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आरबीआई की नरमी से बढ़ी फंसे हुए कर्ज की समस्या!

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  05 18, 2022

सन 1993 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आय की पहचान, परिसंपत्ति वर्गीकरण और फंसे हुए कर्ज की प्रॉविजनिंग के लिए प्रूडेंशियल नॉर्म पेश किए थे, तब से फंसे हुए कर्ज ने बार-बार चरणबद्ध ढंग से व्यवस्था को परेशानी में डाला। नियामक ने इससे निजात पाने के लिए कई प्रयास किए और ताजा उदाहरण ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता का है।

कई कर्जदार जो बैंक ऋण नहीं चुकाते हैं, वे जानबूझकर देनदारी में चूक करने वाले हैं जिन्हें विलफुल डिफॉल्टर कहा जाता है। यह विशुद्ध भारतीय अवधारणा है। उनके पास पैसे हैं लेकिन वे चुकाते नहीं हैं। इसके बजाय वे अपने पैसे को  अन्य कारोबार में निवेश करते हैं। 'रोलर कोस्टर राइड ऑफ नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स इन इंडियन बैंकिंग' शीर्षक वाले एक पर्चे में आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर और सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के अध्यक्ष एवं विशिष्ट फेलो राकेश मोहन तथा राष्ट्रीय बैंक प्रबंधन संस्थान के निदेशक पार्थ रे ने कुछ मिथकों को ध्वस्त किया है और इस बात पर नये सिरे से रोशनी डाली है कि दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में बैंकिंग की क्या दिक्कतें हैं। इस दौरान बीते तीन दशकों में फंसे हुए कर्ज के सिरे भी तलाशे गए।

कुछ तथ्यों से शुरुआत करते हैं। यह सही है कि आरबीआई ने हेल्थ कोड सिस्टम नवंबर 1985 में पेश किया लेकिन फंसे हुए कर्ज के मानक 1993 में तब प्रवर्तन में आए जब नरसिम्हन कमेटी की पहली रिपोर्ट जारी की गई। शुरुआत में किसी कर्ज को फंसा हुआ कर्ज तब माना जाता था जब चार तिमाहियों तक उसे चुकाया नहीं जाता था। सन 1995 तक इस अवधि को घटाकर दो तिमाही कर दिया गया और आखिरकार 31 मार्च, 2004 से एक तिमाही या 90 दिन तक अनचुकता छोड़े जाने वाले कर्ज को फंसा हुआ माना जाने लगा। अब फंसे हुए कर्ज के उतार-चढ़ाव पर नजर डालते हैं। 31 मार्च, 1994 तक सभी सरकारी बैंकों का सकल फंसा हुआ कर्ज 25 प्रतिशत था। वर्ष 2009 में दो फीसदी तक गिरने के बाद 2018 में यह बढ़कर 14.6 फीसदी तक जा पहुंचा था। सन 2021 में यह पुन: गिरकर 7.5 फीसदी रह गया।

संयोग की बात है कि ऐसे सरकारी बैंक जिनकी ऋण पुस्तिकाएं विरासती थीं, और जो भारी भरकम फंसे हुए कर्ज में थे, चुनिंदा वर्षों में उनका सकल और शुद्ध फंसा हुआ कर्ज नये निजी बैंकों से कम था। उदाहरण के लिए 2008 में सरकारी बैंकों का सकल एनपीए 2.2 प्रतिशत था और पैसा अलग करने या प्रॉविजनिंग के बाद शुद्ध एनपीए एक फीसदी था। जबकि नये निजी बैंकों का सकल फंसा हुआ कर्ज 2.5 फीसदी और शुद्ध फंसा हुआ कर्ज 1.1 फीसदी था। यह रुझान तीन वर्ष यानी 2011 तक चला। 2012 से इसमें बदलाव आया और नये निजी बैंकों का प्रदर्शन सरकारी बैंकों से बेहतर होने लगा। उदाहरण के लिए 2018 में जब सरकारी बैंकों का सकल फंसा कर्ज 14.6 प्रतिशत और शुद्ध फंसा हुआ कर्ज 8 फीसदी था तब नये निजी बैंकों में यह क्रमश: 4.7 प्रतिशत और 2.4 प्रतिशत था।

पर्चे में फंसे कर्ज के तीन अलग-अलग चरणों का उल्लेख किया गया-1990 से 2009 तक गिरावट का रुझान, उत्तर अटलांटिक वित्तीय संकट के बाद 2018 तक इजाफा और उसके बाद फंसे कर्ज में गिरावट जो संयोगवश दिवालिया उपायों के साथ घटित हुई। मोहन इसे उत्तर अटलांटिक वित्तीय संकट कहते हैं क्योंकि इसकी शुरुआत वहीं से हुई और फिर दुनिया में इसका असमान प्रसार हुआ। कई लोग 2018 के बाद बढ़ते फंसे कर्ज के लिए सरकारी बैंकों के खराब संचालन को उत्तरदायी ठहराते हैं लेकिन मोहन और रे इस बात से सहमत नहीं क्योंकि 1996 से 2011 के बीच इन्हीं बैंकों के फंसे कर्ज में भारी कमी आई। क्या सरकारी बैंकों का संचालन उसके बाद अचानक बदल गया? या फिर उनके द्वारा डेढ़ दशक तक अच्छा प्रबंधन कोई दुर्घटना थी?

उन्होंने पाया कि पहले चरण में ये बैंक ज्यादा जवाबदेह थे जिसके चलते उच्च ऋण वृद्धि के बाद भी फंसा कर्ज कम हुआ। बैंकों ने सरकारी बॉन्ड में भी जमकर निवेश किया। ब्याज दरों में गिरावट के साथ उनकी आय बढ़ी और वे फंसे कर्ज के लिए व्यवस्था कर सके। दूसरे चरण में फंसा कर्ज 2012 तक बढ़ा। 2014 तक यह बढ़ोतरी अपेक्षाकृत धीमी थी। 2018 में फंसा कर्ज उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। ऐसा सरकारी बैंकों की बदौलत हुआ। ऐसा क्यों हुआ? बैंकों ने बुनियादी ढांचा बनाने वाले निकायों को जमकर ऋण दिया, खासतौर पर बिजली उत्पादन, स्टील और दूरसंचार कंपनियों को। नियामकीय सहनशीलता ने भी फंसा कर्ज बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। अगस्त 2008 में आरबीआई ने बैंकों को फंसे कर्ज के पुनर्गठन की इजाजत दे दी और कहा कि उन्हें फंसे कर्ज के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाएगा। यह एकबारगी उपाय था जिसे 30 जून, 2009 तक अपनाया गया लेकिन एक दशक बाद फरवरी 2018 में यह सहनशीलता समाप्त हो गई। यानी वास्तविक फंसा कर्ज वर्षों तक छिपा रहा। बैंकर झूठी आश्वस्ति के शिकार रहे और फिर एक दिन आरबीआई ने बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा के साथ इसे छेड़ दिया। इसे सेंट्रल रिपॉजिटरी ऑफ इन्फॉर्मेशन ऑन लार्ज क्रेडिट यानी सीआरआईएलसी का समर्थन हासिल था। इसने बैंकों के 5 करोड़ रुपये से अधिक के हर ऋण पर नजर रखी और ऋण के गलत आवंटन को सामने लाया।

अहम सवाल फिर भी बरकरार है। गैरजिम्मेदारी से ऋण देने से फंसे कर्ज में कितना इजाफा हुआ और नियामकीय अनदेखी से कितना पुराना फंसा हुआ कर्ज छिपाया गया? निश्चित तौर पर धोखाधड़ी की घटनाएं भी हुईं और राजनीतिज्ञ-बैंकर-उद्योगपतियों के गठजोड़  ने भी फंसा कर्ज बढ़ाने में योगदान किया लेकिन भारतीय बैंकिंग में संचालन के मसले खासे जटिल हैं। इस दलील को कोई चुनौती नहीं दे सकता। इस बीच हम दम साधे प्रतीक्षा कर रहे हैं कि आने वाले वर्षों में फंसे कर्ज का क्या परिदृश्य रहेगा। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि महामारी से प्रभावित पुनर्गठित ऋण में से कितना फंसे हुए कर्ज में तब्दील हुआ और इस दौर में नियामकीय लचीलापन कितने समय तक जारी रहा।

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