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सहयोग की राह के बीच चुनौतियां भी कम नहीं

हर्ष वी पंत और विवेक मिश्रा /  July 06, 2022

बीते दिनों ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हुआ। पहले यही अटकलें लगाई जा रही थीं कि इस साल यह वर्चुअल के बजाय औपचारिक रूप से आयोजित होगा। यदि ऐसा होता तो चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच भारतीय प्रतिनिधिमंडल को चीन का दौरा करना पड़ता। हालांकि ऐसा नहीं हुआ और इस आयोजन को वर्चुअल रूप में ही संपन्न करना पड़ा। गत 23 से 24 जून को आयोजित ब्रिक्स का यह14वां सम्मेलन था और लगातार तीसरी बार यह ऑनलाइन संपन्न हुआ। इसमें वैश्विक घटनाक्रम पर उच्चस्तरीय संवाद किया गया। सम्मेलन में पांचों देशों ने अपनी प्राथमिकताएं सामने रखीं। साथ ही उन्होंने वैश्विक शासन संचालन में सुधार और उसे सशक्त बनाने का संकल्प भी लिया। इन देशों ने कोविड महामारी से लड़ने में एकजुटता, शांति एवं सुरक्षा के संरक्षण, आर्थिक बहाली को प्रोत्साहन, सतत विकास से जुड़े एजेंडे को अमल में लाने के लिए तेजी दिखाने, लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने और संस्थागत विकास को आगे ले जाने जैसे मुद्दों पर सहमति जताई। सम्मेलन में वार्ता के दौरान आतंकवाद-विरोधी, व्यापार, स्वास्थ्य, पारंपरिक दवाएं, पर्यावरण और नवाचार, कृषि, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के साथ ही बहुस्तरीय तंत्र में सुधार, कोविड महामारी से निपटने और वैश्विक आर्थिक बहाली को गति देने जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी गहन मंथन किया गया।

जहां तक भारत की बात है तो उसने कई बिंदुओं पर जोर दिया। उसने ब्रिक्स पहचान तंत्र, ब्रिक्स दस्तावेजों का ऑनलाइन डेटाबेस, ब्रिक्स रेलवे रिसर्च नेटवर्क की स्थापना और सूक्ष्म, लघु और मध्यम आकार के उपक्रमों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। ये ऐसे कदम हैं जो सदस्य देशों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने और और आपूर्ति श्रृंखला को सुसंगत बनाने की दिशा में सुधार करेंगे। इसके अतिरिक्त भारत ने इस साल ब्रिक्स स्टार्टअप सम्मेलन आयोजित करने का भी ऐलान किया, जो विश्व में उसका तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम होने की हैसियत के अनुरूप ही है। यह ग्लोबल साउथ में भारत को नवाचार का सिरमौर बना सकता है। भारत ने नागरिक समाज संगठन और थिंक टैंक्स को सशक्त बनाने पर भी जोर दिया। उसने ब्रिक्स के भीतर लोगों के लोगों से संपर्क के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला, विशेषकर उस परिदृश्य में जब चार सदस्य चार महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हों और महामारी के बाद की हलचल में संपर्क बिंदु अभी भी गतिरोध के शिकार हों। कोविड-उपरांत वैश्विक बहाली में मदद करने के लिहाज से ब्रिक्स सहयोग काफी दूरगामी हो सकता है, उसके लिए दवा उत्पादों को परस्पर मान्यता के माध्यम से समूह के सदस्य देशों के बीच एक परिचालन ढांचा उपयोगी होगा। सहयोग के कई अन्य महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर भी चर्चा हुई, जिनमें कोविड के बाद वैश्विक बहाली, ब्रिक्स की पहुंच को बढ़ाना और अंतरिक्ष सहयोग को निरंतर बनाए रखना जैसे मुद्दे शामिल रहे।

अंतरिक्ष सहयोग पर हाल में गठित संयुक्त आयोग ने सदस्य देशों के बीच 14वें सम्मेलन में रिमोट सेंसिंग और डेटा शेयरिंग ढांचे की दृष्टि से सही पूर्वपीठिका की भूमिका निभाई। जहां ब्रिक्स के संभावित विस्तार की संभावनाओं पर मंथन जारी है, वहीं ब्रिक्स की पहुंच को प्रोत्साहन और ब्रिक्स प्लस सहयोग को अन्य उभरते बाजारों और विकासशील देशों तक विस्तारित सहयोग का स्वरूप प्रदान करना भी केंद्र में रहा।

सदस्य देशों के बीच निरंतर बढ़ते सहयोग के बावजूद चुनौतियां और टकराव के बिंदु भी रहे हैं और हालिया सम्मेलन भी इस लिहाज से कोई अपवाद नहीं था। भारत ने इस मुद्दे को बखूबी रेखांकित किया कि जब एक दूसरे की सुरक्षा चिंताओं का प्रश्न आए तो सदस्य देशों को उसे लेकर व्यापक संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिए। खासतौर से भारत का संकेत आतंकवाद जैसे मुद्दे को लेकर था। दरअसल बीते दिनों भारत और अमेरिका ने पाकिस्तान में सक्रिय संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े अब्दुल रहमान मक्की को वैश्विक आतंकी घोषित करने का एक प्रस्ताव पेश किया था, जिस पर चीन ने अड़ंगा लगा दिया। भारत का इशारा उसी ओर था।

यूक्रेन युद्ध और भारत-चीन तनाव भी समकालीन महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद बने परिदृश्य में ब्रिक्स के लिए भी चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। असल में इससे राजनीतिक एवं डिजिटल दोनों मोर्चों पर एक खंडित वैश्विक संचालन ढांचे के आसार बढ़ गए हैं। स्वयं ब्रिक्स के भीतर रूस-भारत, भारत-चीन और चीन-रूस के बीच विभिन्न द्विपक्षीय प्राथमिकताएं एवं चुनौतियां हैं। जैसे-जैसे रूस को पश्चिमी प्रभुत्व वाली प्रणाली से बाहर किया जाएगा, वैसे-वैसे वैश्विक संचालन एवं वित्त के मोर्चे पर नए ढांचे पर भरोसे को लेकर ब्रिक्स पर दबाव बढ़ सकता है। ब्रिक्स के पूर्ववर्ती ब्रिक समूह की स्थापना ही 2009 की उस पृष्ठभूमि में हुई थी, जब दुनिया वित्तीय मंदी की चपेट में थी और 2008 में रूस की जॉर्जिया से जंग छिड़ी हुई थी। तब इसकी स्थापना के माध्यम से यही रेखांकित करना था कि ग्लोबल साउथ का एक ऐसा लचीला सहयोग ढांचा बनाया जाए, जो पश्चिमी भू-आर्थिक मजबूरियों और फैसलों के प्रभावों से संरक्षित रहे। जहां वर्ष 2014 में रूस के जी-8 से किनारा करने के फैसले ने भले ही अन्य ब्रिक्स साझेदारों को मॉस्को के साथ आर्थिक कड़ियों को तोड़ने में कुछ खास अंतर न डाला हो, लेकिन यूक्रेन को लेकर रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंध सदस्य देशों के बीच व्यापार एवं वाणिज्य के समीकरणों को गड़बड़ा सकते हैं। बीते दिनों जर्मनी में आयोजित जी-7 समूह की बैठक में रूसी ऊर्जा और स्वर्ण निर्यात पर प्रतिबंधों का मसला चर्चा में रहा, जिसके भारत और चीन जैसे ब्रिक्स सदस्य देशों के लिए अपने निहितार्थ हो सकते हैं, जो रूस से निरंतर ऊर्जा स्रोतों का आयात कर रहे हैं।

फिर भारत-चीन संबंधों का मसला आता है, जिसमें सामान्य होने के कोई संकेत नहीं दिखते। वर्ष 2020 के गलवान संकट के बाद भारतीय जनमानस की भावनाओं को समझने में बीजिंग ने हिचक ही दिखाई है। इसने दोनों देशों में टकराव बढ़ा दिया है और एशिया की दो बड़ी शक्तियों में एक दूसरे के साथ अब बमुश्किल ही कोई वार्ता हो रही है। ब्रिक्स ऐसा एक मंच उपलब्ध कराता है, लेकिन द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करने की उसकी क्षमता अभी अपेक्षाकृत सीमित ही बनी हुई है। वहीं चीन-भारत संबंधों के सामान्य हुए ​बिना ब्रिक्स में भले ही कितनी बड़ी घोषणाएं होती रहें उनका कोई खास अर्थ नहीं रह जाता।

इस वर्ष के शिखर सम्मेलन ने भी एकता के भाव को प्रदर्शित करने का साहसिक प्रयास किया, किंतु प्रत्येक नेता के बयान से यह स्पष्ट हुआ कि पांचों सदस्य देशों की प्राथमिकताएं निरंतर बदल रही हैं। इन व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की पूर्ति की दिशा में एक मंच के रूप में ब्रिक्स की क्षमताएं दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रही हैं।

(पंत नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) में वाइस-प्रेसिडेंट और किंग्स कॉलेज, लंदन मे प्रोफेसर हैं। मिश्रा ओआरएफ में फेलो हैं)

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