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अपनी मुखरता से निशाने पर रहते हैं ओवैसी

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 11, 2022

मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ पिछले दिनों दिल्ली पुलिस ने एक प्राथमिकी दर्ज की जो उन पर दर्ज कई प्राथमिकियों में नवीनतम है। ओवैसी इसे पुलिस की ओर से किया गया ‘बैलेंसवाद’ करार देते हैं। ओवैसी के साथ 30 अन्य लोगों पर भी प्राथमिकी दर्ज की गयी है जिनमें मुस्लिमों के नरसंहार की अपील करने वाले यति नरसिंहानंद और भारतीय जनता पार्टी की पूर्व महासचिव नूपुर शर्मा भी शामिल हैं। जहां तक ओवैसी की बात है तो उन्हें अब भी यह नहीं पता कि उनके किस ट्वीट के चलते उन पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। परंतु ओवैसी भी कभी भी खुद से ताकतवर सत्ता प्रतिष्ठान को छेड़ने या भड़काने से बाज नहीं आते। वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के कुछ ही दिन बाद उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद ज्ञापन के दौरान एक भावनात्मक भाषण दिया। उन्होंने अपने सात मिनट के भाषण में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से लेकर गोधरा के दंगों तक, इशरत जहां की हत्या से लेकर मोहसिन सादिक की हत्या तक (पुणे का टेक्नॉलजी क्षेत्र में काम करने वाला युवा जिसे 2014 में हिंदू राष्ट्र सेना के एक सदस्य ने मार डाला था)। जब ओवैसी ने कहा, ‘मैं आपके सामने एहसान जाफरी के बेटे के रूप में खड़ा हूं। मैं आपके सामने इशरत जहां के भाई के रूप में खड़ा हूं। मैं आपके सामने सादिक के अंकल के रूप में खड़ा हूं’ तो भाजपा के सांसदों ने शर्म करो के नारे लगाए।

ओवैसी ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी भारतीय संविधान में विश्वास और आस्था अक्षुण्ण है। उन्हें अच्छे और बुरे दिनों का सामना करना पड़ता है। हाल ही में उन्होंने एक साक्षात्कारकर्ता को बताया कि बुरे दिनों में वह भारतीय संविधान पढ़ते हैं इससे उन्हें अच्छा महसूस होता है। जबकि वह भारतीय संविधान को कई बार पढ़ चुके हैं।

वह कांग्रेस का विरोध इसलिए करते हैं कि कांग्रेस ने उन्हें केवल एक धार्मिक समूह और वोट बैंक समझकर उन्हें निराश किया। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि मुस्लिमों की हज सब्सिडी समाप्त कर दी गई है लेकिन अगर इस सब्सिडी के पैसे को मुस्लिम बच्चियों की शिक्षा की छात्रवृत्ति में इस्तेमाल किया जाता तो उन्हें अच्छा लगता। यही वजह है कि वह मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को महत्त्वपूर्ण मानते हैं ताकि समुदाय अपनी आवाज उठा सके।

एमआईएम ने हाल ही में दो विधानसभा चुनाव गंभीरता से लड़े। महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनावों में कुछ जगहों पर उसका मत प्रतिशत नाटकीय रूप से बढ़ा। उदाहरण के लिए धुले शहर और मालेगांव सेंट्रल में एमआईएम का मत प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना में 20 प्रतिशत बढ़ा। मालेगांव सेंट्रल में 2014 में पार्टी को 12.5 प्रतिशत मत मिले थे जो 2019 में बढ़कर 58 प्रतिशत से अधिक हो गए। इसी प्रकार धुले शहर में 2014 में पार्टी अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी थी लेकिन 2019 में उसे 28 प्रतिशत वोट मिले और वह जीतने में कामयाब रही।

बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी अपना प्रदर्शन दोहराने में कामयाब रही। अमौर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी का मत प्रतिशत 2015 के 1.1 से बढ़कर 2020 में 51.1 प्रतिशत हो गया। कोचाधामन सीट पर पार्टी का मत प्रतिशत 26.1 प्रतिशत से बढ़कर 49.25 प्रतिशत, किशनगंज में 9.6 प्रतिशत से बढ़कर 23.4 प्रतिशत और बैसी में 10.3 प्रतिशत से बढ़कर 38.2 प्रतिशत हो गया।

हालांकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव तथा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन कमजोर रहा। उत्तर प्रदेश में उसे कुल मतों का 0.5 प्रतिशत मिला और कई सीटों पर उसने भाजपा की जीत सुनिश्चित की। लेकिन इन बातों से ओवैसी की संघर्ष करने की इच्छा कमजोर नहीं पड़ी। उन्हें अकेले लड़ना पसंद है। एमआईएम ने असम चुनावों से दूरी बनाए रखी। वहां उसके पास विकल्प था कि वह या तो बदरुद्दीन अजमल के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ गठबंधन करे या उसके खिलाफ चुनाव लड़े। इसी प्रकार पार्टी कहती है कि वह केरल में चुनाव नहीं लड़ेगी क्योंकि वहां इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग पहले से चुनाव लड़ रही है। केवल तेलंगाना में पार्टी ने तेलंगाना राष्ट्र समिति का समर्थन चाहा है। हिंदुत्ववादी नेताओं के साथ उनकी लड़ाई उन्हें अपने मतदाताओं के बीच और अधिक लोकप्रियता प्रदान करती है। उदाहरण के लिए 2016 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के उस वक्तव्य को चुनौती दी जिसमें उन्होंने कहा था कि जिन लोगों को ‘भारत माता की जय’ कहने में शर्म आती है उन्हें भारत में नहीं रहना चाहिए। ओवैसी ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से इस नारे से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन वह इसे इसलिए नहीं गाएंगे क्योंकि उन्हें बार-बार अपनी देशभक्ति साबित नहीं करनी है। वह कहते हैं कि पूरे भारत से केवल मुठ्ठीभर मुस्लिम ही कश्मीर में ‘जिहाद’ के लिए गए। इस्लामिक स्टेट से जुड़ने वाले युवाओं में ज्यादातर वही हैं जो विदेशों में रहते थे या वहां पढ़ाई करते थे। भारतीय मुस्लिमों में गिनेचुने ही अल कायदा के सदस्य हैं। इसके बावजूद भारत में एक मुसलमान के लिए कुछ चीजें अनिवार्य हैं: उसे केवल तभी भारतीय माना जाएगा जब वह पाकिस्तान की आलोचना करेगा (इसमें क्रिकेट मैच के दौरान भारतीय टीम की हौसला आफजाई आवश्यक है), इस्लामिक नेतृत्व पर हमलावर होगा और धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करेगा। ओवैसी मानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता के लिए हर व्यक्ति को लड़ना चाहिए, न कि केवल मुस्लिमों को। उनकी यह स्पष्टता और मुखरता उन्हें एक निशाने पर रखती है।

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