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मंदिर, मस्जिद, सच और मेल-मिलाप

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  May 23, 2022

वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद स्थित वुजू टैंक में शिवलिंग है या बड़े आकार के फव्वारे की टोंटी? अदालती आदेश पर हुए सर्वे में क्या उसकी दीवारों पर सिंदूरी रंग की मूर्तियां, कमल, स्वास्तिक शेषनाग आदि मिले हैं?

क्या कुतुब मीनार परिसर में उलटे पड़े एक स्लैब पर गणेश की मूर्ति है? क्या मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद औरंगजेब द्वारा भगवान कृष्ण की जन्मस्थली केशव देव मंदिर को तोड़कर बनवायी गई?

मान लेते हैं कि इन तीनों प्रश्नों के उत्तर हां हैं, क्योंकि शिवलिंग-फव्वारा विवाद से इतर ज्यादातर जवाब हां ही हैं। ऐसे में तीन और प्रश्न उत्पन्न होते हैं:

ठ्ठ उपरोक्त सभी सही हैं लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है?

ठ्ठ यदि यह आपको और हिंदू बहुमत को नाराज करता है तो 2022 में आप क्या कर सकते हैं?

ठ्ठ यदि आप भारतीय मुस्लिम हैं जो नाराज और भयभीत है तो आप कैसे प्रतिक्रिया देंगे?

जब हम भारतीय राष्ट्रवाद के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन चुके इन सवालों के उत्तर तलाशते हैं तो हमें एक और प्रश्न पूछना होगा।

सन 1947 में जवाहर लाल नेहरू से लेकर 2014 में नरेंद्र मोदी तक देश के प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से राष्ट्रको संबोधित क्यों करते आए हैं?

दिल्ली के लाल किले को तमाम राजनीतिक और वैचारिक बंटवारे से परे भारत की संप्रभुता का प्रतीक माना जाता है। क्या इसे एक मुस्लिम स्मारक माना जाता है?

17वीं सदी के आरंभ में बना यह किला गत 300 वर्षों में उभरे भारतीय राष्ट्रवाद की जटिलताओं का अच्छा प्रतीक है या कहें भारत के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद का। शाहजहां ने 1638 में इसका निर्माण शुरू कराया था जब उसने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित किया। यहां तक कि कठोर हिंदू दक्षिणपंथ के लिए भी शाहजहां मुगलों में कम खराब शासक है। वह 'औरंगजेब' जैसे शैतान पुत्र का शिकार भी था जिसने अपने भाई तथा पिता के पसंदीदा वारिस दारा शिकोह की हत्या की और अपने पिता को कैद किया। हमारे इतिहास में कुछ भी साधारण नहीं है। कम खराब माने जाने वाले शाहजहां ने ही ओरछा के शानदार मंदिरों के विध्वंस का आदेश दिया क्योंकि उसके शासक जुझार सिंह ने बगावत की थी। इस काम के लिए उसने औरंगजेब को ही चुना था। यदि कुछ लोग मुगलों को विदेशी मानते हैं तो लाल किले को सबसे पहले एक वास्तविक विदेशी मुस्लिम आक्रांता नादिर शाह ने ही 1739 में लूटा था। वह मुगल साम्राज्य के पराभव का दौर था: उसकी तुलना उस बोइंग 737 विमान से कर सकते हैं जो मार्च में चीन में गिरा। इसकी वजह यह कि चीनी विमान के विमान चालकों की तरह औरंगजेब के मुस्लिम उत्तराधिकारी भी आत्मघाती थे। नादिर शाह ने बुरी स्थिति में पहुंच चुके मुगल शासक मुहम्मद शाह (उपनाम रंगीला) को तबाह कर दिया, लाल किले के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया और उसकी ज्यादातर संपदा तथा मयूर सिंहासन अपने साथ ले गया।

उसने ऐसा क्यों किया? लाल किला कोई हिंदू स्मारक नहीं था, न ही वहां कोई मंदिर था। यह एक समय के महान भारतीय साम्राज्य की संप्रभु शक्ति का प्रतीक था। मुस्लिम विजेता होने के बावजूद उसने उसे मध्ययुगीन लुटेरों की तरह लूटा। यही वजह है कि वह मुगलों का सिंहासन भी ले गया। लाल किले पर दूसरा हमला 44 साल बाद एक सिख योद्धा ने किया जो जाहिर है न हिंदू था और न ही मुस्लिम। ऐसा करने वाले महान सैन्य कमांडर जस्सा सिंह आहलूवालिया, जस्सा सिंह रामगढिय़ा और बघेल सिंह को केवल सिख ही नायक नहीं मानते। उन्होंने लाल किले को सैन्य अड्डा बनाया और उसे एक अन्य कमजोर मुगल शासक के हवाले कर दिया, ठीक नादिर शाह की तरह। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सिखों के लाल किला खाली करने का सौदा दिल्ली में सात गुरुद्वारे बनवाने की शर्त के साथ हुआ था। उसी समय चांदनी चौक में उस स्थान पर गुरुद्वारा शीश गंज बनवाया गया जहां औरंगजेब ने सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर सिंह का सर कलम करवाया था। मध्ययुगीन लड़ाइयों में धर्म अहम था। प्रधानमंत्री मोदी ने 21 अप्रैल को गुरु की 400वीं वर्षगांठ पर लाल किले से सिखों को संबोधित किया।

इतना ही नहीं स्वतंत्रता सेनानियों (या बागी जो भी आप कहें) ने 1857 में बहादुरशाह जफर और उनके झंडे के लिए लड़ाई लड़ी जबकि वह केवल नाम मात्र के शासक थे। उन लोगों के लिए जफर और लाल किला भारत की संप्रभुता के प्रतीक थे।

यही वजह है कि लाल किले पर अंतिम हमला ब्रिटिशों ने तब किया जब उन्होंने बागियों को कुचल दिया। यदि नादिर शाह लूट के तरीके से सबसे विध्वंसक था तो शाही इमारतों को सबसे अधिक नुकसान ब्रिटिश हमले ने पहुंचाया। ईस्ट इंडिया कंपनी के हमले के बाद वहां शायद ही कुछ बचा। शाही कमरे, हरम आदि को मलबे में बदल दिया गया और उनकी जगह बैरक बना दी गईं। प्रतीकात्मकता की बात करें तो सन 1945-45 में भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नैशनल आर्मी के पकड़े गए जवानों की सुनवायी लाल किले में हुई।

सन 1739 से 1857 के बीच 118 वर्षों तक मुगलों का बनाया लाल किला मुस्लिमों, सिखों और ईसाइयों (अगर ब्रिटिशों को ईसाइयों में गिनें) के हाथों लूट का शिकार होता रहा। इन सभी ने उस पर इसलिए हमला किया कि वह भारत की राज्य शक्ति का प्रतीक था।

हम पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि ऊपर उठे प्रश्नों के उत्तर हां हैं। काशी और मथुरा के मंदिर औरंगजेब के आदेश पर तोड़े गए और वहां मस्जिद तथा ईदगाह बनायी गई। इस बात को वे इतिहासकार भी मानते हैं जिन्हें दक्षिणपंथी हिंदू, कपटी उदार वामपंथी इतिहासकार मानते हैं। औरंगजेब को सामान्य बताने के आरोपी इतिहासकार ऑड्रे ट्ऱश्क भी इस बात को मानते हैं। एरिजोना विश्वविद्यालय के रिचर्ड ईटन को मध्यकालीन भारत पर उनके काम के लिए जाना जाता है और वह भी इसकी तसदीक करते हैं। फ्रंटलाइन पत्रिका में 2001 में प्रकाशित दो भागों वाले आलेख में उन्होंने केवल काशी और मथुरा ही नहीं बल्कि कई अन्य मंदिरों की सूची जाहिर की है जिन्हें पहले गजनी जैसे लुटेरों ने लूटा और फिर भारत में जन्मे मुस्लिम शासकों खासकर मुगलों ने।

यह अविवादित इतिहास है। हमने पहले जो तीन प्रश्न किए अब उन्हें हल करने की आवश्यकता है। हम इतिहास के साथ क्या करेंगे?

यदि इस विध्वंस के घटित होने पर कोई विवाद नहीं है तो इन विध्वंसकर्ताओं के उद्देश्य को लेकर बहस क्या करनी? एक पक्ष सोचता है कि यह पूरी तरह राजनीतिक और आर्थिक वजह से हुआ तो दूसरे का मानना है कि यह धार्मिक और हिंसक मूर्तिभंजन के कारण किया गया। बहरहाल यह दोनों पक्षों के बौद्धिकों की बहस है। हमारे मौजूदा संवैधानिक ढांचे में इस इतिहास को बदलना भी असंभव है। उपासना स्थल अधिनियम 1991 ऐसे किसी संशोधन से रोकता है। 2019 में पांच न्यायाधीशों वाले सर्वोच्च न्यायालय के पीठ ने अयोध्या मामले पर जो निर्णय दिया उसके माध्यम से इसे संविधान के मूल ढांचे में शामिल कर दिया गया। मुझे नहीं लगता कि बहुमत के साथ भी मोदी इस कानून को रद्द करेंगे और हमारे राष्ट्रीय हितों को क्षति पहुंचाएंगे। तीन दशक पहले नेल्सन मंडेला ने हमें महात्मा गांधी की अहिंसा जैसा शक्तिशाली तथा ज्यादा समकालीन विचार दिया: सत्य और सुलह। इसके मुताबिक बिना सच्चाई के कोई मेलमिलाप संभव नहीं।

इक्कीसवीं सदी में इस मोड़ पर हिंदू अतीत में अपनी पीडि़त होने के प्रमाणों को खोदना बंद कर सकते हैं। यह बात पहले ही प्रमाणित है और इसे तो दूसरे पक्ष के लोग भी विश्वसनीय मानते हैं। मुस्लिम और वाम-धर्मनिरपेक्ष कुलीनों को भी अतीत की गलतियों को नकारना बंद कर देना चाहिए, भले ही गलती करने वालों का उद्देश्य चाहे जो हो। औरंगजेब अच्छा व्यक्ति था या नहीं ऐसी बहसें धर्मनिरपेक्षता के काम को नुकसान पहुंचाती हैं। कोई भी मध्ययुगीन शासक 21वीं सदी के संदर्भों में अच्छा व्यक्ति नहीं हो सकता। हां, कुछ शासक दूसरों से अधिक बुरे अवश्य थे।

एक बार अगर दोनों पक्ष सच स्वीकार कर लें तो धीरे-धीरे मेलमिलाप भी  संभव है।

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