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भ्रम और दुविधा के दोराहे पर रेटिंग परिदृश्य

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  July 03, 2022

भारतीय रेटिंग एजेंसियों के शीर्ष प्रबंधन में कई की नींद इस समय उड़ी हुई है।  क्रेडिट वृद्धि (सीई) के साथ बैंक ऋण रेटिंग के नियम बदल गए हैं, लेकिन अन्य ऋण माध्यमों के लिए रेटिंग के नियमों में कोई बदलाव नहीं आया है। कई इकाइयों-कंपनियों के रेटिंग परिदृश्य में 90 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी बैंक ऋण रेटिंग की होती है। जबकि ये इकाइयां बाजार से बॉन्ड और गैर-परिवर्तनीय ऋणपत्रों इत्यादि से भी ऋण जुटा रही होती हैं। जहां तक रेटिंग का सवाल है तो सात क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने अभी तक कुल 59,000 कंपनियों की रेटिंग की है। इनमें से 920 ऋण संबंधी मसलों से जूझ रही हैं।

कॉरपोरेट द्वारा प्रत्याभूत (गारंटी) किसी ऋण पर रेटिंग को सीई श्रेणी के साथ जुड़ाव में बैंक ऋण रेटिंग कहा जाता है। कॉरपोरेट गारंटी असल में प्रवर्तकों द्वारा किया गया ऐसा वादा है, जो समूह की कंपनी द्वारा ऋण न चुकाने की स्थिति में उनकी बाध्यता-दायित्व को निर्धारित करता है। वहीं एसओ (संरचनात्मक दायित्व) अनुलग्न के अंतर्गत अन्य डेट इन्सट्रुमेंट्स आते हैं। रेटिंग करने वाले रेटर्स पास-थ्रू सर्टिफिकेट्स (पीटीसी) जैसे प्रतिभूतिकृत पत्रों की रेटिंग में एसओ का उपयोग करते हैं। वैसे तो इनकी प्रकृति बान्ड जैसी है, लेकिन इनमें भुगतान में असफल रहने के जोखिम के अतिरिक्त ब्याज दर जोखिम और पूर्व भुगतान जैसे जोखिम भी जुड़े होते हैं।  रेटिंग करने वाले की नींद उड़ने की वजह यही है कि वे ऐसे अखाड़े में दांव आजमा रहे हैं, जहां दो रेफरी मौजूद हैं। जहां बैंक ऋण रेटिंग की निगरानी के लिए आरबीआई है, वहीं डेट इन्स्ट्रुमेंट की निगरानी के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) मौजूद है। बाजार नियमाक 13 जून, 2019 को जारी एक परिपत्र में एसओ और सीई रेटेड इंस्ट्रुमेंट में अंतर स्पष्ट कर चुका है। (जैसे लोन पूल्स का एक पूल जैसा भविष्य का प्रापक एसओ के अंतर्गत आएगा, जबकि कॉरपोरेट गारंटी जैसी बाह्य ऋण वृद्धि सीई के तहत गिनी जाएगी।) वहीं बैंकिंग नियामक ने 22 अप्रैल को नियमावली जारी की है, जो सीई की पात्रता को निर्धारित करती है कि किस प्रकार की गारंटी इसके लिए मान्य होगी। इसका लब्बोलुआब यही है कि 21 अक्टूबर के बाद सीई रेटिंग से जुड़े नियम बदलने जा रहे हैं।  नए नियम यही कहते हैं कि बेसल-2 के अंतर्गत बैंकों से ऋण लेने के लिए रेटिंग अनिवार्य होगी। क्रेडिट रेटिंग की पद्धति सुव्यवस्थित होनी चाहिए, जिसमें किसी प्रकार की कोई ढील न दी जाए। आरबीआई ने यह भी निर्धारित किया है कि सभी रेटिंग एजेंसियां बैंक ऋण रेटिंग में डिफॉल्ट (भुगतान से चूकने) के लिए एकसमान परिभाषा का पालन करेंगी और उनकी निरंतर निगरानी की जाएगी।

असल में कॉरपोरेट ऋण लेने वाले आवेदक के लिए कर्ज को मंजूरी देते समय कोई भी बैंक उसकी रेटिंग करता है और उसी अनुसार दर नियत भी की जाती है। बाहरी रेटिंग से बैंक की पूंजीगत आवश्यकताओं पर असर पड़ेगा, क्योंकि यह तथाकथित जोखिम भार तय करता है।

उदाहरण के रूप में किसी ट्रिपल-ए कंपनी को 100 रुपये का ऋण देने के लिए बैंक को केवल 1.80 रुपये की पूंजी निकालकर रखनी होती है, वहीं डबल-ए कंपनी के लिए यह पूंजी 2.70 रुपये और ए रेटिंग वाली कंपनी के लिए 4.50 रुपये तक निकालनी होगी। वहीं ट्रिपल-बी कंपनी के लिए बैंक को 100 रुपये के ऋण के लिए 9 रुपये रखने होंगे, क्योंकि इसमें सौ प्रतिशत जोखिम होता है। वहीं ट्रिपल-बी से कमतर रेटिंग वालों के लिए पूंजी आवश्यकता 13.50 रुपये हो जाती है, जिसमें 150 प्रतिशत जोखिम निहित होता है। 

बड़ी अजीब बात है कि गैर-रेटिंग वाली कंपनी के लिए पूंजीगत आवश्यकता 9 रुपये की होगी, जो ट्रिपल-बी रेटिंग वाली कंपनी के ही समान है। यही कारण है कि जिन कंपनियों की वित्तीय सेहत बहुत दुरुस्त नहीं होती, वे रेटिंग से बचना चाहती हैं। कम से 21,000 कंपनियां ऐसी हैं, जिनकी किसी भी रेटिंग एजेंसी से कोई उपयोगी रेटिंग नहीं हुई है। जबकि बेहतर ऋण रेटिंग ऋण लेने वालों के लिए बैंक के साथ बेहतर सौदेबाजी में सहायक होती है।

ऐसे में आरबीआई क्या चाहता है? यही कि बैंक ऋण-सीई रेटिंग के लिए मूल्यांकन एवं निगरानी के नजरिये से रेटर्स (रेटिंग करने वालों) के पास बोर्ड-अनुमोदित नीति होनी ही चाहिए। उन्हें प्रवर्तक-समूह कंपनियों या वित्तीय संस्थानों से स्पष्ट गारंटी सुनिश्चित करनी चाहिए। सहजता पत्र (लेटर ऑफ कंफर्ट) जैसे विकल्प तब तक मान्य नहीं होंगे, जब तक कि वे केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तुत न किए गए हों और वे कानूनी रूप से प्रवर्तन योग्य हों, जिनमें न कोई शर्त होगी और न ही उनमें कोई परिवर्तन किया जा सकेगा। ऋण वृद्धि के लिए शेयरों को भी गिरवी नहीं रखा जा सकता है।  इन अपेक्षाओं के साथ ही आरबीआई रेटिंग प्राप्त इकाइयों की गारंटी की प्रकृति से जुड़ी बारीकियों में भी गया है। इसके लिए उसने तय किया है कि गारंटी बिना शर्त, अटल और प्रवर्तनीय होनी चाहिए। उसमें ऋण के मूल धन और ब्याज दोनों को शामिल किया जाना चाहिए। गारंटी को लेकर एक निश्चित समय सीमा होनी चाहिए। जब भी मांग हो तो गारंटर को पूरा भुगतान करना चाहिए। बहरहाल भारतीय अनुबंध अधिनियम गारंटर को कुछ अधिकार प्रदान करता है, जिसमें अनुबंध की शर्तों में परिवर्तन जैसी परिस्थितियों में बाध्यताओं के स्वतः समाप्त होने का भी प्रावधान है। ऐसे में आरबीआई चाहता है कि रेटर ऐसी किसी भी आसन्न स्थिति की गुंजाइश न रहने दे। कंपनी के दीवालिया होने की स्थिति में गारंटर को पूरी राशि चुकानी होगी। और अंत में यह कि यदि गारंटी किसी विदेश कंपनी की भारतीय अनुषंगी इकाई के लिए है तो उसकी कम से कम एक अंतरराष्ट्रीय क्रेटिड रेटिंग एजेंसी द्वारा रेटिंग अवश्य होनी चाहिए।

अतीत के कुछ अनुभवों और चलन को देखते हुए अब रेटिंग करने वालों के समक्ष स्वाभाविक रूप से कुछ चुनौतियां बढ़ना तय है। वे यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते कि रेटिंग तो ‘ओपिनियन’ उद्योग है और यह हमेशा भविष्योन्मुखी और विश्वास पर आधारित होती है। अब उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के बारीक से बारीक बिंदुओं की पड़ताल करनी होगी। करीब 300 ट्रिपल-ए रेटिंग वाली कंपनियां हैं। वहीं लगभग 600 कंपनियां ऐसी हैं, जिनकी बैंक लोन रेटिंग ट्रिपल ए, डबल ए और ए श्रेणी में आती है। उनमें से तमाम के अपनी मौजूदा स्थितियों से फिसलन के आसार हैं। परिणामस्वरूप बैंकों के लिए पूंजीगत आवश्यकता भी बढ़ेगी।

बाजार नियामक ने अभी तक आरबीआई की नियमावली पर अपना कोई स्पष्ट रुख नहीं दर्शाया है। तब क्या इसका यही अर्थ होगा कि रेटिंग करने वालों को बैंक लोन रेटिंग और बॉन्ड रेटिंग के लिए दो पद्धतियां अपनानी होंगी। यदि ऐसा होता है तो हम ऐसी स्थिति देखेंगे जहां एक ही कंपनी की दो रेटिंग होंगी, जहां डेट कि लिए उसकी उच्च रेटिंग होगी तो बैंक ऋण-सीई रेटिंग कमतर होगी। एक संभावना यह भी होगी कि रेटिंग करने वाले ही दोनों के लिए अलग-अलग रवैया अपनाएं। इसका परिणाम यही निकलेगा कि रेटिंग वाली कंपनियों का दायरा और सिकुड़ेगा। ऐसे में अब बैंकिंग और बाजार नियामक साथ मिलकर सीई रेटिंग के लिए कोई सार्वभौमिक एकसमान उपाय सुझाएं। अन्यथा सभी अंशभागियों, फिर चाहे वह रेटिंग करने वाले हों, ऋण लेने वाले हों या निवेशक, सभी भ्रमित होंगे और उन्हें इस भ्रम का खमियाजा भी भुगतना होगा। 

Keyword: भ्रम, दुविधा, रेटिंग परिदृश्य, क्रेडिट वृद्धि, बैंक ऋण, पीटीसी, सेबी,
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