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उपभोक्ताओं की धारणा में असामान्य गिरावट

श्रम रोजगार
महेश व्यास /  June 04, 2022

विगत 29 मई को समाप्त हुए सप्ताह में तेजी का सिलसिला थम गया और उपभोक्ता धारणा सूचकांक (आईसीएस) 9.4 प्रतिशत फिसल गया। यह एक असामान्य गिरावट थी। शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ताओं की धारणा कमजोर हुई मगर इनमें गिरावट की मार अलग-अलग थी।

शहरी क्षेत्र में सूचकांक 5.9 प्रतिशत कमजोर रहा जबकि  ग्रामीण क्षेत्रों में इसमें काफी अधिक यानी 11.4 प्रतिशत की कमी आई। 29 मई तक 30 दिनों का मूविंग एवरेज कम होकर 67.91 रह गया। एक दिन पहले ही यह 68.09 था।

अप्रैल 2022 में आईसीएस 67.2 पर बंद हुआ था। 29 मई तक यह एक प्रतिशत अधिक था। मई में सूचकांक अप्रैल की तुलना में ऊंचे स्तर पर रह सकता है। अगर ऐसा हुआ तो मार्च 2020 (लॉकडाउन से पहले) के बाद किसी भी महीने की तुलना में यह अधिक होगा। हालांकि ऐसे संकेत हैं कि 2020 में उपभोक्ता सूचकांक में हो रहा सुधार थम सकता है या इसमें गिरावट आनी शुरू हो सकती है।

उपभोक्ता धारणा सूचकांक के स्थायी आंकड़े 1 जून को उपलब्ध होंगे। मगर 30 दिनों के मूविंग एवरेज पर विचार कर इतना तो माना जा सकता है कि अप्रैल में सूचकांक थोड़ा ऊंचे स्तर पर रहेगा। मगर मई में मामूली तेजी का यह भी मतलब निकाला सकता है कि  सूचकांक की मासिक वृद्धि दर सुस्त पड़ रही है। पिछले चार महीनों-जनवरी से अप्रैल- के दौरान सूचकांक की हरेक महीने वृद्धि दर 3 से 5 प्रतिशत के बीच रही है। आर्थिक संकेतकों की तुलना में अप्रैल 2020 में लॉकडाउन की वजह से उपभोक्ता सूचकांक में गिरावट के बाद सुधार की रफ्तार कम रही है। अधिकांश आर्थिक संकेतक लॉकडाउन पूर्व के स्तर तक पहुंच चुके हैं। उदाहरण के लिए वर्ष  2019-20 की तुलना में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और सकल मूल्य वर्द्धन (जीवीए) 2020-21 में क्रमश: 2 और 3 प्रतिश्त ऊंचे स्तर पर थे। इसी तरह केंद्र सरकार का कुल कर संग्रह 2021-22 में 2019-20 की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक था। मगर अप्रैल 2022 में सूचकांक फरवरी 2020 की तुलना में 36 प्रतिशत कम रहा। इसकी वजह यह हो सकती है कि वर्तमान एवं भविष्य को लेकर लोगों की धारणा को बतलाने वाला सूचकांक गहरे आर्थिक झटके से उबरने में अधिक समय लेता है।

भारत में उपभोक्ता धारणा में सुधार की राह में तीन समस्याएं हैं। पहली बात यह कि आर्थिक संकेतकों की तुलना में उपभोक्ता धारणाओं में अपेक्षाकृत कम सुधार हो रहा है और हाल के महीनों में इसमें और गिरावट आई है। जनवरी में सूचकांक में 4 प्रतिशत तेजी आई और फरवरी में यह बढ़कर 5 प्रतिशत हो गई। मगर मार्च में यह रफ्तार कम होकर 3.7 प्रतिशत रह गई और अप्रैल में इससे भी कम 3 प्रतिशत हो गई। अब मई में इसमें और गिरावट आने का अंदेशा है और यह 1 प्रतिशत से भी कम तक फिसल सकता है। दूसरी बात यह है कि  उपभोक्ता धारणा में सुधार की रफ्तार सुस्त पड़ने के बाद अब इसमें गिरावट आने की आशंका बढ़ गई है। यह आईसीएस के 30 दिनों (डीएमए) के मूविंग एवरेज से साफ लग रहा है। 22 अप्रैल को जब सूचकांक 64.01 था तो 30 दिनों का मूविंग एवरेज धीरे-धीरे बढ़ रहा था। 30 अप्रैल तक यह संभल कर 67.02 तक पहुंच गया। इसके बाद यह 20 मई को बढ़कर 70.04 तक पहुंच गया। इस स्तर पर अप्रैल की तुलना में यह 4.2 प्रतिशत अधिक था। मगर इसके बाद गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया। 29 मई तक 30-डीएमए आईसीएस फिसल कर 67.91 तक पहुंच गया जो अप्रैल अंत में दर्ज स्तर से महज 1 प्रतिशत ही अधिक था। साप्ताहिक आईसीए आंकड़ों में भी गिराट दिख रही है। साप्ताहिक सूचकांक मई के अंतिम दो दिनों में 11 प्रतिशत से अधिक फिसल गया।

तीसरी और संभवत: सबसे दुखद बात यह रही कि हाल में दिख रही गिरावट की रफ्तार तेज हो गई है। 20 मई और 29 मई के बीच 30-डीएमए में प्रति दिन  0.34 प्रतिशत दर से गिरावट आई। इसकी तुलना में 30 अप्रैल और 20 मई के बीच इसमें तेजी की चाल प्रति दिन महज 0.22 प्रतिशत थी। 30-डीएमए तुलनात्मक रूप साप्ताहिक सीरीज से कम अनिश्चितता वाली सीरीज है। इस लिहाज से 20 मई तेज गिरावट चिंता का विषय है।

उपभोक्ता धारणा सूचकांक की चाल बदल रही है क्योंकि उपभोक्ताओं की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही हैं। उपभोक्ताओं की अपनी मौजूदा स्थिति को लेकर जो धारणा है उसकी तुलना में उनकी अपेक्षाएं तेजी से कमजोर पड़ रही हैं। भविष्य को लेकर उपभोक्ताओं की उम्मीदें कमजोर पड़ रही हैं और स्थिति तेजी से बदतर होती जा रही है। दिसंबर 2021 से अप्रैल 2022 के बीच उपभोक्ता धारणा सूचकांक में 3.9 प्रतिशत तेजी आई थी जबकि  उपभोक्ता अपेक्षा सूचकांक (आईसीई) वर्तमान  आर्थिक परिस्थतियां (आईसीसी) में 5.5 प्रतिशत तेजी की तुलना में 2.9 प्रतिशत दर से ही आगे बढ़ा।

एक दूसरी अहम बात यह है कि  उपभोक्ताओं की अपेक्षाओं में गिरावट आईसीई के मामले में आईसीसी की तुलना में अधिक है। 30 अप्रैल से 20 मई के दौरान तेजी के दौर में आईसीई में 4.8 प्रतिशत तेजी आई जबकि आईसीसी 4 प्रतिशत दर से ही बढ़ा था। मगर 20 मई से 29 मई के बीच गिरावट के दौरान आईसीई 2.9 प्रतिशत फिसला जबकि आईसीसी में इससे कम 2.5 प्रतिशत कमी आई थी।

फिलहाल हमें यह मालूम नहीं है कि  हाल के समय में धारणा मोटे तौर पर और खास कर अपेक्षा में किस वजह से कमी आई है। ग्रामीण क्षेत्रों में हालात अधिक बिगड़े हैं और ऐसा हो सकता है कि गेहूं और चीनी निर्यात पर प्रतिबंध इसकी वजह हो। हम यह मान सकते हैं कि महंगाई नियंत्रित करने के लिए सरकार की तरफ से उठाए गए कदमों से ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं की धारणा पर नकारात्मक असर हुआ है। मगर महंगाई के लगातार ऊंचे स्तर पर रहने से शहरी क्षेत्रों में लोगों के उत्साह पर भी पानी फिर रहा है।

Keyword: उपभोक्ता धारणा, असामान्य गिरावट, रोजगार, आईसीएस, शहरी एवं ग्रामीण,
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