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छत्तीसगढ़ में गुटबाजी से बढ़ेगी कांग्रेस की परेशानी!

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 23, 2022

वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद ही एक नई कहानी शुरू हो गई थी। शुरुआत में छत्तीसगढ़ चुनाव होने के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राज्य में कांग्रेस के नए चेहरों को बड़ी जिम्मेदारी देने की योजना के तहत ताम्रध्वज साहू का चयन मुख्यमंत्री बनाने के लिए किया था। राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से, कांग्रेस ने 68 सीटों पर जीत हासिल करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बड़े अंतर से हराया था और पार्टी केवल 15 सीटें जीत सकी थी।

बाकी अन्य दलों को सात सीटें मिलीं। उस वक्त निवर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष त्रिभुवनेश्वर सरन सिंहदेव थे जो छत्तीसगढ़ में टीएस बाबा के नाम से जाने जाते हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से नई सरकार में उन्हें एक बड़ी भूमिका दिए जाने की उम्मीद थी और ऐसे भी आसार थे कि सरकार में उन्हें शीर्ष पद मिल सकता है। उन्होंने अपनी अंबिकापुर सीट लगभग 90,000 वोटों के अंतर से जीत ली थी जो विधानसभा चुनाव में वोटों का एक बड़ा अंतर था।

बाद में मुख्यमंत्री बने भूपेश बघेल उन दिनों सिंहदेव के साथ दिल्ली से तुरंत लौटे ही थे। दिल्ली में इन दोनों नेताओं को शीर्ष पद देने का आश्वासन दिया गया था। रायपुर पहुंचते ही उन्हें पता चला कि ताम्रध्वज साहू के समर्थक जश्न मनाते हुए आतिशबाजी कर रहे हैं। खरगोश और कछुए की कहानी की तरह ही साहू मुख्यमंत्री पद की दौड़ में लगभग बाजी मार चुके थे।

वे हवाईअड्डे पर फिर वापस लौटे और वहां से दिल्ली चले गए। दिल्ली में अहमद पटेल ने सभी विरोधाभासों को खत्म करते हुए पूरे कार्यकाल को आधे-आधे हिस्से में बांटते हुए पद देने की व्यवस्था कर दी। इसी व्यवस्था के चलते साहू को गृह मंत्री बनाया गया।

इसके बाद कोविड-19 का दौर आया और अहमद पटेल का निधन हो गया। अब सिंहदेव के पास सिर्फ आश्वासन के शब्द भर ही थे कि वह कार्यकाल के बाकी आधे हिस्से में मुख्यमंत्री पद की कमान संभालेंगे। जब बघेल की तरफ से कोई सुगबुगाहट नहीं मिली तब सिंहदेव ने अपना विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। पिछले साल जुलाई में दोनों को दिल्ली बुलाया गया था। वहां से लौटने पर बघेल ने एक सार्वजनिक बयान दिया, ‘कोई बदलाव नहीं हुआ और यहां कोई गठबंधन सरकार नहीं चल रही है कि दो व्यक्तियों के बीच कार्यकाल का विभाजन होगा।’ एक तरह से उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि जो वादे किए गए अब उनका कोई मतलब नहीं बनता।

अब छत्तीसगढ़ में फिर से नेतृत्व का संकट बढ़ा है जो बिल्कुल पंजाब और राजस्थान की तर्ज पर ही चल रहा है। पंजाब में पहले ही पार्टी सत्ता से बाहर हो चुकी है और उसका सफाया हो चुका है। राजस्थान में अभी फैसले का इंतजार है।

इस बीच, राज्य में कुछ घोटालों की की रिपोर्टें सामने आईं कि सरकार दुर्ग में एक संकटग्रस्त मेडिकल कॉलेज को बचाने के लिए सार्वजनिक संसाधनों को लगाने के लिए तैयार थी। यह कोई संयोग नहीं था कि कॉलेज का स्वामित्व बघेल के रिश्तेदारों के पास था।

इस दौरान स्वास्थ्य एवं पंचायत राज मंत्री सिंहदेव मुख्यमंत्री को याद दिलाते रहे कि कांग्रेस के घोषणापत्र में किए गए वादों को अधूरा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। रमन सिंह के मुख्यमंत्री बने रहने के समय दुर्ग में भूखंड आवंटन को लेकर केंद्र सरकार बघेल के पीछे पड़ी हुई है।

अब एक बार फिर सिंहदेव मुख्यमंत्री को कांग्रेस के घोषणा पत्र में किए गए वादों की याद दिला रहे हैं। उन्होंने ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्रालय के पद से इस्तीफा दे दिया और कहा है कि अगर मुख्यमंत्री अपने मंत्रालयों को चलाना चाहते हैं तो वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं।

इससे पहले राज्य में मनरेगा के 21 सहायक कार्यक्रम अधिकारियों (एपीओ) को बर्खास्त किया गया था और छत्तीसगढ़ में मनरेगा अधिकारियों की हड़ताल भी हुई। इसकी वजह से इस साल अप्रैल, मई और जून के गर्मियों के महीनों के दौरान राज्य में मनरेगा के काम भी रुक गए।

उन्हें चेतावनी जारी की गई थी और जब वे काम पर वापस नहीं लौटेंगे तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने 15 जुलाई को एपीओ को बहाल करते हुए मंत्री के आदेशों को खारिज कर दिया जिनके विभाग ने उन्हें बर्खास्त करने का आदेश जारी किया था।

सार्वजनिक किए गए एक पत्र में सिंहदेव ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लाभार्थियों के लिए एक भी घर नहीं बनाया गया क्योंकि ‘बार-बार अनुरोध’ के बावजूद इसके लिए धन आवंटित नहीं किया गया। इसके अलावा मंत्री की कुछ विवेकाधीन शक्तियों को कम कर दिया गया था। एक और मुद्दा और यह भी था कि इस महीने की शुरुआत में छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम के तहत तैयार किए जाने वाले नियमों को मंजूरी दे दी थी। ये मंत्री सिंहदेव द्वारा प्रस्तावित नियमों से अलग थे।

इन घटनाक्रम के बाद ही सिंहदेव ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने एक विभाग से इस्तीफा दे दिया है लेकिन स्वास्थ्य विभाग उनके साथ है और वह कांग्रेस के सदस्य बने हुए हैं। शुरुआत में बघेल ने इससे इनकार करते हुए यह दावा किया कि उन्हें कोई इस्तीफा पत्र नहीं मिला है। इसके बाद राज्य के 10 मंत्रियों समेत 61 विधायकों ने कांग्रेस आलाकमान को पत्र पर हस्ताक्षर कर टीएस सिंहदेव के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है।

दोनों ही नेता अपना दबदबा रखने वाली शख्सियत माने जाते हैं। बघेल एक ऐसे राज्य में एक तेज-तर्रार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नेता हैं जहां ओबीसी आबादी 55 प्रतिशत से अधिक है। इसके विपरीत, सिंहदेव शालीन और विनम्र, सरगुजा शाही परिवार के सदस्य हैं।

जिस तरह के हालात बन रहे हैं उसमें सिंहदेव को इस वक्त सभी परिस्थितियों का सहन करना होगा। कांग्रेस नेतृत्व प्रवर्तन निदेशालय की जांच से जूझने में व्यस्त है, ऐसे में उनके पास छत्तीसगढ़ में गुटबाजी से निपटने के लिए वक्त कम ही होगा।

किसी भी लिहाज से बघेल इस वक्त अहम हैं, हालांकि असम में उनके प्रयास विफल हो गए। वह विधानसभा चुनावों के प्रभारी थे और कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक था। सिंहदेव के भाजपा में शामिल होने की संभावना कम है क्योंकि रमन सिंह की मौजूदगी वहां पहले से ही है। लेकिन सभी लोग जानते हैं कि राजनीतिक दल में असंतोष कभी-कभी अप्रत्याशित हालात के कारण भी बन सकते हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा कुछ होने से कोई इनकार नहीं कर सकता है।

Keyword: छत्तीसगढ़, गुटबाजी, कांग्रेस, विधानसभा चुनाव, राहुल गांधी, भारतीय जनता पार्टी,
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