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राष्ट्रीय दलों को पसंद हों या नहीं समय की हकीकत हैं क्षेत्रीय दल

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  May 31, 2022

राष्ट्रीय दलों के भीतर क्षेत्रीय दलों को खारिज करने का भाव रहता है। उदयपुर में आयोजित चिंतन शिविर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तथा क्षेत्रीय दलों का एकमात्र विकल्प है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय दल जातिवादी हैं और अपनी सीमित पहुंच के चलते वे भाजपा से उस तरह नहीं लड़ सकते जिस तरह कांग्रेस लड़ सकती है। जबकि तथ्य यह है कि 2004 और 2009 में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ के जरिये ही सत्ता में आ पाई। राहुल गांधी ने बाद में अपनी टिप्पणी में संशोधन किया लेकिन नुकसान हो चुका था।

भाजपा क्षेत्रीय दलों पर क्षेत्रीयता के नाते हमला नहीं करती बल्कि उसका आरोप यह है कि ये दल 'परिवार संचालित' हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत सप्ताह हैदराबाद में तेलंगाना राष्ट्र समिति पर ऐसे ही हमले किए। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी पर भी ऐसे ही हमले किए थे। वहीं 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) के साथ भी उन्होंने ऐसा ही किया था। ऐसे अनेक अन्य उदाहरण भी हैं। लेकिन आगामी राष्ट्रपति चुनाव में भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को 11,000 से अधिक वोटों की आवश्यकता होगी जो उसे उन्हीं दलों से मिलेंगे जिन्हें प्रधानमंत्री परिवार संचालित कहते आए हैं।

सन 2013 में कार्नेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस के दक्षिण एशिया कार्यक्रम के निदेशक और वरिष्ठ फेलो मिलन वैष्णव ने एक पर्चा लिखकर क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को लेकर कई मिथक तोड़े थे। मिलन के मुताबिक, 'सन 1996 में पहली बार क्षेत्रीय दलों ने 50 फीसदी से अधिक मत हासिल किए। सन 1999 में इनकी मत हिस्सेदारी घटकर 48 प्रतिशत रह गई लेकिन 2004 में यह दोबारा बढ़कर 51 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2009 में इसमें थोड़ा और इजाफा हो गया।'

वह कहते हैं, 'समकालीन भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के इस उभार को बहुत बढ़ाचढ़ाकर नहीं पेश किया जाना चाहिए। देश के क्षेत्रीय दलों का उभार तो हुआ है लेकिन भविष्य में उनकी मौजूदगी और अधिक प्रभावशाली ढंग से बढ़ेगी या नहीं यह तय नहीं है।'

लेकिन ऐसा भी नहीं होगा कि क्षेत्रीय दल समाप्त ही हो जाएं। सन 2019 के लोकसभा चुनावों में उनकी कुल मत हिस्सेदारी 13.75 प्रतिशत रही। 545 सीटों वाली लोकसभा में उनके 136 सदस्य जीते। इसमें तृणमूल कांग्रेस के सदस्य शामिल नहीं हैं क्योंकि उसे 2016 में ही राष्ट्रीय दल का दर्जा मिल चुका है। ये दल छह राज्यों में अपने दम पर सरकार में हैं। 10 अन्य दलों में किसी राष्ट्रीय दल के सहयोग से सरकार में हैं। ऐसे में उनके अंत की घोषणाएं कुछ ज्यादा ही अतिरंजित हैं।

लेकिन देश में गठबंधन की राजनीति के लिए क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी के क्या अर्थ हैं?

कांग्रेस और भाजपा दोनों दबदबे वाले राजनीतिक दल हैं। उन्हें कई राज्यों में सत्ता में रहने के लिए क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करना पड़ा। मसलन, हरियाणा विधानसभा चुनाव (2019) में भाजपा की सीटों में भारी गिरावट आई और वह चुनाव के बाद दुष्यंत चौटाला के जननायक जनता पार्टी के साथ गठबंधन करके ही सत्ता में आ सकी। इसी तरह 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने द्रमुक के साथ गठबंधन किया और उस प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रही जहां कुछ दशक पहले तक उसका शासन था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अगर पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ती तो यह कहना मुश्किल है कि उसे कितने मत प्रतिशत मिलते। इसके साथ ही शिव सेना और शिरोमणि अकाली दल के राजग से बाहर जाने तथा सपा के कांग्रेसनीत संप्रग गठबंधन से अनकहे ढंग से बाहर जाने से यही संकेत मिलता है कि गठबंधन की राजनीति में भी बदलाव हो रहे हैं।

अमेरिका के फिलाडेल्फिया के टेंपल विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर तथा भारतीय राजनीति पर 'व्हाय रीजनल पार्टीज? क्लाइंटेलिज्म, इलीट्स ऐंड द इंडियन पार्टी सिस्टम' जैसा चर्चित अध्ययन लिखने वाले एडम जिगफील्ड कहते हैं, 'एक ओर गठबंधन की राजनीति में हमेशा कुछ हद तक बदलाव दिखता है। कुछ गठबंधन हमेशा समाप्त होते हैं और नये गठबंधन हमेशा आकार लेते रहते हैं। खासतौर पर भाजपा के उभार ने गठबंधन निर्माण के पुराने तौर तरीकों को झटका दिया है। स्वाभाविक सी बात है कि भाजपा ऐसे राज्य में छोटी साझेदार बनकर नहीं रहना चाहती है जहां उसने हाल के दिनों में अच्छी खासी पकड़ बनायी हो। दूसरी ओर, जब तक भाजपा के पास अपने गढ़ों के बाहर मजबूत जन समर्थन नहीं होगा तब तक उसका लोकसभा चुनावों में अकेले दम पर उतरना बहुत जोखिम भरी रणनीति होगी। वहीं कांग्रेस की बात करें तो निकट भविष्य में वह बिना गठबंधन के सत्ता में वापसी के बारे में सोच भी नहीं सकती। भाजपा और कांग्रेस को शायद यह रास न आए लेकिन जब तक क्षेत्रीय दलों का जमकर पराभव नहीं होता है तब तक गठबंधन की राजनीति बरकरार रहेगी।'

गत सप्ताह तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा से बात की और संकेत दिया कि आने वाले महीनों में एक बड़ा विपक्षी गठबंधन तैयार हो सकता है। उन्होंने बेंगलूरु में संवाददाताओं से कहा, 'ढेर सारी बातें होती हैं लेकिन अब भारत बदलेगा। भारत को बदलना होगा और भविष्य के लिए आकार लेना होगा। उसे राजनीति, राजनेताओं और विभिन्न प्रकार के वाद के बावजूद उभरना होगा। ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए कि देश के हालात बदले जा सकें। दो या तीन महीने बाद आपको कुछ सनसनीखेज खबर मिलेगी।'

क्या कांग्रेस और भाजपा को भयभीत होने की आवश्यकता है? इस सवाल का जवाब आने वाले कुछ महीनों में मिल जाएगा।

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