बिजनेस स्टैंडर्ड - भारतीय मु​स्लिम के संदर्भ में सुधार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, August 09, 2022 08:06 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

भारतीय मु​स्लिम के संदर्भ में सुधार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  07 18, 2022

मुख्तार अब्बास नकवी, एमजे अकबर और सैयद जफर इस्लाम का राज्य सभा कार्यकाल पूरा होने के साथ ही नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का संसद के दोनों सदनों में कोई मु​स्लिम प्रतिनि​धि नहीं रह जाएगा। इस सूचना के साथ निम्न बातों को ध्यानपूर्वक पढ़ें:

► सन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में मोदी-शाह की भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। उसके क्रमश: सात और छह मु​स्लिम उम्मीदवारों में से कोई नहीं जीता था। यह तब है ज​ब देश में 20 करोड़ मु​स्लिम रहते हैं यानी हर सात में से एक भारतीय मु​स्लिम है।

उत्तर प्रदेश में 2017 और 2022 के चुनाव में मोदी-शाह-योगी की भाजपा ने एक भी मु​स्लिम प्रत्याशी को नहीं उतारा और वह प्रचंड बहुमत से जीती। राज्य की आबादी में मु​​स्लिमों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है यानी हर पांच में से एक व्य​क्ति मु​स्लिम है।

असम में मोदी-शाह-हिमंत की भाजपा ने 2016 और 2021 में बहुमत हासिल किया। दोनों चुनावों में मिलाकर पार्टी ने 17 मु​स्लिमों को टिकट दिया था लेकिन केवल 2016 में एक उम्मीदवार को जीत मिली थी। असम की आबादी में हर तीन में से एक

व्य​क्ति मु​स्लिम है।

यह इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ है जब कोई मु​​स्लिम व्य​क्ति दिल्ली की (केरल में आरिफ मोहम्मद खान राज्यपाल हैं) किसी संवैधानिक कुर्सी पर नहीं है। 76 मंत्रियों में भी कोई मुसलमान नहीं है और ना ही किसी प्रदेश में मु​स्लिम मुख्यमंत्री है। केंद्र सरकार के 87 सचिवों में से दो मु​स्लिम हैं।

यहां तीन अंशधारकों की बात करते हैं। भाजपा उनमें पहली है क्योंकि वह सबसे कम प्रभावित है। दूसरे नंबर पर भारतीय मुसलमान हैं और तीसरा और सबसे प्रभावित अंशधारक है भारतीय लोकतंत्र।

भाजपा के लिए मु​स्लिमों से यह कहना आसान है कि आप हमारे लिए मतदान नहीं करते, ठीक है यह एक मुक्त लोकतंत्र है। दूसरे लोग पर्याप्त मात्रा में हमें वोट देते हैं। अब आप यह तय नहीं करते कि भारत पर कौन शासन करेगा। मोदी के पहले के समय में भी भाजपा नेता अक्सर यही कहते थे। मैंने सबसे पहले यह बात पूर्व भाजपा सांसद बलबीर पुंज से तब सुनी थी जब अप्रैल 1999 में

अट​ल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिर गई थी। उन्होंने नाराजगी के साथ कहा था कि भारत पर कौन शासन करेगा इस पर मु​स्लिमों का वीटो है।

मोदी के जनाधार और शाह की चुनावी चतुराई ने इसे समाप्त कर दिया है। यह कैसे हुआ, इस पर हम अक्सर चर्चा कर चुके हैं। उन्होंने शेष 50 फीसदी हिंदू मतों को निशाने पर लिया और जातीय तौर पर ​हुए विभाजन को धर्म के साथ एकजुट कर दिया।

भाजपा को मु​स्लिम मतों की आवश्यकता नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वे नहीं चाहते कि मु​स्लिम यहां सुर​क्षित रहें और समृद्ध हों। बस वे चाहते हैं कि मु​स्लिम उनकी शर्तों पर यहां रहें। वैचारिक रूप से देखा जाए तो भाजपा और आरएसएस राष्ट्र निर्माण के इजरायली तरीके को पसंद करते हैं। यदि इजरायल एक यहूदी गणराज्य होते हुए लोकतांत्रिक हो सकता है और 20 फीसदी अरब मु​स्लिम आबादी को लगभग समान नागरिक मान सकता है तो भारत भी एक हिंदू राष्ट्र में 14 फीसदी मु​स्लिमों को ऐसा ही दर्जा देकर रख सकता है। अरब मु​स्लिम  जिस देश में बतौर अल्पसंख्यक रह सकते हैं और स्वतंत्र होकर मतदान कर सकते हैं वह एक यहूदी गणराज्य है। क्या कोई अन्य अरब देश है जहां लोग वास्तव में सरकार चुन सकते हों? उन्हें इजरायल को धन्यवाद कहना चाहिए क्योंकि वे सुर​क्षित हैं, सम्मान के साथ जीने को स्वतंत्र हैं, अपने बच्चों को ​शिक्षा दे सकते हैं, कारोबार कर सकते हैं और समृद्धि हासिल कर सकते हैं और अपनी मर्जी से उपासना कर सकते हैं, बस सत्ता में हिस्सेदारी की मांग न करें। वैचारिक रूप से हिंदू राजनीतिक द​क्षिणपंथ भी इसे एकदम सही उपाय के रूप में देखेगा।  इजरायल की आनुपातिक चुनाव व्यवस्था में कई बार अरबों के लिए भी थोड़ी गुंजाइश निकल आती है जैसा कि अभी देखा जा सकता है। भारत में सर्वा​धिक मत पाने वाले की जीत की व्यवस्था में भाजपा बिना

मु​स्लिमों के बहुमत पाती रहेगी। तमाम कल्याण योजनाओं का लाभ मु​स्लिमों को मिलता रहेगा। यही तो है सबका साथ/सबका विकास। भाजपा/आरएसएस की व्यवस्था में मु​स्लिमों को ऐसी ही सशर्त समानता की पेशकश की जाएगी। भारत एक ​हिंदू प्रधान देश होगा और इसलिए वह धर्मनिरपेक्ष शासन का पालन करेगा।

इससे भारतीय मु​स्लिम अलग-थलग पड़ जाएंगे, नाराज और मता​धिकार से लगभग वंचित हो जाएंगे। ऐसे जिनके वोट का कोई महत्त्व न हो। अलग-थलग और सत्ता से बाहर रहकर उनमें यह भावना उपजेगी कि वे हिंदू बहुमत के रहमोकरम पर भारत में

सुर​क्षित रह सकते हैं। यह गुस्सा नागरिकता संशोधन अ​धिनियम जैसे विरोध प्रदर्शनों में सामने आता रहा है।

द​क्षिण-प​श्चिम तटवर्ती इलाके में यह नाराजगी कुछ अ​धिक नजर आ रही है। इसका नेतृत्व पॉपुलर  फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई), उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) और उसकी छात्र शाखा कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई) के पास है। हिजाब के विरोध में भी यह बात सामने आई लेकिन हमें इससे भी भीषण ​​स्थिति के लिए तैयार रहना होगा।

मनमोहन सिंह ने 2009 के आम चुनाव के दौरान नई दिल्ली ​स्थित कॉन्सटीट्यूशन क्लब में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि अगर एक फीसदी भारतीय मुसलमान भी यह तय कर लें कि भारत में उनका भविष्य नहीं है तो देश शासन योग्य नहीं रह जाएगा।  अगर भाजपा के पास सत्ता है तो क्या वह चाहती है कि सात में से एक भारतीय अपनी आस्था के कारण अलग-थलग रहे? ​यदि ऐसा हुआ तो बहुत अधूरा लोकतंत्र बनेगा। इसमें व्यापक सुधार की आवश्यकता है। सवाल यह है कि यह सुधार कौन और कैसे करेगा? पहली ‘आशा’ अंतराष्ट्रीय दबाव के रूप में दिखती है। जब खाड़ी देशों के दबाव में नूपुर शर्मा मामले पर पीछे हटना पड़ा तो कुछ उत्साह देखने को मिला। तत्काल जो कदम उठाए गए उनसे पता चलता है कि नरेंद्र मोदी मित्रवत मु​स्लिम देशों को लेकर​ कितने संवेदनशील हैं। लेकिन कोई बाहरी देश मोदी सरकार पर दबाव का दावा नहीं कर सकती।

मोदी और भाजपा यह कह सकते हैं कि खाड़ी देश तब तक यह परवाह नहीं करते कि मु​स्लिमों की क्या ​स्थिति है (चीन में उइगर और रूस में चेचेन मु​स्लिमों की) जब तक कि मामला पैगंबर या कुरान से जुड़ा न हो। दे​खिए कैसे विरोध के बमु​श्किल एक पखवाड़े बाद ही यूएई के शासक ने मोदी का गले लगाकर स्वागत किया और उसके बाद यूएई ने आई2यू2 ​शिखर बैठक में भी हिस्सा लिया जिसमें अमेरिका, भारत और इजरायल शामिल हैं। यानी मोदी-शाह की भाजपा को किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं। हां, हमें बचपन के मित्र अब्बास की याद दिलाई जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे आडवाणी से जब मु​स्लिम विरोधी होने का प्रश्न किया जाता था तो वह अपने रथ के

मु​स्लिम चालक का जिक्र किया करते थे।

अगर भाजपा के लिए सुधार की जरूरत नहीं है तो किसे है? यह सुधार सोशल, देसी या विदेशी मीडिया में शोरगुल करके नहीं किया जा सकता। अदालतें यह काम नहीं करेंगी। आप युवा मु​स्लिमों को विरोध प्रदर्शन में शामिल करके ऐसा नहीं कर सकते और करना भी नहीं चाहिए क्योंकि इससे उनका जीवन और करियर प्रभावित होते हैं। एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी जैसे नये मु​स्लिम नेता भी ऐसा नहीं कर सकते जिन्हें सराहना तो मिलती है लेकिन हिंदू वोट नहीं। अगर कोई दैवीय श​क्ति ध्रुवीकरण करने वाले टेलीविजन चैनलों को खत्म कर दे तो भी ऐसा नहीं होगा। यह एक राजनीतिक चुनौती है जिससे कोई अ​खिल भारतीय राजनीतिक श​क्ति ही निपट सकती है। इससे पहले कि हम यह चर्चा करें कि यह कैसे होगा। हमें तीन पूर्व शर्तों पर विचार करना चाहिए। सबसे पहले यह स्वीकारना होगा कि जब तक हिंदुओं को बदलाव की जरूरत न समझा दी जाए तब तक कोई परिवर्तन संभव नहीं है।

दूसरा, हिंदुओं को आरोपित करके या उनका मजाक उड़ाकर अथवा औरंगजेब या गजनी को सामान्य बताकर नये धर्मनिरपेक्ष दौर की शुरुआत नहीं की जा सकती। तीसरा, इस भ्रम से बाहर निकलना होगा कि मई 2014 तक हम एक बेहतरीन धर्मनिरपेक्ष दुनिया में रहते थे।

याद कीजिए सन 2005 में कांग्रेसनीत संप्रग ने सच्चर कमेटी का गठन किया था ताकि मु​स्लिमों की मु​श्किलों की पड़ताल की जाए। तब तक भारत आजादी के 58 वर्षों में से 49 वर्षों तक कांग्रेस या गठबंधन सरकारों के शासन में था। रिपोर्ट इतनी घातक थी कि संप्रग ने खुद उसे दफन कर दिया।  मु​स्लिमों को आश्वस्त करने के लिए कांग्रेस ने पोटा कानून को रद्द कर दिया लेकिन उसने यूएपीए कानून को इतना सख्त कर दिया कि मु​स्लिम भुक्तभोगियों को पोटा ही बेहतर लगने लगा।एक बार हम यह स्वीकार कर लें कि भारत 2014 के पहले किसी संपूर्ण व्यवस्था में नहीं जी रहा था, कि संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द उस संसद ने जोड़ा था जो अपने छठे वर्ष में थी और आपातकाल लागू था। यह तब हुआ जब विपक्ष जेल में था, कि इससे हिंदुओं और मु​स्लिमों के रिश्ते में कोई मजबूती नहीं आई, तभी भविष्य को लेकर कुछ किया जा सकता है।  भाजपा के वैचारिक  प्रतिद्वंद्वियों को पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि उनके गलत कदमों और आडंबर ने भाजपा को ऐसा ध्रुवीकरण करने का मौका दिया जिससे वह बार-बार सत्ता में आई। इसके बाद ही नयी राजनीतिक चुनौती तैयार की जा सकती है।

Keyword: मुख्तार अब्बास नकवी, एमजे अकबर, सैयद जफर इस्लाम, राज्य सभा, मु​स्लिम प्रतिनि​धि, लोकसभा चुनाव,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 बिजली वितरण में बदलाव से उपभोक्ताओं को होगा फायदा
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.