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राज्यों की नाराजगी की क्या है वजह?

ए के भट्टाचार्य /  May 26, 2022

केंद्र सरकार ने गत सप्ताह पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले सड़क एवं अधोसंरचना उपकर को घटाने का निर्णय लिया जिससे यह बहस गर्म हो गई है कि क्या राज्यों को भी ईंधन पर लगने वाला मूल्यवद्र्धित कर या बिक्री कर कम करना चाहिए? केंद्र का मानना है कि जिस तरह उसने मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ईंधन पर कम कर किया है, वैसे ही राज्यों को भी शुल्क कम करके ईंधन कीमतों में कमी लानी चाहिए। राज्य अब तक खामोश हैं। केवल महाराष्ट्र और राजस्थान ने पेट्रोल और डीजल पर मूल्यवद्र्धित कर में कमी की है। क्या केंद्र की राज्यों से शुल्क में कमी की कामना करना अनुचित है?

याद रहे कि केंद्र की तरह राज्यों ने भी उस समय शुल्क बढ़ाया था जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम थीं। आदर्श स्थिति में तो राज्यों को पेट्रोल और डीजल पर शुल्क कम करना चाहिए था। उनकी अनिच्छा की क्या वजह हो सकती है? इस मसले पर राज्यों का नजरिया समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम यह समझें कि बीते वर्षों में पेट्रोल और डीजल को लेकर केंद्र का शुल्क ढांचा कैसे विकसित हुआ है।

मोदी सरकार के गठन के दौरान ही कच्चे तेेल की कीमतों में गिरावट शुरू हुई। वर्ष 2013-14 के 105 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 2014-15 में इसकी औसत कीमत 84 डॉलर प्रति बैरल, 2015-16 में 46 डॉलर प्रति बैरल और 2016-17 में 47 डॉलर प्रति बैरल रही। सरकार ने इस अवसर का लाभ उठाया और पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाकर अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत की। उपभोक्ताओं को इसका लाभ नहीं मिला क्योंकि शुल्क बढऩे के कारण खुदरा कीमतें जस की तस रहीं। पेट्रोल पर प्रति लीटर उत्पाद शुल्क अप्रैल 2014 के 9.48 रुपये से बढ़ाकर अप्रैल 2017 में 21.48 रुपये कर दिया गया। इस अवधि में डीजल पर यह शुल्क 3.56 रुपये से बढ़ाकर 17.33 रुपये कर दिया गया। इसकी बदौलत पेट्रोलियम क्षेत्र से सरकार का उत्पाद राजस्व 2013-14 के 78,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2014-15 में एक लाख करोड़ रुपये और 2016-17 में 2.43 लाख करोड़ रुपये हो गया। 2017-18 से 2020-21 तक कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई लेकिन केंद्रीय करों में इजाफा जारी रहा। मार्च 2021 के अंत तक पेट्रोल पर शुल्क 32.90 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 31.80 रुपये प्रति लीटर हो गया। पेट्रोलियम क्षेत्र से केंद्र को हासिल होने वाले उत्पाद राजस्व में कोई तेजी नहीं दिखी क्योंकि कोविड के कारण मांग में कमी थी लेकिन 2020-21 तक यह बढ़कर 3.73 लाख करोड़ रुपये हो गया था।

इस अवधि में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले शुल्क के स्वरूप में भी अहम बदलाव हुआ। 2017-18 में पेट्रोल पर लगने वाले कुल केंद्रीय शुल्क में उपकर और अधिभार की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत तथा डीजल में 35 प्रतिशत थी। मार्च 2021 के अंत तक उपकर और अधिभार की हिस्सेदारी पेट्रोल के लिए 96 प्रतिशत तथा डीजल के लिए 94 प्रतिशत हो गई।

इसके दो कारण थे। पहला, विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क तथा कृषि अधोसंरचना एवं विकास उपकर के रूप में लगने वाला अधिभार पेट्रोल के लिए बढ़कर 13.5 रुपये प्रति लीटर तथा डीजल के लिए 12 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया। दूसरा 2018 के वित्त अधिनियम ने सड़क उपकर को सड़क एवं अधोसंरचना उपकर से प्रतिस्थापित कर दिया। अब पेट्रोल और डीजल दोनों पर 8 रुपये प्रति लीटर का संयुक्त उपकर लगने लगा। अगले तीन वर्षों में पेट्रोल एवं डीजल के लिए सड़क एवं अधोसंरचना उपकर बढ़ाकर 18 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया।

इस प्रकार अप्रैल 2021 में कुल उपकर एवं अधिभार पेट्रोल पर 31.5 रुपये प्रति लीटर तथा डीजल पर 30 रुपये प्रति लीटर हो गया। परंतु मूल उत्पाद शुल्क को पेट्रोल के लिए मात्र 1.4 रुपये प्रति लीटर तथा डीजल के लिए 1.8 रुपये प्रति लीटर रखा गया। इस मामले में उपकर और अधिभार पर अत्यधिक निर्भरता स्पष्ट नजर आती है।

उदाहरण के लिए सड़क और अधोसंरचना उपकर से केंद्र का राजस्व तेजी से बढ़ा और वह 2018-19 के 51,266 करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 में 1.24 लाख करोड़ रुपये तथा 2021-22 में दो लाख करोड़ रुपये हो गया। ध्यान रहे कि पेट्रोलियम क्षेत्र के उत्पाद राजस्व में इस उपकर और अधिभार की हिस्सेदारी 2018-19 के 24 फीसदी से बढ़कर 2020-21 में  33 प्रतिशत हुई और 2021-22 में यह आधी से अधिक हो गई। इसका अर्थ यह भी है कि पेट्रोल और डीजल के कुल उत्पाद राजस्व का 94-96 प्रतिशत राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम पर इसके बढ़ते प्रभाव के चलते केंद्र सरकार ने गत छह माह में सड़क और अधोसंरचना उपकर में दो बार कटौती की। एक बार नवंबर 2021 में तथा दूसरी बार गत सप्ताह। पेट्रोल पर उपकर 18 रुपये प्रति लीटर से घटकर 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल के लिए 2 रुपये प्रति लीटर रह गया। इसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार को 2021-22 में करीब 50,000 करोड़ रुपये का राजस्व गंवाना पड़ा। अनुमान है कि 2022-23 में उसे 86,000 करोड़ रुपये का राजस्व और गंवाना होगा।

परंतु इस कमी का केंद्र के पेट्रोल-डीजल से होने वाले उत्पाद राजस्व में उपकर और अधिभार के योगदान पर ज्यादा असर नहीं हुआ और यह क्रमश: 93 प्रतिशत और 89 प्रतिशत पर बरकरार है।

यह भी एक वजह है जिसके चलते राज्य नाराज दिख रहे हैं। वे कह सकते हैं कि चूंकि केंद्र सरकार ने राजस्व का पूरा लाभ लिया है इसलिए अब नुकसान भी उसे अकेले वहन करना चाहिए। जहां तक अतीत में कच्चे तेल के दाम घटने पर मूल्यवद्र्धित कर घटाने की बात है तो राज्य कह सकते हैं कि शुल्क दरों में कमी का निर्णय उनका विशेषाधिकार है। एक संघीय ढांचे में राज्यों को यह आजादी है कि वे जीएसटी के दायरे के बाहर की वस्तुओं पर शुल्क तय कर सकें।

इससे दो बातें पैदा होती हैं। पहला, केंद्र को उपकर और अधिभार के जरिये राजस्व बढ़ाने की अपनी कोशिशों की समीक्षा करनी चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे मंशा राजस्व को राज्यों के साथ साझा न करने की अधिक है परियोजनाओं को पर्याप्त फंड मुहैया कराने की कम। केंद्र को अभी यह स्पष्ट करना है कि सड़क और अधोसंरचना उपकर में कमी से सड़क एवं राजमार्ग विकास कैसे प्रभावित होगा और इस कमी को पूरा करने के लिए वह क्या करेगा?

दूसरा, यह पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की पर्याप्त वजह है। संभव है कि जीएसटी परिषद उपयुक्त दरों तथा पेट्रोलियम उत्पादों पर अधिभार इस प्रकार लगाने पर राजी हो जाएगा कि राजस्व की कोई कमी न हो। साथ ही राजस्व को केंद्र और राज्यों के बीच साझा करने की अनुमति भी दी जा सकती है। पेट्रोल और डीजल से राजस्व बढ़ाने के लिए उपकर और अधिभार पर केंद्र की अत्यधिक निर्भरता समाप्त होनी चाहिए।

Keyword: नाराजगी, पेट्रोल, डीजल, केंद्रीय शुल्क, उपकर, ईंधन, उत्पाद शुल्क, पेट्रोलियम,
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