बिजनेस स्टैंडर्ड - अमेरिका यात्रा से निकले कुछ तथ्य
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अमेरिका यात्रा से निकले कुछ तथ्य

आकाश प्रकाश /  June 17, 2022

हाल ही में मुझे अमेरिका में कुछ सप्ताह बिताने का मौका मिला। हालांकि यह एक पारिवारिक यात्रा थी लेकिन मुझे वहां के बाजार कारोबारियों के कुछ हिस्सों से चर्चा का मौका मिला। इनमें परिसपंत्ति आवंटक, हेज फंड, दीर्घावधि वाले निवेशक तथा दीर्घावधि वाले संस्थागत पूंजी प्रदाता शामिल थे। हर बैठक की अपनी विशेषता थी, लेकिन दो तीन बातें लगभग हर बातचीत में सामने आयीं।

पहली बात, सभी समझदार निवेशक बेहद सतर्क थे। हर किसी का विचार था कि बाजार की मौजूदा स्थिरता और तेजी अस्थायी थी। सबका यही कहनाथा कि सभी अहम वर्षों में मंदी के बीच बाजार में 30-40 फीसदी तक की तेजी देखी गयी है। उन्हें यह बाजार में सामान्य सुधार नहीं लगता कि 20 फीसदी की गिरावट के बाद बाजार स्थिर हो जाएग और दोबारा तेजी की राह पकड़ लेगा। अधिकांश लोगों ने माना कि मुद्रास्फीति वास्तव में नियंत्रण से बाहर थी और फेडरल रिजर्व की सख्ती अनुमान से अधिक तीव्र होगी। इतना ही नहीं दरों में इजाफे के साथ अपनायी जा रही सख्ती के असर के बारे में भी सही अनुमान नहीं था। फेड भी एक धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था में सख्ती करने पर विवश होगा और विश्वसनीयता बहाल करने की उसकी कोशिशें मंदी की आशंका पैदा करेंगी।

अधिकांश लोगों को यह भी लगा कि हमने अभी गिरावट का पहला दौर ही देखा है। हमें अभी अगला दौर देखना है जहां आय के अनुमानों में गिरावट आएगी और आखिरकार विभिन्न कारक एक बार फिर काम करेंगे तथा बाजार विभिन्न चरों के साथ न्यूनतम स्तर पर पहुंचेगा। कई लोगों को लग रहा था कि अमेरिका 2023 में मंदी की ओर जा सकता है। स्पष्ट है कि आय के अनुमान मंदी के लिहाज से समायोजित नहीं हैं। मुद्रास्फीति तथा अन्य सख्त श्रम बाजारों को लेकर हम जिस स्थिति में हैं वहां अमेरिका का कारोबारी मुनाफा बहुत अधिक है। इस गिरावट के कारण भी नीचे की ओर रुझान का अगला दौर सामने आएगा। हमने उच्च वृद्धि, बिना मुनाफे वाले टेक शेयरों में अफरातफरी देखी लेकिन अंतत: इन बड़ी कंपनियों में भी गिरावट आयेगी और फिर ब्ल्यूचिप कंपनियों का क्रम आयेगा।

कुलमिलाकर  इसे उदासीन परिदृश्य कहा जा सकता है। क्या संभव है कि यह कीमतों में पहले ही नजर आने लगा हो? क्या हम इस नजरिये को विरोधाभासी संकेतक मान सकते हैं और ज्यादा तेजी की आशा कर सकते हैं? मुझे नहीं लगता क्योंकि मेरा मानना है कि सर्वसम्मति में उतना भी मंदी का माहौल नहीं है। अभी भी काफी उम्मीद और विश्वास बाकी है जिसके अनुसार यह एक बुरा सपना हो सकता है। हालात जल्दी ही बदल जाएंगे। इसके अलावा मैंने जिन लोगों से बात की वे बहुत सुलझे हुए निवेशक हैं। उन्होंने कारोबार के विभिन्न चक्र देखे हैं।

दूसरा स्पष्ट निष्कर्ष था था अंतिम चरणों में होने वाला निवेश। यह वह निजी निवेश है जो कंपनी के सार्वजनिक प्रारंभिक पेशकश यानी आईपीओ के लिए जाने के ऐन पहले किया जाता है। क्रॉसओवर फंड या हेज फंड गहरे कष्ट में हैं और अंतिम चरण के खेल में वे अहम खिलाड़ी थे। इनमें से कई फंडने अपनी परिसंपत्ति का 20-25 प्रतिशत हिस्सा अंतिम चरण के निवेश में डाला। ये फंड अब छुटकारा चाहते हैं इसलिए उन्हें अपनी बिक्री बढ़ानी होगी जिससे निजी शेयरों का वजन बढ़ेगा।

अचानक इनमें से कई फंड्स के पास अपनी परिसंपत्तियों का अधिकांश हिस्सा निजी शेयरों में होगा। निजी शेयरों के प्रति जोखिम कम करना होगा। द्वितीयक लेनदेन की लहर और इन फंडों से निजी निवेश में सीमित चरणबद्ध वृद्धि की अपेक्षा कीजिए। अंतिम चरण वाले निवेश में सबसे अधिक कष्ट महसूस होगा। यहां अगर गिरावट आयी तो आईपीओ बाजार पर दबाव बनेगा। केवल बेहतरीन टेक स्टार्ट अप ही आईपीओ ला पाएंगे और वे भी ऐसा मौजूदा से कम दर पर ही कर पाएंगे।

कई अन्य फंस जाएंगे और वे न तो आईपीओ के माध्यम से धन जुटा पाएंगे और न ही अपने अंतिम मूल्यांकन पर नये दौर की फंडिंग ला पाएंगे। इस बीच ऐसी स्थितियां भी उत्पन्न होंगी जहां फंड नीचे आने को तैयार नहीं होंगे और कंपनियों को धन की आवश्यकता होगी। प्राथमिकता वोल प्रतिफल ढांचे भी ध्यान के केंद्र में आ जाएंगे। अंतिम चरण में निवेश वाला कंपनियों को मुनाफे की ओर बढ़ना होगा। हकीकत यह है कि सभी कारोबारी मॉडल ऐसे बदलाव को नहीं अपना पाएंगे। कई संस्थापकों को कभी मुनाफे या नकदी प्रवाह की चिंता नहीं करनी पड़ी। उन्होंने वृद्धि पर ही ध्यान दिया। वह माहौल अब जा चुका है। शुरुआती दौर की वेंचर कैपिटल फंडिंग में ज्यादा समर्पित पूंजी है और निवेशक आज भी इसे लेकर अधिक इच्छुक हैं। यहां भी मूल्यांकन में कमी देखने को मिलेगी लेकिन फंडिंग भी आएगी।

तीसरा निष्कर्ष भारत से संबंधित था। मैंने बीते कई वर्षों में भारत के लंबी अवधि के परिदृश्य को लेकर निवेशकों को इतना आशावादी नहीं पाया है। भूराजनैतिक हालात, अनिश्चित नीति निर्माण और शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण चीन को लेकर रुझान ठंडा पड़ा है। चीन में गत 18 महीनों की नीतियों और घटनाओं ने एक किस्म की अनिश्चतता और जोखिम का माहौल बना दिया है। मेरे लिए इसका अर्थ यह था कि अगले कुछ वर्षों के दौरान चीन को होने वाला आवंटन कम होगा। इसमें नाटकीय कमी भले नहीं आए लेकिन कई देशों के लिए चीन अपना उच्चतम स्तर छू चुका है। भारत के लिए रुझान सकारात्मक है। लंबी अवधि का पूर्वानुमान तथा उभरते बाजार के परिदृश्य दोनों में भारत के लिए बेहतर स्थितियां हैं। यदि चीन को थामना है तो यह आशा कीजिए कि कोरिया उभरते बाजार क्षेत्र से बाहर हो जाएगा, रूस के समाप्त होने और ब्राजील की राजनीति की भी चिंता कीजिए। ताईवान की भूराजनैतिक स्थिति पर भी नजर रखनी होगी। इन बातों के बीच विकल्प बहुत सीमित हैं। इस पूरे परिदृश्य से भारत को अवश्य लाभ होने वाला है।

मेरा मानना है कि अगर निवेशकों के पास भारत में एक डॉलर था तो चीन में उनके पास 5.5 से 6 डॉलर होते। आने वाले वर्षों में यह एक शायद 1.5 में बदल जाए जबकि चीन 5 पर स्थिर रहेगा। हालांकि यह स्थिति कई वर्षों में बनेगी।

भारत को अभी भी महंगा माना जा रहा है इसलिए पूंजी की आवक में समय लगेगा और अधिकांश निवेश बेहतर प्रवेश बिंदु की प्रतीक्षा करेंगे। अल्पावधि में विदेशी बिकवाली जारी रहेगी।

अमेरिका की यह यात्रा दिलचस्प रही। आने वाले कुछ महीने कठिन और अस्थिरता से भरे रहेंगे। अब वक्त आ गया है कि हम अपना पोर्टफोलियो बनाएं और बेहतरीन कारोबारों और कारोबारी विचारों पर ध्यान केंद्रित करें ताकि इस मंदी के बीच अच्छा प्रदर्शन कर सकें।

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