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नया कानून, पुरानी समस्याएं

संपादकीय /  June 29, 2022

बीती आधी सदी में विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) के निरंतर खराब प्रदर्शन के बावजूद सरकार ने इन क्षेत्रों का दायरा लगभग दोगुना करने का निर्णय किया है। इससे संबंधित कानून संसद के आगामी मॉनसून सत्र में पेश किया जाना है। डेवलपमेंट एंटरप्राइज ऐंड सर्विसेज हब (देश) विधेयक एक महत्त्वाकांक्षी कानून है जिसका लक्ष्य विशालकाय विनिर्माण एवं निवेश केंद्र निर्मित करने का है जो निर्यातोन्मुखी तथा घरेलू दोनों तरह के निवेश को सुविधा प्रदान करेगा और घरेलू टैरिफ एरिया तथा एसईजेड की दोहरी भूमिका निबाहेगा। ये विकास केंद्र राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के क्षेत्रीय बोर्डों के अधीन तैयार होंगे और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इन्हें केंद्र या राज्य अथवा दोनों मिलकर या फिर कोई वस्तु या सेवा विनिर्माता स्थापित कर सकता है।

यह विकेंद्रीकृत एकल खिड़की व्यवस्था इसलिए तैयार की गई है ताकि विभिन्न स्वीकृतियां हासिल करने की उस व्यावहारिक समस्या से निजात पायी जा सके जिसका सामना उद्यमियों को देश में कोई प्रतिष्ठान स्थापित करते समय करना पड़ता है। इसमें निर्गम विकल्प और एसईजेड को विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अधिक अनुकूल बनाना शामिल है। यह दरअसल भारत फोर्ज के चेयरमैन बाबा कल्याणी की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति के प्रस्तावों का निचोड़ है। यह आगामी कानून देश में एसईजेड की पूरी संभावनाओं का दोहन करने की राह में रोड़ा बनने वाली कुछ अहम बाधाओं को दूर करने की दिशा में एक सार्थक कदम हो सकता है। लेकिन इसकी सफलता की असली परीक्षा इस बात में निहित होगी कि यह उन अहम मसलों का कैसे समाधान करेगा जो अतीत में किसी भी बड़ी औद्योगिक परियोजना की असल समस्या रहे हैं। भूमि अधिग्रहण के कड़े कानून परियोजना लागत में काफी इजाफा करते हैं और लालफीताशाही के कारण भी 2005 के कानून के तहत बने एसईजेड का आकार बहुत छोटा रहा। छोटे आकार के कारण वे उतनी आर्थिक गति नहीं पैदा कर पाए जिसने चीन जैसे देश को चौथाई सदी में एक वैश्विक शक्ति बना दिया।

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में एक अध्यादेश के जरिये इस भूमि कानून को शिथिल बनाने का प्रयास किया था लेकिन गंभीर राजनीतिक और जन विरोध के चलते यह प्रयास सफल नहीं हुआ। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि देश विधेयक इस विवादित मसले को कैसे हल करेगा। इसके अलावा नीतिगत

अनिश्चितता भी एक और कमजोरी बनी हुई है जो नये कानून के दायरे के बाहर है। कर रियायतों को समाप्त करना भी एक मसला है जो उद्योग जगत के ऐसे क्षेत्रों से पीछे हटने का कारण बनता है। ‘पिछड़ा क्षेत्र’ जोन के मामले में हमने ऐसा ही देखा जहां राज्य सरकारों ने समयबद्ध प्रोत्साहन की पेशकश की थी। कराधान के अलावा केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अनुमान योग्य और स्थिर नीतिगत और नियामकीय माहौल की भी इन क्षेत्रों में निवेश सुनिश्चित करने में अहम भूमिका होगी।

 अगर सरकार चाहती है कि उद्यमी आगे आएं और अपनी पूंजी लगाएं तथा जोखिम उठाएं तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि ताकतवर घरेलू लॉबी दिक्कतें न खड़ी करें, शुल्कों में इजाफा न किया जाए और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के निर्णयों की अनदेखी न की जाए। इस मामले में आर्थिक नीति में बार-बार बदलाव भी अनुकूल साबित नहीं होगा। सबसे बढ़कर ऐसे मामलों में सुरक्षित बुनियादी ढांचे से लेकर लॉजिस्टिक लिंक और अबाध बिजली आपूर्ति आदि भी ऐसी बातें हैं जिन पर अभी भी सवालिया निशान हैं। इन सभी मसलों के राष्ट्रीय स्तर के हल तलाशने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही समग्र कारोबारी माहौल में सुधार आएगा।

इन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करके ही हम निवेश के लिए अधिक रचनात्मक और अनुकूल माहौल तैयार कर पाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो भारत में एसईजेड की अवधारणा शायद कारगर साबित हो क्योंकि अतीत में तो यह कारगर नहीं साबित हुई है।

Keyword: नया कानून, समस्याएं, विशेष आर्थिक क्षेत्र, एसईजेड, खराब प्रदर्शन,
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