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मीठी कुकीज के डरावना बनने की रोचक कहानी

अजित बालकृष्णन /  June 08, 2022

आज भी जब मैं किसी नयी वेबसाइट पर पहली बार पहुंचता हूं और वहां अचानक एक पॉप अप उभरता है और मानो मेरे चेहरे पर चीखता हुआ सा कहता है,’आप हमारी कुकीज को स्वीकार करने के लिए हां का बटन दबाएं’,तब मुझे अपनी मां की याद आ जाती है जिनका बहुत पहले निधन हो चुका है। मां की याद और उनकी कही बातें याद आने का नतीजा यह होता है कि मैं तत्काल ही ब्राउजर को बंद कर देता हूं।

‘कुकीज’ आमतौर पर छोटा सा खाने वाला बिस्किट जैसा होता है लेकिन वह अचानक इंटरनेट की दुनिया का इतना अहम तत्त्व कैसे बन गया। यह इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसे विभिन्न विधानों और कानून निर्माण में शामिल किया गया है तथा यह ‘निजता’ की हिमायत करने वालों तथा वेबसाइट के राजस्व में इजाफे पर जोर देने वालों के बीच तनाव पैदा करने की वजह बन गया है।

थोड़ा सा शोध करने पर हमें पता चलता है कि वास्तव में खाने वाली कुकीज का जन्म सातवीं सदी में पर्शिया में हुआ था और यह यूरोप में तब पहुंचा जब ऑटोमन साम्राज्य का विस्तार यूरोप तक हुआ। मेरा मानना है कि 14वीं सदी तक इसे आम लोगों के साथ-साथ शाही परिवारों तक में जबरदस्त लोकप्रियता मिल चुकी थी।

यह मीठा लगने वाला स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ इंटरनेट की दुनिया में इतनी रहस्यमय चीज कैसे बन गया? इसके लिए हमें सामान्य नजर आने वाली साधारण कुकीज से परे जाकर फॉर्चून कुकीज पर नजर डालनी होगी। फार्चून कुकीज भी पर्शिया से निकली प्राचीन कुकीज की तरह ही मीठी लगती और वैसी ही दिखती थी लेकिन दोनों में एक अंतर था: इन कुकीज को तोड़ने पर इनके भीतर से एक संदेश निकलता था जिसमें कुछ इस तरह के संदेश लिखे होते थे, ‘आपकी मुस्कान वह पासपोर्ट है जो आपको दूसरों के दिलों तक पहुंचाती है’ या ‘अगर आपके जीवन में कुछ भी अच्छा है तो उसे अपने आप से दूर मत जाने दीजिए।’

मैं समझता हूं कि फॉर्चून कुकीज की शुरुआत कैलिफोर्निया में 19वीं सदी में हुई थी और उसे लोकप्रिय बनाने में चीनी और जापानी प्रवासियों की अहम भूमिका रही। मैं इस बात को भी समझता हूं कि जब भी वहां लोग चीनी खाने पीने की चीज खरीदते तो एक फॉर्चून कुकी की बाट अवश्य जोहते। विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज भी न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन स्थित वॉन्टन फूड इंक के रूप में इकलौती विनिर्माता द्वारा रोजाना 45 लाख फॉर्चून कुकीज बनायी जाती हैं। हम देख सकते हैं कि कुकीज के केवल एक मीठा पकवान होने की जगह अवधारणा ऐसी बन चुकी है कि यह एक लुभावना मीठा पकवान है जो एक गुप्त संदेश के साथ पाठकों के सामने आता है।

सवाल यह उठता है कि मामूली नजर आने वाली कुकी ने कंप्यूटर विज्ञान जैसे अपेक्षाकृत जटिल क्षेत्र में अपनी अलग पहचान कैसे कायम की। दरअसल इसके पीछे अमेरिकी कंप्यूटर प्रोग्रामर लोउ मोंटुली का हाथ है जिन्होंने सन 1992 में कंसास विश्वविद्यालय में रहते हुए और बाद में नेटस्केप में रहने के दौरान पहला वेब ब्राउजर तैयार किया था। उन्होंने पाया कि यूजर के आंकड़ों को उसके वेब ब्राउजर में रहने देना ज्यादा बेहतर है, बजाय कि उसे भंडारित करने के। उदाहरण के लिए आंकड़ों को ऐसी ई-कॉमर्स वेबसाइट पर ही भंडारित किया जा सकता है जहां उक्त व्यक्ति खरीदारी करता हो। उन्होंने इसे ‘मैजिक कुकीज’ का नाम दिया।

वेब कुकीज जैसी मासूम सी चीज आगे चलकर ‘निजता’ को लेकर छिड़े विवाद का मूल बन गई।

इसे लेकर विवाद और लोगों की नाराजगी उस समय पैदा हुई जब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि उनके वेब ब्राउजर पर मामूली जानकारी के साथ दर्ज कुकीज से यह पता लगाया जा सकता है कि उन्होंने किस-किस वेबसाइट का इस्तेमाल किया, किन वेबसाइटों पर वे आये दिन जाते हैं। कुछ मामलों में तो इन कुकीज की सहायता से लोगों द्वारा उन ई-कॉमर्स वेबसाइट पर खरीदारी के लिए इस्तेमाल किए गए क्रेडिट कार्ड की विस्तृत जानकारी भी हासिल की जा सकती थी।

यह सूचना सामने आते ही सबसे पहली नाराजगी यूरोप से सामने आई। किसी ने तो यहां तक कह दिया कि डेटा को इस प्रकार संरक्षित किया जाना सन 1930 के दशक के नाजी जर्मनी की व्यवस्थाओं की यादें ताजा कराने वाली घटना है। उस दौर में जर्मनी में घर-घर जाकर जनगणना की गई थी ताकि यहूदियों को चिह्नित करके अलग किया जा सके और उन्हें यातना शिविरों के हवाले किया जा सके।

इन चर्चाओं के जोर पकड़ने और इन पर बहस होने के बाद जल्दी ही एक नये कानून का गठन किया गया। यूरोपियन जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन (जीडीपीआर) नामक यह कानून मई 2018 में लागू किया गया। जीडीपीआर कानून के अनुसार सभी कंपनियों को फिर चाहे वे यूरोप की हों या दुनिया के किसी भी अन्य देश की, उन्हें वेब कुकीज के माध्यम से उपयोगकर्ता की जानकारी एकत्रित करने के पहले उसकी अनुमति लेनी होगी। यह कानून उन वेबसाइटों पर जुर्माने की भी व्यवस्था करता है जो उपयोगकर्ता की इजाजत लिए बिना उसकी सूचनाएं एकत्रित करती हैं। यही वजह है कि अक्सर किसी वेबसाइट का इस्तेमाल करते हुए आप देखते हैं कि आपके ब्राउजर पर कुकीज एकत्रित करने के लिए आपकी अनुमति मांगी जाती है।

जीडीपीआर के अधीन लगाए गये जुर्माने की राशि आपको चौंका सकती है। इस कानून के तहत एमेजॉन पर 82.3 करोड़ डॉलर, व्हाट्सऐप पर 24.9 करोड़ डॉलर और वोडाफोन पर 90 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया जा चुका है। ये बस चंद नाम हैं, हालांकि इन कंपनियों ने इन मामलों में अदालतों का रुख भी किया है।

राष्ट्रपति जो बाइडन के अधीन अमेरिका भी डेटा को गोपनीय रखने वाले कानून बनाने पर विचार कर रहा है। यह कानून भी यूरोप में बनाये गए कानून के तर्ज पर ही लागू किया जाएगा।

क्या यह बात बहुत दिलचस्प नहीं है कि हमारी छोटी सी मीठी कुकीज ने समय के साथ इतना बड़ा बदलाव देखा और वह बचपन के प्यार और आकर्षण से एक ऐसी चीज में बदल गई है जिससे लोगों को भय लगता है।

या फिर शायद मेरी मां का कहना ही सही था कि हमें हर ऐसे व्यक्ति से सावधान रहना चाहिए जो हमें मीठी कुकीज देने की पेशकश करता है।

(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं)

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