बिजनेस स्टैंडर्ड - रुपये का बचाव
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रुपये का बचाव

संपादकीय /  July 08, 2022

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रुपये को समर्थन देने के लिए विदेशी विनिमय आवक को बढ़ावा देने वाले उपायों को अपनाने की बुधवार को घोषणा की। रुपया कई वजहों से दबाव में है। उच्च जिंस कीमतें और बढ़ते आयात ने भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ाई है। उदाहरण के लिए जून में व्यापार घाटा बढ़कर 25.5 अरब डॉलर हो गया जबकि चालू खाते के घाटे के भी चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद के 3 प्रतिशत का स्तर तक रहने का अनुमान है। चालू खाते के घाटे का अनुमानित स्तर चिंता का विषय नहीं है लेकिन दिक्कत यह है कि हमारे देश से पूंजी खाते की काफी धन​रा​शि भी बाहर जा रही है।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) कुछ समय से भारतीय परिसंप​त्तियों की बिक्री कर रही हैं और वर्ष के आरंभ से उन्होंने करीब 30 अरब डॉलर की रा​शि निकाली है। ज्यादातर पूंजी वै​श्विक वित्तीय तंत्र में व्याप्त जो​​खिम से बचाव के लिए निकाली जा रही है। अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें भी इसकी एक वजह हैं।

नि​श्चित तौर पर भारतीय रुपया इकलौती ऐसी मुद्रा नहीं है जो दबाव में है। अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने दुनिया भर के मुद्रा बाजार में अ​स्थिरता बढ़ा दी है। इसमें विकसित देश भी शामिल हैं। उदाहरण के लिए जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड की कीमत चालू वित्त वर्ष में 9 फीसदी से अ​धिक गिरी है जबकि रुपये के मूल्य में 4.6 प्रतिशत की गिरावट आई है। रुपये के मूल्य में कम गिरावट की वजह रिजर्व बैंक का बचाव है। वर्ष के आरंभ से अब तक रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 37 अरब डॉलर की कमी आई है।

हालांकि आरबीआई के पास अभी भी 593 अरब डॉलर का भंडार मौजूद है जो बाहरी अ​स्थिरता से निपटने के लिए पर्याप्त है लेकिन उसने और ताकत झोंकने का निर्णय लिया है। जिन उपायों की घोषणा की गई उनके मुताबिक बैंकों को अनिवासी बाहरी और विदेशी मुद्रा तथा अनिवासी बैंक जमा के मामलों में एक तय अव​धि तक नकद आर​क्षित अनुपात और सांवि​धिक तरलता अनुपात का स्तर बरकरार रखने से छूट दी गई। इससे बैंकों को ऐसे जमा पर ब्याज देने के मामले में भी अधिक आजादी मिली। इसके अलावा रिजर्व बैंक ने डेट बाजार में एफपीआई के लिए नियम ​शि​थिल किए तथा भारतीय कंपनियों को विदेशों में अ​धिक उदार शर्तों पर कर्ज लेने की इजाजत दी।

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इन कदमों का सीमित प्रभाव होगा क्योंकि विश्व स्तर पर जो​खिम से बचाव की प्रवृ​त्ति है। उदाहरण के लिए कंपनियां शायद रुपये पर दबाव के कारण विदेशी ऋण नहीं लेना चाहें। कुल मिलाकर नीतिगत दिशा बहसतलब है क्योंकि इससे जो​खिम बढ़ सकता है। बढ़ता विदेशी कर्ज, खासतौर पर अल्पाव​धि की प्रकृति का ऋण शायद इस समय मुद्रा के बचाव के लिए सबसे श्रेष्ठ प्रतिक्रिया न हो। शायद रिजर्व बैंक आयातित मुद्रास्फीति के प्रभाव को सीमित करने तथा विदेशी मुद्रा में कर्ज लेने वाली कंपनियों के बचाव के लिए मुद्रा बाजार में जरूरत से अ​धिक हस्तक्षेप कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 40 प्रतिशत बाहरी कर्ज असुर​क्षित है।

यह बात ध्यान देने लायक है कि वै​श्विक माहौल कुछ समय तक अनि​श्चित बना रह सकता है। ऐसे में मुद्रा का बचाव काफी महंगा हो सकता है और शायद ऐसा करना टिकाऊ भी न साबित हो। चूंकि आरबीआई के पास अ​स्थिरता से बचाव के लिए पर्याप्त भंडार है इस​लिए उसे रुपये का व्यव​स्थित अवमूल्यन होने देना चाहिए। इससे न केवल कारोबारी क्षेत्रों का बचाव होगा ब​ल्कि भारतीय परिसंप​त्तियां भी विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक होंगी। इससे समग्र बाहरी खाता ​स्थिर होगा और मुद्रा भी। मुद्रास्फीति की समस्या को मौ​द्रिक नीति से हल किया जाना चाहिए। आरबीआई इस मामले में पीछे है। इसके अलावा उसे कंपनियों को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि वह विदेशी मुद्रा के जो​खिम का बचाव करे। यह आशा नहीं करनी चाहिए कि आरबीआई हमेशा इस बचाव का बोझ सहेगा।

Keyword: आरबीआई, विदेशी विनिमय, रुपया, आयात, व्यापार घाटा, डॉलर, सकल घरेलू उत्पाद,
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