों के बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता और भागीदारी वाली स्थानीय सरकारें वित्तीय तंगी से जूझ रही हैं। सरकार और बाजार के बीच के रिश्ते तो दिक्कतदेह बने ही हुए हैं, साथ ही राज्य और व्य​क्तियों के बीच के रिश्ते ज्यादा चिंता का विषय हैं। अगली चौथाई सदी में देश एक समग्र स्वीकार्यता वाले देश के रूप में तभी उभर सकता है जब वह संस्थागत और नीतिगत नाकामियों को हल करता है और अपनी असमानता तथा अनुचित व्यवहार को कम करने पर ध्यान केंद्रित करता है। तभी वास्तव में वह भारत की सदी बन सकेगी।

Keyword: प्रदर्शन, आजादी, स्वतंत्र देश, औपनिवे​शिक शासन, शोषण, अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन,
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