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कोविड झटकों से उबरने के प्रयास में बॉलीवुड

रणनीतिक कदम
इंद्रजित गुप्ता /  June 01, 2022

गत सप्ताहांत आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ का ट्रेलर जारी हुआ। उनकी यह फिल्म टॉम हैंक्स अभिनीत प्रख्यात फिल्म ‘फॉरेस्ट गम्प’ का हिंदी रीमेक है। उन्होंने मीडिया के साथ इस फिल्म के निर्माण की अंदरूनी कहानी साझा की और उसे बताया कि कैसे जब उन्होंने यह फिल्म अपनी मां को दिखाई तो उन्होंने कहा कि इसे बिना किसी कट के जनता के सामने प्रदर्शित किया जाए।

इस वर्ष 11 अगस्त को जब यह फिल्म रिलीज होगी तो इस पर काफी कुछ निर्भर होगा। हिंदी फिल्म उद्योग महामारी के झटकों से उबरने की कोशिश कर रहा है। ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ और ‘भूल भुलैया 2’ को छोड़ दिया जाए तो सिनेमा देखने वालों ने किसी बड़ी फिल्म को अच्छा समर्थन नहीं दिया है। बॉक्स ऑफिस पर उनका प्रदर्शन ठंडा ही रहा है। शाहरुख खान और सलमान खान जिन्हें हिंदी सिनेमा उद्योग के दो स्तंभ माना जाता है वे भी महामारी के दौरान या उसके बाद कुछ खास नहीं कर सके। महामारी के पहले भी उनकी फिल्में फ्लॉप रही थीं।

यहां तक कि रणवीर सिंह की फिल्म ‘83’ जो कपिल देव के नेतृत्व में भारत की विश्व कप क्रिकेट में जीत पर केंद्रित थी, बॉक्स ऑफिस पर उसका प्रदर्शन भी कुछ खास नहीं रहा।

खास बात यह है कि इस बीच दक्षिण भारत के फिल्म उद्योग की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाना जारी रखा। दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों ‘जटी रत्नालु’, ‘पुष्पा’, ‘केजीएफ चैप्टर 2’, ‘आरआरआर’ और ‘डॉक्टर’ आदि ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया। कुल 31 फिल्में ऐसी रहीं जिन्होंने दुनिया भर में 20 करोड़ रुपये से अधिक की कमायी की।

सच तो यह है कि तेलुगू फिल्म ‘आरआरआर’ जिसमें अजय देवगन और आलिया भट्ट ने भी काम किया था और जिसे हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं में डब किया गया था, वह ब्लॉकबस्टर साबित हुई। उत्तर भारत के दर्शकों को अपने साथ जोड़ने के लिए देवगन और भट्ट को शामिल करके जो दांव खेला गया था वह भी कारगर प्रतीत होता है। बॉलीवुड भी अब दक्षिण भारतीय फिल्मकारों तथा प्रोडक्शन घरानों के साथ सहयोग की होड़ में है। बॉलीवुड को अब दक्षिण की बड़े बैनर की फिल्मों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है और यह बात अपने आप में उसके आंतरिक संकट को बयान करती है।

बॉलीवुड फिल्म उद्योग के चिंतित होने के कई कारण हैं। एक वजह तो यही नजर आती है कि दर्शक अब सिनेमाघर जाने के बजाय फिल्म के एमेजॉन, हॉटस्टार या नेटफ्लिक्स जैसे मंचों पर आने की प्रतीक्षा करने को तैयार हैं।

कुछ हद तक बॉलीवुड ने शायद अपनी मुश्किल के बीज खुद ही बोये हैं। महामारी के दौरान महाराष्ट्र के अधिकांश सिनेमाघर बंद हो गए थे। उन्हें विवश किया गया कि वे लक्ष्मी, शेरशाह और सरदार उधम जैसी फिल्मों को सीधे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को बेचने पर ध्यान केंद्रित करें।

अचानक दर्शकों को अपने घर में ही मनोरंजन के विकल्प मिलने शुरू हो गये। ऐसे में फिल्म रिलीज होने के बाद शुरुआती कुछ सप्ताह तक वे सिनेमाघरों का रुख करना टाला जाने लगा। इसके अलावा कोविड को ध्यान में रखते हुए भी शायद लोगों ने वातानुकूलित सिनेमाघरों में दूसरों के साथ बैठने से परहेज किया।

दूसरी ओर दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग ने फिल्मों को बड़े पैमाने पर थिएटर में रिलीज करने पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। उन्होंने स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को राजस्व का द्वितीयक माध्यम माना। निश्चित रूप से उन्हें इस बात से भी मदद मिली कि महामारी के कारण दक्षिण भारत में सिनेमाघर उस तरह बंद नहीं किए गए जिस तरह बॉलीवुड में बंदी की गई।

सवाल यह है कि क्या उपयोगकर्ताओं के व्यवहार में आया यह बदलाव लंबे समय तक चलने वाला है? यदि ऐसा हुआ तो इसका बॉलीवुड फिल्म उद्योग के ढांचे पर गंभीर असर होगा। आखिरकार, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म शायद बड़े बजट की फिल्मों को संभालने में सक्षम न हों जिनमें बड़े सितारे होते हैं और जिनका भव्य प्रोडक्शन होता है। इस बदलाव को महसूस करते हुए ही अजय देवगन (रुद्र) और सैफ अली खान (सेक्रेड गेम्स तथा तांडव) जैसे अभिनेताओं ने स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के ओरिजिनल शो में काम करना शुरू कर दिया।

यदि फिल्मों का थिएटर में रिलीज होना धीमा रहता है तो फिल्म प्रदर्शन उद्योग पर इसका गहरा असर होगा। इसके अलावा थिएटर में रिलीज होने वाली फिल्में अक्सर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को महंगी पड़ती हैं। यदि 83 की तरह फिल्म थिएटर रिलीज में अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रही तो इससे उद्योग जगत को इससे हासिल होने वाले राजस्व पर असर पड़ सकता है।

प्रोडक्शन घराने भी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के लिए डिजिटल सामग्री बनाने के वास्ते अलग शाखाएं स्थापित करके अपना जोखिम कम कर रहे हैं। करण जौहर की धर्मैटिक, वाईआरएफ, मैडॉक फिल्म्स और एम्मे एंटरटेनमेंट इसकी बानगी हैं।

दूसरी ओर अगर बॉलीवुड अपने जादुई स्पर्श को दोबारा तलाश लेता है और आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’ तथा तीन हिस्सों में बन रही एवं सितारों से सजी काल्पनिक कथा वाली ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसी फिल्में सफल होती हैं तो किस्मत पुन: बदल सकती है।

बहरहाल, फिलहाल एक बात स्पष्ट है कि दर्शक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर ‘मिर्जापुर’, ‘फैमिली मैन’ और ‘पाताल लोक’ जैसी ओरिजिनल सिरीज का भरपूर मजा ले रहे हैं। ‘पंचायत’ और ‘कोटा फैक्टरी’ जैसी वेब सिरीज ने नये अभिनेताओं और सार्थक पटकथाओं को उभरने का मौका दिया है। यदि दर्शकों की मनोरंजन की चाह छोटे परदे पर पूरी होती रहेगी तो क्या वे थिएटर जाना पसंद करेंगे? वे तब तक ऐसा नहीं करेंगे जब तक कि कोई ऐसी फिल्म न बने जिसे हॉल में देखने का मौका वे किसी भी हालत में चूकना न चाहते हों। ‘बाहुबली’, ‘आरआरआर’ और ‘केजीएफ 2’ जैसी फिल्मों की सफलता का यही कारण है। इन फिल्मों में भव्यता है, इनकी कोरियोग्राफी शानदार है और नृत्य तथा कंप्यूटर रचित दृश्यों ने लोगों को काफी आकर्षित किया। ‘आरआरआर’ के बारे में एक और बात ने बॉलीवुड का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है, वह यह कि इस फिल्म ने तमाम सामाजिक वर्गों और भाषाओं की बाधा को तोड़कर सफलता हासिल की।

(लेखक फाउंडिंग फ्यूल के सह-संस्थापक हैं)

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