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पाटीदार समुदाय की ताकत पर निर्भर हार्दिक

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 03, 2022

महज 28 वर्ष के हार्दिक पटेल ने जिंदगी में काफी कुछ कर लिया है। उन्होंने गुजरात में एक आंदोलन चलाया, राजनीतिक दल बदले और विडंबना यह है कि वह उसी दल में चले गए हैं जिसके खिलाफ उन्होंने आंदोलन शुरू किया था। गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुछ नेता भले ही उन्हें पार्टी में लेने के फैसले से असहज रहे हों लेकिन उन्होंने सावधानी बरतते हुए इसे प्रदर्शित नहीं किया। हालांकि उत्तर प्रदेश की राज्यपाल और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के समर्थकों को यह पूछने के लिए माफ किया जा सकता है कि उनकी नेता को सत्ता से हटाने में सबसे अधिक योगदान करने वाले व्यक्ति को पार्टी में जगह क्यों दी जानी चाहिए?

एक स्वतंत्र नेता के रूप में हार्दिक पटेल निस्संदेह बहुत जबरदस्त हैं। उन्हें पाटीदारों के आरक्षण के लिए पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) का नेतृत्व करने के लिए सबसे अधिक जाना जाता है। इस आंदोलन ने 2015 और 2016 में गुजरात में भूचाल ला दिया था। गुजरात का पाटीदार समुदाय मोटे तौर पर एक प्रगति कर रहा समाज है और इस समुदाय में बड़ी तादाद में समृद्ध जमींदार हैं। इस समुदाय ने राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाई है लेकिन खेती से हटकर देखा जाए तो उन्हें शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। उनमें से हजारों विदेशों में जा बसे हैं। एक त्रासद घटना तो हाल ही में घटी थी जब गुजरात का एक चार सदस्यीय पटेल परिवार जिसमें तीन साल का बच्चा भी था, कनाडा की सीमा पर बर्फ में जमकर मर गया था। यह परिवार बेहतर जीवन की आस में अमेरिका में प्रवेश करने की कोशिश में था, भले ही वहां जाकर शौचालय ही क्यों न साफ करने पड़ते।

हार्दिक पटेल ने पाटीदार समुदाय की निराशा को महसूस कर लिया था। यह समुदाय राजनीतिक दृष्टि से ताकतवर था और इसे अचानक लगा कि यह शक्तिहीन हो गया है। दरअसल गुजरात में पाटीदारों के दबदबे को सन 1980 के दशक के आरंभ में कांग्रेस नेता माधवसिंह सोलंकी ने चुनौती दी थी जब उनके क्षत्रिय-हरिजन-आदिवासी-मुस्लिम गठजोड़ को 183 सदस्यों वाली विधानसभा में 150 से अधिक सीट पर जीत मिली थी। तब पाटीदारों ने राज्य की राजनीति में अपना कद वापस पाने के लिए भाजपा का इस्तेमाल किया। जब भाजपा सत्ता में आई तो  विभिन्न हिंदू समुदायों को एक छत के नीचे लाकर व्यापक सामुदायिक गठजोड़ तैयार करने का प्रयास शुरू हुआ और मुख्यमंत्री की कुर्सी केशुभाई पटेल को मिली। लेकिन बाद में आनंदीबेन पटेल के कार्यकाल के छोटे से हिस्से को छोड़ दिया जाए तो गुजरात में लगभग दो दशक तक गैर पाटीदार मुख्यमंत्री का शासन रहा।

हार्दिक पटेल का उभार आनंदीबेन के पहले के दौर में हुआ लेकिन उनके मुख्यमंत्री रहते यह चरम पर पहुंचा। हार्दिक पटेल ने कमजोर शिक्षा गुणवत्ता वाले राज्य में पाटीदारों के आरक्षण को केंद्रीय मुद्दा बनाया। आनंदीबेन पटेल जब मुख्यमंत्री थीं तब उन्होंने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा था, ’95 प्रतिशत अंकों के साथ एक पटेल बच्चे को सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलने की संभावना कम है और उसे चिकित्सक बनने के लिए पांच लाख या इससे अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं जबकि एक दलित बच्चा 87 प्रतिशत अंक के साथ भी नि:शुल्क शिक्षा पा सकता है।’ जब उनकी जगह विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया तो हार्दिक पटेल के भीतर की बगावत शांत हो गई, हालांकि उन्होंने कांग्रेस से यह वादा ले लिया था कि वह पाटीदार आरक्षण का समर्थन करेगी।

आरक्षण की भाषा, इसकी कमी और हताशा ध्यान आकृष्ट करने वाली बातें हैं। हार्दिक पटेल ने इन्हें प्रचार के नवोन्मेषी तौर तरीकों के साथ जोड़ दिया। सन 2015 में उन्होंने ‘लॉलीपॉप आंदोलन’ शुरू किया क्योंकि गुजरात सरकार ने उनके आरक्षण आंदोलन को नाकाम करने के लिए एक योजना पेश की थी जिसके तहत सभी जातियों और वर्गों के योग्य छात्रों को लाभ मिलना था। हार्दिक पटेल का कहना था कि यह कुछ और नहीं बल्कि पाटीदारों को लॉलीपॉप देने का प्रयास है।  उन्होंने सचमुच के लॉलीपॉप बांटे। महाराष्ट्र में शिवसेना इतनी प्रभावित हुई कि उसने कहा कि वह हार्दिक पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाये जाने का समर्थन करेगी। तब हार्दिक ने सतर्कता बरतते हुए कहा कि वह केवल 23 वर्ष के हैं और विधानसभा चुनाव लड़ने की अर्हता भी नहीं रखते इसलिए ​शिवसेना को कुछ वर्ष प्रतीक्षा करनी चाहिए।

कांग्रेस ने उनकी क्षमता को पहचान लिया। पटेल ने 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रचार किया लेकिन वह कांग्रेस में 2019 के संसदीय चुनाव के ऐन पहले शामिल हुए। उन्हें प्रदेश कांग्रेस का मुखिया बनाया गया। पार्टी को लगा था कि वह उसकी तकदीर बदलने में कामयाब होंगे। गुजरात कांग्रेस के तीन बड़े नेता शक्तिसिंह गोहिल, अर्जुन मोढवाडिया और सिद्धार्थ पटेल 2017 के चुनाव में हार गए थे। 182 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 77 सीट मिलीं और भाजपा को 99। परंतु कुछ महीने बाद हुए स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया। इन हालात में हार्दिक पटेल से कुछ करिश्मे की उम्मीद की गई।

परंतु राजनीति में ऐसा नहीं होता। सन 2019 में भाजपा ने राज्य की सभी 26 लोकसभा सीट जीत लीं। हार्दिक पटेल कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जरूर बन गए थे लेकिन गत सप्ताह जिस कटुता के साथ वह विदा हुए उससे पता चलता है कि वह पार्टी से कितने हताश थे। गुजरात कांग्रेस के प्रभारी रघु शर्मा और गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष भारतसिंह सोलंकी उनके निशाने पर थे। दिलचस्प यह है कि जब भाजपा में शामिल होने का सवाल आया तो उन्हें दो विकल्प दिए गये: वह नई दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हो सकते थे या गांधीनगर में गुजरात भाजपा प्रभारी भूपेंद्र यादव अथवा संगठन सचिव बीएल संतोष की मौजूदगी में। उन्होंने बाद वाला विकल्प चुना।

समय उनके साथ है और यकीनन एक दिन हार्दिक पटेल गुजरात में शीर्ष तक पहुंचेंगे। परंतु भाजपा केवल भीड़ को भड़काने वालों को पसंद नहीं करती। इसलिए पार्टी में अपना कद बढ़ाने के लिए उन्हें रणनीतिक मस्तिष्क का प्रदर्शन करना होगा। केवल युक्तियों के प्रदर्शन से काम नहीं बनेगा।

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