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महंगाई दर में पेट्रोल-डीजल का हिस्सा 30 प्रतिशत

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली May 17, 2022

व्यक्तिगत इस्तेमाल के वाहनों में लगने वाले पेट्रोल व डीजल की कीमतों ने अप्रैल में खुदरा महंगाई दर की वृद्धि में करीब 30 प्रतिशत अंशदान दिया है। अप्रैल में महंगाई दर 0.84 प्रतिशत बढ़कर 7.79 प्रतिशत हो गई, जो मार्च में 6.95 प्रतिशत थी। इसकी वजह से यह लगातार चौथा महीना बन गया है, जब कीमतों में बढ़ोतरी की दर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मंहंगाई की 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा से ज्यादा है।

कुल महंगाई दर में वाहनों के लिए पेट्रोल की कीमत 10.72 प्रतिशत बढ़ी है, वहीं डीजल की कीमत 11.04 प्रतिशत बढ़ी है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में वाहनों के लिए पेट्रोल का अंशदान 2.18697 प्रतिशत और डीजल का योगदान 0.14800 प्रतिशत है। इस तरह से सीपीआई में दोनों का मिलाकर अधिभार 2.3 प्रतिशत है।

पेट्रोल व डीजल के असर में बस, टैक्सी, ऑटो का किराया शामिल नहीं है, जिसका सीपीआई में अधिभार करीब 2 प्रतिशत है। इसमें ईंधन के परोक्ष असर को शामिल नहीं किया गया है, जिसका असर विभिन्न इनपुट्स व खाद्य की कीमतों पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन के दाम के परोक्ष असर का पूरा प्रभाव 2-3 महीने में दिखता है, लेकिन यह अप्रैल के आंकड़े से ही आंशिक रूप से दिखने लगा है।

तेल विपणन कंपनियों ने 4 नवंबर, 2021 के बाद लंबे समय तक दाम रोके रखने के बाद 22 मार्च, 2022 से कीमतों में बढ़ोतरी शुरू की। वाहनों के लिए पेट्रोल व डीजल की महंगाई मार्च में नहीं बढ़ी। नवंबर 2020 के बाद मार्च 2022 में पेट्रोल के मामले में इसका अंशदान 10.21 के निचले स्तर पर था। वहीं 2021-22 के अंतिम महीने में डीजल की महंगाई दर 5.21 प्रतिशत के निचले स्तर पर थी। अब मसला यह है कि मौद्रिक नीति किस तरह से महंगाई दर कम करने में सफल रहेगी, जिसमें पेट्रोल व डीजल की कीमतें अहम भूमिका निभा रही हैं, जबकि तमाम देशों में जिंसों की कीमतों में भी तेजी आ रही है।

रिजर्व बैंक की मौद्रिक समिति जून में रीपो रेट में बढ़ोतरी कर सकती है, जिसने इस महीने की शुरुआत में 40 आधार अंक बढ़ोतरी की घोषणा की है। बहरहाल जून में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी एमपीसी की बैठक में महंगाई दर को लेकर अनुमानों की चर्चा के बाद निर्भर होगी। सूत्रों ने कहा कि अगर सितंबर तक कीमतों में वृद्धि 6 प्रतिशत से नीचे नहीं आती है, मौद्रिक नीति समिति सख्त कदम उठा सकती है।

पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन ने कहा कि मौद्रिक साधन से अकेले ही लागत के कारण होने वाली महंगाई का समाधान नहीं किया जा सकता। बहरहाल यह कंपनियों को अपनी बढ़ी लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने से रोक सकती है। उन्होंने कहा, 'कंपनियां खुशी खुशी लागत में बढ़ोतरी का बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं। कंपनियां अपना मुनाफा बचाने में लगी हैं। सही यह है कि मुनाफा बढ़ा है, कम नहीं हुआ है। इस तरह वे अपने मुनाफे की रक्षा में लगे हैं। हम और आप कीमत चुका रहे हैं। मौद्रिक नीति इससे बचा सकती है।' उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति समिति कच्चे तेल की कीमत नहीं कम कर सकती है।

सेन ने कहा, 'लेकिन बोझ को साझा करना अहम है। कितना कंपनियां सहन करेंगी और कितना ग्राहक बर्दाश्त करेंगे यह अहम है। मौद्रिक नीति इसका समाधान कर सकती है और इसका अच्छा असर हो सकता है।'

सूत्रों ने कहा कि यह डर है कि अगर महंगाई दर स्थिर रहती है और यह रिजर्व बैंक की तय ऊपरी सीमा पर लंबे समय तक बनी रहती है तो यह किराए, मजदूरी, परिवहन गत पर असर डालेगी औऱ आप इसमें कुछ भी नहीं कर सकते हैं।

इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत ने कहा कि मौद्रिक नीति भोथरा साधन है। उन्होंने कहा कि इसका असर 6-9 महीने पहले नहीं आता है।

इक्रा में मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने मौद्रिक नीति बहुत ज्यादा सख्त करने को लेकर सावधान रहने को कहा है। उन्होंने कहा, 'बहुत सख्ती की जरूरत नहीं है। खासकर ऐसे में, जब वैश्विक आपूर्ति संबंधी वजहों से ऐसा हो रहा है और आर्थिक वृद्धि को गति देने की जरूरत है।' नायर को उम्मीद है कि जून की समीक्षा में एमपी रीपो रेट में 40 आधार अंकों और अगस्त की समीक्षा में 35 अंकों की बढ़ोतरी करेगा।


आरबीआई के नए प्रतिबंधों से होगा बिल्डरों की मंजूरी लागत में इजाफा

राघवेंद्र कामत

मुंबई


भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा हाल ही में बैंकों को दिए गए निर्देश की वजह से प्रॉपर्टी डेवलपरों की मंजूरी लागत बढऩे की संभावना है। इस निर्देश में कहा गया है कि उन्हें प्रीमियम भुगतान और ट्रांस्फरेबल डेवलपमेंट राइट्स (टीडीआर) के लिए बिल्डरों को उधार नहीं देना चाहिए।

इससे उन पर अपना खुद का फंड जुटाने का दबाव पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे किफायती आवास परियोजनाओं के दामों में इजाफा हो सकता है।

आरबीआई का विचार है कि ये भुगतान भूमि खरीद से संबंधित हैं और इस वजह से बैंकों को इनके लिए उधार नहीं देना चाहिए।

विशेषज्ञों ने कहा कि यह मुद्दा मुंबई के डेवलपरों के लिए ज्यादा चिंताजनक हो सकता है, क्योंकि प्रीमियम भुगतान और टीडीआर का इस शहर से अधिक सरोकार है।

इसके साथ ही, एचडीएफसी बैंक के साथ एचडीएफसी का विलय भी डेवलपरों के लिए टीडीआर जैसे उद्देश्यों के वास्ते धन जुटाने में चुनौतियां पेश कर सकता है, क्योंकि रियल एस्टेट के सबसे बड़े उधारदाताओं में से एक होने की वजह से एचडीएफसी, बैंक का हिस्सा बनने के बाद डेवलपरों को उधार देने में लचीलापन खो देगा।

मुंबई स्थित फंड मैनेजर, निसस फाइनैंस के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अमित गोयनका ने कहा 'प्रवर्तकों को और ज्यादा इक्विटी  या अर्ध-इक्विटी का धन लाना होगा। अन्य शहरों के मुकाबले मुंबई में असर ज्यादाहोगा।'

गोयनका को उम्मीद है कि इस कदम के बाद मंजूरी लागत पर अतिरिक्त ब्याज की वजह से इनपुट कीमतोंं में पांच प्रतिशत इजाफा होगा। उनके अनुसार दक्षिण मध्य मुंबई में कुल मंजूरी - एफएसआई (फ्लोर स्पेस इंडेक्स) और प्रीमियम लागत 15,000 प्रति वर्ग फुट है। इस पर पांच प्रतिशत इजाफे का मतलब है 750 रुपये का असर। मुंबई के उपनगरों में यह 300 रुपये हो सकता है। उन्हें लगता है कि फिलहाल डेवलपर इसे वहन करेंगे, क्योंकि इनपुट लागत बढ़ चुकी है और वे हाल ही में कीमत वृद्धि कर चुके हैं।

उन्होंने कहा कि किफायती आवास परियोजनाओं में डेवलपर शायद इसे वहन न कर पाएं, क्योंकि 11-12 प्रतिशत स्तर पर मार्जिन कम है। उन्होंने कहा कि किफायती परियोजनाओं में कीमतें 150-300 रुपये तक और बढ़ सकती हैं।

कुशमैन ऐंड वेकफील्ड के प्रबंध निदेशक (पूंजी बाजार) सौरभ शतदल ने कहा कि टीडीआर और एफएसआई प्रीमियम परियोजना लागत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है, खास तौर पर मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) में।

अब आरबीआई के नए नियम आने से डेवलपरों को बिक्री संग्रह, इक्विटी या स्ट्रक्चर्ड कैपिटल जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर विचार करना होगा। उन्होंने कहा कि इससे नकदी प्रवाह में कुछ असंतुलन हो सकता है और संपूर्ण परियोजना लागत में कुछ इजाफा हो सकता है।

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