बिजनेस स्टैंडर्ड - महामारी के बाद कुछ आश्चर्य
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, August 09, 2022 07:36 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

महामारी के बाद कुछ आश्चर्य

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  July 30, 2022

महामारी के दौरान, उसके बाद के सुधार तथा उसके पश्चात के दौर में यानी 2020 से लेकर 2022 तक तथा अगर 2023 के परिदृश्य को भी ध्यान में रखा जाए तो किस अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा वै​श्विक आ​​र्थिक दृष्टिकोण को लेकर प्रस्तुत ताजा तिमाही आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो इस दिलचस्प सवाल के चकित करने वाले जवाब सामने आते हैं। महामारी के आगमन के बाद आर्थिक वृद्धि के क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन करने वाला देश वह है जिसे अब हम तुर्किए (तुर्की) के नाम से जानते हैं। यह आश्चर्य की बात इसलिए है कि तुर्की आमतौर पर अपनी गिरती मुद्रा और नासमझी भरी मौद्रिक नीति की वजह से ही सु​र्खियों में रहता है। लेकिन अगर 2020 और 2021 के वृहद आ​र्थिक प्रदर्शन तथा 2022 तथा 2023 के लिए आईएमएफ के अनुमान को ध्यान में रखें तो तुर्की ने 5.1 फीसदी की सालाना औसत वृद्धि हासिल की। इन चार वर्षों में यह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वृद्धि है। 30 रेखांकित देशों के लिए आईएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक तुर्की के बाद चीन का स्थान है और उसने 2020-23 के दौरान 4.55 फीसदी की वृद्धि दर हासिल की। दूसरा चौंकाने वाला नाम मिस्र का है जिसके 4.3 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल करने की बात कही जा रही है। भारत 3.9 फीसदी के साथ चौथे स्थान पर है। उसके ठीक बाद (आपको इसे हजम करने में दिक्कत होगी) 3.6 फीसदी के साथ पाकिस्तान का स्थान है। बांग्लादेश पहले ही वृद्धि और कुछ विकास सूचकांकों पर असाधारण प्रदर्शन करता आ रहा है। ऐसे में लगता है कि इस्लामिक दुनिया से कुछ शानदार प्रदर्शन करने वाले देश सामने आए हैं। 2022 में सऊदी अरब सबसे तेजी से विकसित होने वाला देश रहेगा (तेल कीमतों के बारे में सोचिए)। सबसे बड़ा सवाल चीन को लेकर है। वहां काम करने वाली उम्र के लोगों की तादाद में लगातार कमी आ रही है। आईएमएफ का अनुमान है कि इस वर्ष तथा अगले वर्ष चीन की औसत वृद्धि चार फीसदी से कम रहेगी। यह कई दशकों का सबसे न्यूनतम स्तर होगा। अचल संप​त्ति तथा वित्तीय क्षेत्र की दिक्कतों के चलते उसका वृहद आ​र्थिक प्रदर्शन भी प्रभावित होगा। इसके अलावा कूटनीतिक शत्रुता रखने वाली पश्चिमी दुनिया के कारण भी निर्यात आधारित वृद्धि मु​श्किल होगी क्योंकि चीन की कंपनियों के ​खिलाफ किसी न किसी प्रकार के कदम उठाए जाते रहेंगे।

जहां तक भारत के प्रदर्शन की बात है महामारी के पहले वर्ष यानी वित्त वर्ष 2020-21 में उसका प्रदर्शन बुरा रहा। उससे पिछले वर्ष ही वहां धीमापन आ गया था। लेकिन बाद के वर्षों में उसने काफी तेज सुधार हासिल किया। अगले दो वर्षों के लिए आईएमएफ के पूर्वानुमान को देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था आईएमएफ की 30 देशों की चयनित सूची में सबसे तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था नजर आती है। इस वर्ष तथा अगले साल 6.8 फीसदी की औसत वृद्धि होने की बात कही गई है।

आईएमएफ के अलावा अनेक बहुपक्षीय तथा निजी पूर्वानुमान जताने वालों की भी ऐसी ही राय है। कुछ घरेलू विश्लेषकों ने तो मध्यम अव​धि में 7 से 8 फीसदी की वृद्धि हासिल करने की बात भी कही है। ऐसे सामूहिक सोच में फंसने से बचने का एक तरीका यह है कि अनुमानों पर सवाल उठाए जाएं। अब तक पांच वर्ष की केवल दो ऐसी अव​धि आई हैं जब भारत ने तेज वृद्धि हासिल की है। पहली बार ऐसा 2003-04 से 2007-08 के बीच हुआ था जब वै​श्विक अर्थव्यवस्था उफान पर थी और भारत को निर्यात में तेजी का फायदा मिला था। दूसरी बार ऐसा 2014-19 के बीच हुआ जब गिरती और लगातार कमजोर तेल कीमतों के चलते वृद्धि को बल मिला था। तेज वृद्धि के इन दोनों अवसरों के बाद तीव्र मंदी भी आई। पहले मौके पर हमारे सामने एक वित्तीय संकट आया और इस बार महामारी के कारण धीमापन देखा गया। विगत तीन वित्त वर्ष में भारत की औसत वृद्धि केवल 1.9 फीसदी रही है।

एक तरह से देखा जाए तो इस कम आधार से तेज वृद्धि का अनुमान जताना स्वाभाविक है। परंतु इस आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि अर्थव्यवस्था को महामारी से कोई दीर्घकालिक नुकसान नहीं पहुंचा है और यह भी कि परिवहन अधोसंरचना तथा डिजिटलीकरण में निवेश करने से उत्पादकता में वृद्धि देखने को मिलेगी। इनमें से पहले अनुमान पर तमाम सवाल हैं क्योंकि छोटे और मझोले उपक्रमों तथा रोजगार पर महामारी का असर साफ नजर आया है। बड़ी तादाद में लोग खेती की ओर लौटे हैं जबकि हकीकत में इसका उलटा होना चाहिए था।

वै​श्विक माहौल भी पहले जैसा अनुकूल नहीं है। उत्तरी अटलांटिक के आसपास के देशों में मुद्रास्फीतिजनित मंदी की ​स्थिति बन सकती है, कोविड वायरस खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है और सैन्य संघर्ष के कारण आपूर्ति बा​धित है। तीन घरेलू बाधाएं भी उतनी ही स्पष्ट हैं: जीडीपी की अनुपात में करीब दो अंकों में पहुंच रहा राजकोषीय घाटा (केंद्र और राज्य को मिलाकर), चालू खाते का बढ़ता घाटा और ब्याज दरों के बढ़ने के बीच उच्च सार्वजनिक ऋण। इन कारकों के चलते विस्तारवादी राजकोषीय और मौद्रिक नीति कठिन हो सकती है। ऐसे में आशावाद के साथ थोड़ी सतर्कता बरतते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए।

Keyword: महामारी, आईएमएफ, तुर्की, मौद्रिक नीति, आ​र्थिक प्रदर्शन, चीन, कूटनीतिक शत्रुता,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 बिजली वितरण में बदलाव से उपभोक्ताओं को होगा फायदा
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.