बिजनेस स्टैंडर्ड - वृद्धि की जद्दोजहद और मुद्रास्फीति का प्रश्न
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, August 09, 2022 07:49 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

वृद्धि की जद्दोजहद और मुद्रास्फीति का प्रश्न

अजय त्यागी /  June 28, 2022

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अधिनियम की 2016 में संशोधित प्रस्तावना में कहा गया है, ‘मौद्रिक नीति का प्राथमिक लक्ष्य है कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और इसके साथ ही वृद्धि के लक्ष्य को ध्यान में रखना।’

‘वृद्धि’ को परिभाषित करना विवादास्पद मुद्दा है। कई लोग कह सकते हैं कि इसे स्थायी, समावेशी, समतावादी वृद्धि आदि होना चाहिए। ये अहम मुद्दे हैं और इन पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए लेकिन यहां हम एक सामान्य समझ वाले अर्थ के साथ आगे बढ़ेंगे। ऑक्सफर्ड अंग्रेजी शब्दकोश के अनुसार आर्थिक वृद्धि है, ‘अर्थव्यवस्था के उत्पादन का विस्तार, जो आमतौर पर राष्ट्रीय आय में वृद्धि से जुड़ा हो।’ व्यापक तौर पर देखा जाए तो राष्ट्रीय आय में होने वाले इजाफे को आदर्श स्थिति में लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए और इसलिए वृद्धि की सहायता करने में किसी को मुश्किल नहीं होनी चाहिए।

बहरहाल, पारंपरिक आर्थिक सिद्धांत में किसी अर्थव्यवस्था के वृद्धि को सहायता पहुंचाने की सीमा होती है। यह सीमा उसके विकास के चरण और खपत क्षमता से तय होती है। समुचित स्तर से अधिक वृद्धि अर्थव्यवस्था में ओवरहीटिंग लाती है जो उसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। अर्थव्यवस्था की ओवरहीटिंग से मुद्रास्फीति में इजाफा समेत कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

मुद्रास्फीति, मुद्रास्फीतिक अनुमानों में इजाफे के अलावा अलग-अलग अंशधारकों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है।

यह एक अहम पहलू है लेकिन यहां हम इस विषय पर चर्चा नहीं करेंगे। उच्च मुद्रास्फीति ज्यादातर असंगठित क्षेत्र के लोगों, तयशुदा आय वाले लोगों, पेंशनभोगियों और बैंक के जमा खातों में पैसा रखने वाले लोगों को प्रभावित करती है। यह भी कहा जा सकता है कि समुचित स्तर से अधिक मुद्रास्फीति वृद्धि के हित में नहीं होती। निश्चित रूप से एक स्तर ऐसा आता है जहां मुद्रास्फीति ‘मुद्रास्फीतिजनित मंदी’ की स्थिति में पहुंच जाती है जहां एक ही समय वृद्धि में धीमापन और मुद्रास्फीति में तेजी देखी जा सकती है। वह स्थिति और भी बुरी होती है।

कोविड के आगमन से पहले अमेरिकी फेडरल रिजर्व, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और कई पश्चिमी देशों के केंद्रीय बैंक अपने-अपने क्षेत्रों में मुद्रास्फीति बढ़ाने पर जोर दे रहे थे ताकि अपस्फीति से बचा जा सके। अब वे मुद्रास्फीति को थामने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी ओर भारत में सभी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने को लेकर चिंतित रहे। अतीत के अनुभव के हिसाब से यह उचित ही था। एक उचित मुद्रास्फीति दर का अनुमान लगाना किसी भी देश के लिए आसान नहीं है।

घरेलू परिदृश्य पर वापस लौटें तो आरबीआई अधिनियम की धारा 45 जेडबी (1) में कहा गया है, ‘केंद्र सरकार को, आरबीआई के साथ मशविरा करके हर पांच वर्ष में एक बार खुदरा महंगाई के संदर्भ में मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करना चाहिए।’ इस प्रावधान के संदर्भ में केंद्र सरकार ने 2016-21 के दौरान मुद्रास्फीति के लिए 4 +/-2 फीसदी का लक्ष्य तय किया था। बाद में 2021 में 2021-26 के लिए इसी लक्ष्य को बरकरार रखा गया। ध्यान रहे लक्ष्य 4 फीसदी का है जिसमें 2 फीसदी ऊपर नीचे की गुंजाइश रखी गयी है।

यह मानना उचित होगा कि सरकार ने आरबीआई के साथ मशविरा करके मुद्रास्फीति का जो लक्ष्य तय किया है वह देश की आर्थिक वृद्धि की दृष्टि से एकदम उचित है। माना जा सकता है कि 2 फीसदी धनात्मक या ऋणात्मक का दायरा तय करने के पहले भी भलीभांति विचार किया गया होगा। इस संदर्भ में कई संभावित वैकल्पिक उपाय हो सकते हैं। उदाहरण के लिए लक्ष्य 4 प्रतिशत या 5+/-1 भी हो सकता है। या ऐसा कोई और तरीका भी हो सकता है।

जैसा कि प्रस्तावना में उल्लिखित है वृद्धि से जुड़ा लचीलापन, मुद्रास्फीति के लक्ष्य के लिए निर्धारित लचीलेपन से अधिक राहत नहीं मुहैया करा सकता। रिजर्व बैंक वृद्धि की दलील का इस्तेमाल मुद्रास्फीति दर के 6 फीसदी से अधिक होने को उचित ठहराने में नहीं कर सकता। आरबीआई को अधिनियम के तहत मुद्रास्फीति की ऐसी दर तय करनी चाहिए जो वृद्धि को स्थायी बनाए रखने की दृष्टि से उपयुक्त हो।

बैंक जमा से वास्तविक संदर्भों में प्रतिफल बीते ढाई साल से नकारात्मक रहे हैं। मई 2022 तक बीते 26 महीनों में खुदरा महंगाई 15 महीनों में छह फीसदी या उससे अधिक रही है। एक दलील यह भी थी कि मुद्रास्फीति अस्थायी है।

बहराहल, सच तो यह है कि किसी को पता नहीं था कि यह अस्थायी अवधि कितनी लंबी चलेगी। इससे राहत दिलाने की कोई सांविधिक व्यवस्था भी नहीं है। अगर कुछ और लचीलापन मुहैया कराना था तो सरकार 2021 के लक्ष्य को संशोधित करते समय भी ऐसा कर सकती थी और जरूरत पड़ने पर अधिनियम को संशोधित कर सकती थी।

एक अन्य दलील यह रही है कि यह मुद्रास्फीति मोटे तौर पर आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं की वजह से और मौद्रिक नीति के कारण है जो मांग के प्रबंधन पर केंद्रित है। यह दलील एक हद तक सही हो सकती है लेकिन सरकार को आपूर्ति क्षेत्र की दिक्कतें दूर करने के लिए उचित कदम भी उठाने चाहिए लेकिन अगर आरबीआई को भी मुद्रास्फीति को तय दायरे में रखना है तो उसे भी उसी हिसाब से कदम उठाने होंगे।

कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि आरबीआई के अन्य काम मसलन सरकार के कर्ज का प्रबंधन और समुचित विनिमय दर का रखरखाव आदि ब्याज दरों को लेकर समय पर कदम उठाने की राह में आड़े आते हैं। आरबीआई का ऐसा कोई सांविधिक दायित्व नहीं है कि वह सरकार की ऋण लागत को कम रखे या विनिमय दर को एक खास स्तर पर बरकरार रखे। आरबीआई अधिनियम की धारा 45जेड (चैप्टर आईआईआईएफ के तहत) में कहा गया है, ‘इस चैप्टर के प्रावधानों को प्रभावी होना चाहिए यद्यपि वे इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के साथ अनिरंतर हों।’

फिलहाल मौद्रिक नीति समिति केवल रीपो दर तय करती है। क्या केवल रीपो दर तय करने से मुद्रास्फीति के लक्ष्य का अधिदेश हासिल हो जाएगा? इसका जवाब जाहिर तौर पर ‘ना’ है। एमपीसी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह व्यवस्था में नकदी के वांछित स्तर से जुड़े निर्णय ले सके और रिवर्स रीपो दर तय कर सके।

आरबीआई अधिनियम में 2016 में मौद्रिक नीति निर्धारण के लिए बाहरी सदस्यों वाली समिति की व्यवस्था करने का कारण यह था कि इस अहम मसले पर थोड़ा व्यापक विमर्श हो सके और केवल आरबीआई की आंतरिक अफसरशाही ही इसके निर्णय न ले। अब समय आ गया है कि यह समीक्षा की जाए कि क्या यह प्रणाली कारगर रही है?

(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और सेबी के पूर्व चेयरमैन हैं)

Keyword: वृद्धि, मुद्रास्फीति, भारतीय रिजर्व बैंक, राष्ट्रीय आय, मंदी, फेडरल रिजर्व, विनिमय दर,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 बिजली वितरण में बदलाव से उपभोक्ताओं को होगा फायदा
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.